सऊदी में मौत की सजा पाए विदेशियों के शव परिवार को क्यों नहीं मिलते? जानें नियम
सऊदी अरब के कड़े इस्लामी कानूनों के तहत संगीन जुर्म में मौत की सजा पाए कैदियों के शवों को सुरक्षा कारणों के चलते उनके मूल देश भेजने के बजाय वहीं के कब्रिस्तानों में दफना दिया जाता है.

सऊदी अरब दुनिया के उन गिने-चुने देशों में शामिल है, जहां हर साल सबसे ज्यादा मौत की सजा दी जाती है. इससे भी ज्यादा चिंता की बात यह है कि जिन विदेशी नागरिकों को यहां फांसी दी जाती है, उनके शव अक्सर उनके परिवारों को वापस नहीं मिलते. मानवाधिकार संगठनों की माने तो सैकड़ों परिवार आज भी नहीं जानते कि उनके किसी अपने को कब, कहां और कैसे दफनाया गया.
यह मामला हाल ही में एक बार फिर चर्चा में आया, जब कई अफ्रीकी और एशियाई देशों के नागरिकों के परिवारों ने अपने रिश्तेदारों के शव वापस न मिलने पर दुख जताया. आइए जानते हैं कि आखिर सऊदी अरब में यह नियम क्यों बना है और इसके पीछे क्या वजहें बताई जाती हैं.
शव न लौटाने की क्या है वजह?
सऊदी अरब के कानून और वहां की न्याय प्रणाली पूरी तरह से इस्लामिक शरिया कानून पर आधारित है. सऊदी अरब सरकार की तरफ से शव न लौटाने को लेकर कोई साफ और आधिकारिक नीति सार्वजनिक नहीं की गई है, जिसकी वजह से इस पर पारदर्शिता की भारी कमी मानी जाती है. मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि कई मामलों में शव इसलिए नहीं लौटाए जाते, क्योंकि जांच के दौरान या हिरासत में हुई प्रताड़ना के निशान छुपाने की कोशिश की जाती है. हालांकि, सऊदी सरकार ने संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञों को दिए जवाब में इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि हर मामले में तीन स्तर की न्यायिक समीक्षा होती है, ट्रायल, अपील और सुप्रीम कोर्ट, और शाही फरमान के बाद ही सजा दी जाती है.
कितनी बड़ी है यह समस्या?
मानवाधिकार संगठनों के मुताबिक, सऊदी अरब में हर साल सैकड़ों लोगों को मौत की सजा दी जाती है, जिनमें बड़ी संख्या विदेशी नागरिक शामिल हैं. रिपोर्ट्स के मुताबिक साल 2024 में ही सऊदी अरब में करीब 345 लोगों को फांसी दी गई, जो पिछले कुछ सालों के मुकाबले काफी ज्यादा है. इनमें पाकिस्तान, नाइजीरिया, इथियोपिया, मिस्र और यमन जैसे देशों के नागरिक शामिल रहे हैं. मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि इनमें से ज्यादातर मामलों में परिवारों को न तो सही समय पर सूचना दी जाती है और न ही शव लौटाया जाता है.
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठ चुकी है चिंता
संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार विशेषज्ञ भी कई बार सऊदी अरब से मांग कर चुके हैं कि परिवारों को फांसी से पहले सूचना दी जानी चाहिए और शव जल्द से जल्द लौटाया जाना चाहिए, साथ ही स्वतंत्र फॉरेंसिक जांच की इजाजत भी दी जानी चाहिए. सऊदी सरकार का कहना है कि सभी कैदियों को कांसुलर एक्सेस यानी अपने दूतावास से संपर्क का अधिकार दिया जाता है और किसी तरह का भेदभाव नहीं किया जाता. हालांकि, मानवाधिकार संगठनों का दावा है कि जमीनी हकीकत इससे अलग है, और कई परिवारों को आज तक यह भी नहीं पता कि उनके अपनों को आखिर दफनाया कहां गया है. यही वजह है कि यह मुद्दा अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों के लिए लगातार चिंता का विषय बना हुआ है.
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