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पाकिस्तान के अलावा कोई और मुस्लिम देश क्यों नहीं बना पाया परमाणु बम?

पाकिस्तान ने अपनी सुरक्षा मजबूरी, गुप्त नेटवर्क और अनुकूल वैश्विक परिस्थितियों के बल पर परमाणु हथियार बनाए. आइए जानें कि अन्य मुस्लिम देश ऐसा करने से क्यों पीछे रह गए.

पूरी दुनिया में 50 से भी ज्यादा मुस्लिम देश मौजूद हैं, लेकिन उनमें से सिर्फ पाकिस्तान ही ऐसा एकमात्र देश है, जिसके पास परमाणु हथियार हैं. यह बात अक्सर सवाल खड़े करती है कि अगर एक विकासशील देश होकर पाकिस्तान इस मुकाम पर पहुंच सकता था, तो अन्य अरब और मुस्लिम देश इस मामले में आखिर पीछे क्यों रह गए? क्या वास्तव में पाकिस्तान का परमाणु सफर केवल एक राजनीतिक इच्छा नहीं, बल्कि उसकी अस्तित्व की रक्षा की राष्ट्रीय राजनीति, गुप्त तकनीकों तक पहुंच और वैश्विक परिस्थितियों का मिला-जुला परिणाम था, जिसकी तुलना अन्य देशों से नहीं हो सकती है.

पाकिस्तान ने क्यों बनाया परमाणु हथियार?

पाकिस्तान के लिए परमाणु शक्ति बनना कोई राजनीतिक प्रतिष्ठा का विषय नहीं था, बल्कि यह उसकी अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए मजबूरी थी. साल 1971 के युद्ध में भारत के हाथों मिली करारी हार और पूर्वी पाकिस्तान से अलग होकर बांग्लादेश बनने के बाद वहां के नेतृत्व को यह अहसास हुआ कि भविष्य में देश को टूटने से बचाने के लिए परमाणु शक्ति ही एक माध्यम है. इसके बाद 1974 में जब भारत ने अपना पहला सफल परमाणु परीक्षण किया तो पाकिस्तान की यह जरूरत और ज्यादा तेज हो गई और उसने इस दिशा में प्रयास तेज कर दिए.

डॉक्टर ए क्यू खान का गुप्त नेटवर्क ने तैयार किया हथियार

पाकिस्तान को इस दौड़ में सफलता के पीछे गुप्त रूप से जुटाई गई परमाणु तकनीक का बहुत बड़ा योगदान था. पाकिस्तानी वैज्ञानिक डॉ. ए. क्यू खान ने यूरोप से सेंट्रीफ्यूज के गुप्त डिजाइन हासिल किए और दुनिया भर में अवैध आपूर्ति का एक विशाल नेटवर्क तैयार किया. इस सप्लाई चेन के जरिए पाकिस्तान ने अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और निगरानी एजेंसियों को चकमा देकर आवश्यक पुर्जे और जरूरी तकनीकें हासिल कीं. उस दौर में वैश्विक परमाणु निगरानी तंत्र आज की तुलना में काफी कमजोर था, जिसका पूरा फायदा उठाकर इस्लामाबाद ने गुपचुप तरीके से अपना संवर्धन का कार्यक्रम पूरा किया. 

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पाकिस्तान के अलावा कोई और मुस्लिम देश क्यों नहीं बना पाया परमाणु बम?

चीन का साथ और अमेरिका की अनदेखी ने की मदद

पाकिस्तान के इस मिशन में अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक परिस्थितियों ने भी बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. रणनीतिक मामलों के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन ने पाकिस्तान को महत्वपूर्ण चरणों में आवश्यक तकनीकी सहायता. हथियार डिजाइन और रणनीतिक मार्गदर्शन प्रदान किया था. वहीं दूसरी ओर 1980 के दशक में सोवियत-अफगान युद्ध की ववजह से अमेरिका को सोवियत संघ के खिलाफ पाकिस्तान की एक प्रमुख सहयोगी के रूप में सख्त जरूरत थी. इसी मजबूरी के चलते वाशिंगटन ने खुफिया चेतावनी को नजरअंदाज करते हुए पाकिस्तान के तेजी से बढ़ते परमाणु कार्यक्रम की तरफ अपनी आंखें मूंद लीं.

अन्य मुस्लिम देश क्यों नहीं बना सके परमाणु हथियार?

पाकिस्तान के अलावा जब कभी भी किसी अन्य मुस्लिम देश ने परमाणु हथियार विकसित करने की दिशा में कदम आगे बढ़ाए तो उनको अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कड़े विरोध और सीधे सैन्य हमलों का सामना करना पड़ा. जब 1981 में इराक अपने ओसिराक परमाणु रिएक्टर को विकसित कर रहा था, तब इजरायल ने हवाई हमला करके उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया. इसके बाद साल 2007 में सीरिया के अल-किबार स्थित संदिग्ध परमाणु ठिकाने का भी इजरायल ने यही हाल किया. वहीं ईरान आज भी यूरेनियम संवर्धन में प्रगति के बाद भी कड़े आर्थिक प्रतिबंधों, साइबर हमलों और लगातार अमेरिका और इजरायल के हमलों का सामना कर रहा है.

सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देशों ने क्या रास्ता चुना?

सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर जैसे आर्थिक रूप से संपन्न मुस्लिम देशों ने खुद परमाणु हथियार विकसित करने की बजाय एक अलग और व्यावहारिक रास्ता चुना. अरब देशों ने भारी-भरकम बजट खर्चा करके परमाणु अनुसंधान करने के स्थान पर अमेरिका और अन्य पश्चिमी महाशक्तियों के साथ मजबूत सुरक्षा गठबंधन स्थापित करने पर भरोसा जताया. इसके अलावा सऊदी अरब ने पाकिस्तान के साथ भी रणनीतिक सुरक्षा समझौते किए, जिससे उसे सीधे तौर पर परमाणु हथियार रखे बिनाही एक तरह की न्यूक्लियर सुरक्षा छतरी प्राप्त हो गई और उसे अपनी प्रयोगशालाएं स्थापित करने की जरूरत महसूस नहीं हुई.


पाकिस्तान के अलावा कोई और मुस्लिम देश क्यों नहीं बना पाया परमाणु बम?

औद्योगिक और वैज्ञानिक आधार

एक परमाणु बम तैयार करने के लिए सिर्फ बेहिसाब पैसा ही नहीं, बल्कि एक बेहद उन्नत वैज्ञानिक और औद्योगिक आधार की जरूरत होती है, इसके लिए उच्च स्तर की धातु विज्ञान, यूरेनियम संवर्धन सुविधाएं, उन्नत मिसाइल तकनीक और दशकों तक लगातार काम करने वाले वैज्ञानिक तंत्र की जरूरत पड़ती है.ज्यादातर मुस्लिम देश लंबे समय से आंतरिक गृहयुद्ध, तानाशाही, राजनीतिक तख्तापलट और सामाजिक अस्थिरता से जूझते रहे हैं. इस लगातार बनी रहने वाली अव्यवस्था के कारण वहां ऐसा मजबूत वैज्ञानिक अनुसंधान ढांचा कभी विकसित ही नहीं हो पाया जो परमाणु क्षमता दे सके.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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