सालों से रखे परमाणु बम खराब क्यों नहीं होते? कैसे किया जाता है इन्हें स्टोर
परमाणु बमों के कोर में इस्तेमाल होने वाले प्लूटोनियम और यूरेनियम की शेल्फ-लाइफ सीमित होने के कारण ये समय के साथ खराब हो सकते हैं, इसलिए इन्हें बेहद सख्त बंकरों में स्टोर किया जाता है.

दुनिया भर के परमाणु संपन्न देशों के पास मौजूद कई परमाणु हथियार दशकों पुरानें हैं, कुछ तो 1950 और 1960 के दशक में बनाए गए थे. ऐसे में सवाल उठता है कि आखिर इतने सालों तक रखे रहने के बाद भी यह हथियार खराब क्यों नहीं होते और इन्हें कैसे सुरक्षित रखा जाता है. दरअसल परमाणु हथियार बनते समय हमेशा के लिए चलने के हिसाब से डिजाइन नहीं किए गए थे, इसलिए इन्हें लगातार सुरक्षित और कारगर रखने के लिए एक बेहद जटिल वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाई जाती है. जिसे स्टॉकपाइल स्टीवर्डशिप कहा जाता है.
क्या परमाणु बम कभी खराब नहीं होते?
यह सोचना पूरी तरह गलत है कि परमाणु बम कभी खराब नहीं होते, एक परमाणु बम के अंदर दो मुख्य हिस्से होते हैं- पहला उसका मुख्य परमाणु ईधन जैसे यूरेनियम या प्लूटोनियम और दूसरा उसका इलेक्ट्रॉनिक और मैकेनिकल ट्रिगर सिस्टम.
यूरेनियम और प्लूटोनियम जैसे रेडियोएक्टिव तत्व बहुत धीरे-धीरे खत्म होते हैं. यूरोनियम की उम्र तो अरबों साल की होती है, लेकिन प्लूटोनियम समय के साथ बदलने लगता है. लगभग 10 से 20 साल में यह इतना बदल जाता है कि बम की मारक क्षमता कम हो सकती है. इसके अलावा, बम के अंदर लगे कंप्यूटर चिप्स, तार, प्लास्टिक सील और पारंपरिक विस्फोटक समय के साथ नमी या गर्मी के कारण खराब हो सकते हैं. इसलिए इन्हें समय-समय पर बदलना पड़ता है.
कैसे किया जाता है इन्हें सुरक्षित स्टोर?
परमाणु बमों को किसी सामान्य गोदाम या बंकर में ऐसे ही नहीं रख दिया जाता. इन्हें सुरक्षित रखने के लिए दुनिया के महाशक्ति देश बेहद हाईटेक अंडरग्राउंड बंकर का इस्तेमाल करते हैं. जिन बंकरों में परमाणु हथियारों को रखा जाता है, वहां का तापमान, नमी और हवा का दबाव पूरी तरह कंप्यूटर द्वारा नियंत्रित किया जाता है. वहां नमी बिल्कुल जीरो रखी जाती है, ताकि आंतरिक हिस्से में जंग न लगे.
इसके अलावा, बम से निकलने वाले हानिकारक रेडिएशन को रोकने के लिए बंकरों की दिवारों कई फिट मोटी कंक्रीट और सीसे की परतों से बनाई जाती हैं. इन ठिकानों की सुरक्षा में आधुनिक लेजर सेंसर, मोशन डिटेक्टर और सेना के सबसे घातक कमांडो तैनात रहता हैं. बिना विशेष डिजिटल कोड के इन बंकरों के दरवाजे हिलाए भी नहीं जा सकते.
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स्टॉकपाइल स्टीवर्डशिप
परमाणु बमों को बिना ब्लास्ट किए हर साल रेडी टू यूज रखने की इस पूरी प्रक्रिया को स्टॉकपाइल स्टीवर्डशिप कहा जाता है. इसके तहत वैज्ञानिक हर साल कुछ बमों को स्टोरेज से बाहर निकालते हैं, इसके बाद लेब में रोबोटिक मशीनों के जरिए बम को पूरी तरह खोलकर उसके एक-एक पूर्जे की जांच की जाती है.
अगर कोई तार, बैटरी या प्लास्टिक की सील कमजोर दिखाई देती है, तो उसे तुरंत नए पुर्जे से बदल दिया जाता है. इसके परमाणु ईधन को भी साफ करके दोबारा रि-साइकल किया जाता है. यही वजह है कि 40-50 साल पुराने होने के बाद भी ये परमाणु बम हमेशा नए जैसे बने रहते है और कभी एक्सपायर नहीं होते.
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