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नदी किनारे होने के बाद भी क्यों नहीं धंसती ताजमहल वाली जमीन? ये है कारण

1978 और 2010 में ताजमहल यमुना की बाढ़ को सह चुका है, लेकिन अपनी नायाब इंजीनियरिंग के कारण यह इमारत वैसी की वैसी ही खड़ी रही. शाहजहां के दरबारी इतिहासकार ने इस नायाब इंजीनियरिंग का वर्णन भी किया है. 

बीते दिनों यमुना नदी में जब बाढ़ आई तो दिल्ली के कई इलाके जलमग्न हो गए और हाहाकार मच गया था. यही यमुना नदी आगरा में मोहब्बत की निशानी ताजमहल के करीब से भी गुजरती है. यमुना कई बाद उफान पर आई, इसका पानी ताजमहल की दीवारों से टकराया और वापस लौट गया, लेकिन ताजमहल टस से मस नहीं हुआ. मुगल बादशाह शाहजहां द्वारा बनवाई गई यह इमारत आज भी वैसे की वैसी ही खड़ी है. 

यमुना नदी के किनारे पर होने के बावजूद ताजमहल की सुरक्षा उसकी नायाब इंजीनियरिंग करती है, जो मुगलों के समय में अपनाई गई थी. कई वैज्ञानिक और इंजीनियर भी इसको लेकर हैरान हैं और सोच में पड़े रहते हैं कि नदी किनारे होने के बाद भी ताजमहल के नीचे की जमीन धंसती क्यों नहीं? इसका कारण क्या है? आज हम मुगल कालीन इस शानदार इंजीनियरिंग के बारे में बताएंगे. 

कई बार आई बाढ़

ऐसा नहीं है कि यमुना नदी कभी उफान पर नहीं आई और ताजमहल वाली जगह बाढ़ग्रस्त नहीं हुई. भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधिकरियों के मुताबिक, 1978 और 2010 में ताजमहल यमुना की बाढ़ को सह चुका है, लेकिन अपनी नायाब इंजीनियरिंग के कारण यह इमारत वैसी की वैसी ही खड़ी रही. शाहजहां के दरबारी इतिहासकार अब्दुल हामिद लाहौरी ने इस इंजीनियरिंग का वर्णन भी किया है. 

कैसी है मुगलों के समय की इंजीनियरिंग

कहा जाता है कि जब शाहजहां ने ताजमहल बनवाने के लिए इस जगह का चुनाव किया था तब यहां यमुना नदी का बहाव बहुत ज्यादा था. उस समय यमुना ताजमहल के बिल्कुल बगल से बहती थी. इसलिए इसे इस तरह से डिजाइन किया गया था कि यमुना के पानी से इस इमारत को किसी तरह का नुकसान न हो. ताजमहल की इंजीनियरिंग के बारे में इतिहासकार अब्दुल हामिद लाहौरी ने लिखा है कि शाहजहां ने जानबूझकर इस जगह का चुनाव ताजमहल को बनवाने के लिए किया था. दरअसल, जिस जगह पर ताजमहल को बनाया गया है, वह क्षेत्र यमुना नदी के घुमाव के किनारे है. ऐसे में बाढ़ या कटाव होने पर यमुना का मोड़ ही इस इमारत को बचाता है. 

ताजमहल की नींव पर नहीं होता पानी का असर

ताजमहल की नींव इतनी ज्यादा मजबूत है कि इस पर यमुना के पानी का बिल्कुल असर नहीं होता है. इसकी नींव में महोगनी और आबनूस की लकड़ी का इस्तेमाल हुआ है. यह लकड़ी न ही सड़ती है और न पानी में खराब होती है. 1990 में IIT रुड़की ने ताज का सर्वेक्षण किया था, जिसमें यह बात निकलकर आई थी कि इमारत की नींव में इस तरह की लकड़ी है, जिस पर पानी का कोई असर नहीं होता और यह सुरक्षित बनी हुई है. इसके अलावा यमुना के पानी के ताजमहल को बचाने के लिए इसके आसपास 42 कुओं का भी निर्माण किया गया था. 

यह भी पढ़ें: तबाही के अलावा भारत को ये शानदार चीजें दे गए मुगल, हर कोई करना चाहता है दीदार

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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