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Poet Names: कहां से आया शहरों के साथ अपना नाम जोड़ने का चलन, शायर क्यों करते हैं ऐसा?

Poet Names: कई शायर अपने नाम के आगे अपने शहर का नाम लगाते थे. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह और कहां से शुरू हुई यह परंपरा.

Poet Names: उर्दू और फारसी लिटरेरी कल्चर में एक रिवाज अपने चार्म, एलिगेंस और हिस्टोरिकल जड़ों के लिए सबसे अलग है. यह रिवाज है शायर के नाम में उसके शहर का नाम जोड़ने का रिवाज. अब चाहें अकबर इलाहाबादी हों, फिराक गोरखपुरी, जिगर मुरादाबादी या फिर हसरत मोहानी हों ये नाम न सिर्फ शायर बल्कि उस जगह की भी याद दिलाते हैं जिसने उनकी पहचान को बनाया. यह रिवाज अचानक नहीं आया बल्कि सदियों पुराने शायरी के रिवाज से बढ़ा है जिसमें तखल्लुस अपनाया जाता था. तखल्लुस का मतलब होता है एक शायराना पेन नेम. 

तखल्लुस का रिवाज

तखल्लुस का कॉन्सेप्ट काफी पुराना है. क्लासिकल उर्दू और फारसी शायरी में शायर ट्रेडिशनल एक पेन नाम का इस्तेमाल करता था जो गजल के आखिरी शेर जिसे मक्ता कहते हैं, में आता था. इससे शायरी को एक पर्सनल सिग्नेचर मिलता था. समय के साथ शायरों ने इस नाम को उस शहर के साथ जोड़ना शुरु कर दिया जिससे वह जुड़े थे. 

विरासत की पहचान 

किसी शहर का नाम जोड़ना अपनी विरासत को सबके सामने बताने का एक तरीका बन चुका था. ऐसी दुनिया में जहां शायर दूर-दूर तक घूमते थे, शाही दरबारों में परफॉर्म करते थे और पहचान के लिए मुकाबला करते थे, शहर से यह कनेक्शन तुरंत पहचान के रूप में बन जाता था. इससे यह पता चलता था कि वह कहां पैदा हुए थे, उन्होंने कहां कविता सीखी थी या फिर उन्हें कहां शोहरत मिली.

पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा 

उर्दू शायरी जो फारसी साहित्यिक रीति रिवाज से काफी ज्यादा प्रभावित थी शुरू में इस नामकरण स्टाइल को अपना चुकी थी. वक्त के साथ-साथ यह एक इज्जतदार परंपरा बन गई. पूरे भारत के शायरों ने इसे गर्व की निशानी के रूप में अपनाया. देहलवी, लखनवी, रामपुरी और हैदराबादी जैसे नाम पूरे शायरी स्कूल और स्टाइल की पहचान बन गए. 

लंबे नाम को आसान बनाना 

कई क्लासिकल शायरों के नाम बहुत ज्यादा लंबे और फॉर्मल होते थे. शायर का नाम छोटा, रिदमिक और आसानी से शायरी में शामिल होने लायक होना चाहिए था. अब शहर का नाम इस्तेमाल करने से यह एक आसान रास्ता मिला. जैसे सैयद फजल उल हसन ने अपना नाम बदलकर हसरत मोहानी कर लिया क्योंकि उत्तर प्रदेश के मोहन से थे. 

एक कल्चरल गर्व 

पीढ़ियों से शायर शहरों के नाम का इस्तेमाल कल्चरल गर्व की निशानी के तौर पर कर रहे हैं. इससे न सिर्फ अपने शहर की पहचान दिखाई जाती है बल्कि कभी-कभी पुरखों की जड़ों को भी दिखाया जाता है. जैसे निदा फाजली ने फाजली इसलिए जोड़ा क्योंकि उनके पुरखे कश्मीर के फाजिला नाम की इलाके से थे.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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