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Khamenei Funeral: मौत के बाद अब तक नहीं हुआ खामेनेई का अंतिम संस्कार, कितने दिन तक सुरक्षित रखी जा सकती है लाश?

Khamenei Funeral: खामेनेई की मृत्यु के बाद अभी तक भी उनकी अंतिम संस्कार की रस्में पूरी नहीं हुई हैं. आइए जानते हैं कि आखिर एक शव कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है.

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Khamenei Funeral: ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई का निधन हो चुका है. रिपोर्ट्स के मुताबिक उनका निधन 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल द्वारा किए गए एक संयुक्त हवाई हमले में हुआ था. मौत के इतने दिनों बाद भी उनके अंतिम संस्कार की रस्में अभी तक पूरी नहीं हुई हैं. इस बात ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं कि आखिर उनकी अंतिम संस्कार के रस्में अब तक क्यों नहीं निभाई गई और दफनाने से पहले किसी शव को असल में कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

शिया इस्लाम में दफनाने की परंपराएं 

शिया इस्लाम के अनुयायियों के बीच अंतिम संस्कार की रस्मों में तुरंत दफनाने पर जोर दिया जाता है. जब किसी व्यक्ति की मौत हो जाती है तो उसके शव को आमतौर पर गुस्ल यानी स्नान कराया जाता है और कफन नाम के एक सफेद कपड़े में लपेटा जाता है. इसके बाद जनाजा नमाज के बाद जितनी जल्दी हो सके शव को दफना दिया जाता है. 

देरी के पीछे सुरक्षा से जुड़ी चिंताएं 

खामेनेई के मामले में अंतिम संस्कार में देरी की मुख्य वजह सुरक्षा बताई जा रही है. क्योंकि वह ईरान के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक और धार्मिक हस्तियों में से एक थे इस वजह से उम्मीद है कि उनके अंतिम संस्कार के जुलूस में भारी भीड़ उमड़ेगी. अधिकारियों को ऐसा डर है कि मौजूद क्षेत्रीय तनाव के बीच लोगों का इतना बड़ा जमावड़ा किसी हमले या सुरक्षा संबंधी घटना का संभावित निशाना  बन सकता है. यही वजह है कि कथित तौर पर अंतिम संस्कार को तब तक के लिए टाल दिया गया है जब तक कि सुरक्षा इंतजाम मजबूत ना हो जाएं.

किसी शव को कितने समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है?

वैज्ञानिक नजरिया से देखें तो किसी शव को कितने समय तक सुरक्षित रखा जाता है यह काफी हद तक इस्तेमाल की गई तकनीक पर निर्भर करता है. अगर किसी शव को कोल्ड स्टोरेज या फिर रेफ्रिजरेशन में रखा जाता है तो उसके सड़ने गलने की प्रक्रिया काफी धीमी हो जाती है. बिना किसी रासायनिक उपचार के भी किसी शव को आमतौर पर रेफ्रिजरेटेड वातावरण में कई हफ्तों तक सुरक्षित रखा जा सकता है. 

एम्बामिंग के जरिए शव संरक्षण

कई देशों में इस्तेमाल की जाने वाली एक और विधि है एम्बामिंग. इसमें शरीर से खून निकल कर उसके जगह फॉर्मेल्डिहाइड जैसे रासायनिक संरक्षक भर दिए जाते हैं. यह प्रक्रिया किसी शव को महीनों या सालों तक भी सुरक्षित रख सकती है. लेकिन इस्लामी परंपराओं में आमतौर पर इस प्रक्रिया से परहेज किया जाता है क्योंकि इसमें रसायनों का इस्तेमाल करके शरीर में बदलाव करना शामिल होता है. 

प्राचीन और आधुनिक ममीकरण

कुछ संस्कृतियों में शवों को ममीकरण के जरिए काफी लंबे समय तक सुरक्षित रखा गया है. यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें नमी को हटा दिया जाता है और सड़ने से रोका जाता है. प्राचीन सभ्यताएं इस तकनीक का इस्तेमाल शवों को दशकों या यहां तक कि सदियों तक सुरक्षित रखने के लिए करती थीं.

क्योंकि  इस्लामी रीति रिवाजों में आमतौर पर रासायनिक संरक्षण की अनुमति नहीं होती इस वजह से शवों को दफनाने तक आमतौर पर प्राकृतिक तरीके से ही सुरक्षित रखा जाता है. मृतक के शव को एक ठंडे, सूखे और सुरक्षित माहौल में रखा जाता है. सड़ने की प्रक्रिया को धीमा करने के लिए रेफ्रिजरेशन में या फिर बर्फ के साथ रखा जाता है. शव को गुस्ल और कफन में लपेटने के बाद उसे दफनाने की रस्म पूरी होने तक एक ताबूत में रखा जा सकता है या फिर एक सुरक्षित कमरे में रखा जा सकता है.

यह भी पढ़ें: किस धर्म के व्रत होते हैं सबसे कठिन, हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई और जैन धर्म में क्या है परंपरा?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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