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'जो लोग इजरायल को फादरलैंड मानते हैं, वो भी...', ईरान-इजरायल युद्ध पर संजय राउत का बयान

Maharashtra News In Hindi: ईरान-इजरायल युद्ध को लेकर शिवसेना यूबीटी सांसद संजय राउत ने अमेरिका और इजरायल के साथ-साथ इजरायल को ‘फादरलैंड’ मानने वालों को भी जिम्मेदार बताया है.

एक तरफ ईरान, इजरायल और अमेरिका के बीच संघर्ष जारी है, वहीं दूसरी तरफ इस जंग को लेकर भारत में भी राजनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं. शिवसेना यूबीटी के राज्यसभा सांसद और प्रवक्ता संजय राउत ने इस युद्ध के लिए केवल अमेरिका और इजरायल को ही जिम्मेदार नहीं ठहराया. उनका कहना है कि जिन्होंने इजरायल को ‘फादरलैंड’ माना, वे भी इस युद्ध के लिए समान रूप से जिम्मेदार हैं.

सामना में लिखा तीखा लेख

संजय राउत ने अपने साप्ताहिक लेख में कहा कि यह मान लेना गलत होगा कि ईरान-इजरायल युद्ध समाप्त हो गया है. उनके अनुसार किसी भी एकतरफा घोषणा से युद्ध का अंत नहीं हो जाता. उन्होंने कहा कि इस संघर्ष के लिए इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जितने जिम्मेदार हैं, उतने ही वे लोग भी हैं जिन्होंने इजरायल को ‘फादरलैंड’ (पितृभूमि) के रूप में स्वीकार किया है. उन्होंने कहा कि इन सबको ‘युद्ध अपराधी’ ही माना जाना चाहिए.

ट्रंप के बयान पर भी उठाए सवाल

लेख में राउत ने ट्रंप के कई बयानों की भी आलोचना की. उन्होंने कहा कि ट्रंप द्वारा युद्ध को जीत लेने की घोषणा करना वास्तविकता से दूर है. उनके अनुसार ईरान ने साफ संकेत दिया है कि वह पीछे हटने को तैयार नहीं है और संघर्ष को अंत तक ले जाने का रुख रखता है.

उन्होंने लिखा, 'ट्रंप द्वारा एकतरफा वो युद्ध जीत गए हैं घोषित कर देने से युद्ध का परिणाम निकल गया, ऐसा नहीं कहा जा सकता. राष्ट्रपति ट्रंप ने युद्धकाल में कई बार मूर्खतापूर्ण बयान दिए. उन्होंने यह कहकर अपने बौद्धिक दिवालियापन का परिचय दिया कि अपने दामाद जेरेड कुशनर के कहने पर मैंने ईरान के साथ युद्ध किया. यह साफ तौर पर सिरफिरापन है.'

युद्ध के कारणों पर उठे सवाल

राउत का कहना है कि ईरान का लगभग तीन हजार वर्षों का इतिहास है, जबकि इजरायल का वैसा नहीं है. यहूदी (ज्यू) लोगों ने अपने लिए जो देश खड़ा किया, उसे अभी सौ साल भी पूरे नहीं हुए हैं. उन्होंने अरबों की भूमि पर घुसपैठ कर और जमीन पर कब्जा कर अपना देश बनाया.

राउत ने लिखा कि इस युद्ध का वास्तविक कारण अब तक स्पष्ट नहीं हो पाया है. इजरायल की ओर से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खतरा बताया गया, लेकिन यह परमाणु हथियारों का युद्ध नहीं है. ईरान परमाणु कार्यक्रम कर रहा है और उसने परमाणु बम बना लिया है, यह नेतन्याहू का आरोप यदि सच होता तो वह परमाणु बम ईरान ने इजरायल पर फेंकने में देर नहीं की होती. ईरान के पास मिसाइलों का प्रचंड भंडार है और उस हमले में नेतन्याहू जैसे लोगों की भागदौड़ मच गई.

उन्होंने इस जंग को एक प्रकार का धर्मयुद्ध बताया है. वो लिखते हैं कि ‘यहूदी Vs मुसलमान’ ऐसा यह युद्ध का प्रकार स्पष्ट दिखता है और इसे जेफरी एपस्टीन की गुप्त फाइलों का संदर्भ है. स्वयं एपस्टीन यहूदी था और वह मोसाद के लिए बड़ी भूमिका निभा रहा था. राष्ट्रपति ट्रंप का दामाद जेरेड कुशनर यहूदी है. अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर यहूदी लोगों की पकड़ है. अमेरिका के प्रभावशाली यहूदी इकट्ठा हुए और उन्होंने युद्ध की चिंगारी भड़काई है.

आम नागरिकों को सबसे ज्यादा नुकसान

लेख में उन्होंने कहा कि युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को होता है. उन्होंने दावा किया कि इजरायल की राजधानी तेल अवीव में हमलों से भारी नुकसान हुआ और हजारों लोगों के घर तबाह हो गए. राउत के मुताबिक गाजा में जो हालात बने थे, वैसी ही तबाही अब इजरायल में भी देखने को मिल रही है.

उन्होंने ये भी लिखा कि युद्ध में इजरायल की राजधानी तेल अवीव का भारी नुकसान हुआ. पूरी दुनिया का ‘ईंधन’ हॉर्मुज जलडमरूमध्य में ईरान ने रोक कर रखा है. ‘इजरायल अजेय है और उसकी सुरक्षा व्यवस्था अभेद्य है’, यह जो भ्रम और दंतकथा निर्माण हुई थी, उस पर ईरान ने हमला किया. इजरायल के हवाई अड्डे, रिफाइनरी, मानवीय बस्तियां, अमीरों के टावर, उद्योग ईरान के हमलों में नष्ट हो गए हैं.

संयुक्त राष्ट्र और वैश्विक राजनीति पर टिप्पणी

संजय राउत ने वैश्विक राजनीति और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भी सवाल उठाए. उन्होंने कहा कि संयुक्त राष्ट्र जैसे संस्थानों की प्रभावशीलता अब कम होती दिख रही है. उनके अनुसार बड़े देश अपनी ताकत के आधार पर फैसले लेते हैं और इसका खामियाजा आम जनता को भुगतना पड़ता है.

उन्होंने कहा कि युद्धकाल में इजरायल को ‘फादरलैंड’ के रूप में मान्यता देनेवाले भी जिम्मेदार हैं. ये सभी लोग युद्ध अपराधी हैं. जनता को उन्हें सत्ता से नीचे खींचना चाहिए. लोगों ने आपको सत्ता इसलिए दी थी, ताकि आप अपनी जनता और देश का कल्याण करें, न कि दूसरों के देश में घुसकर युद्ध करने के लिए. सबसे पहले ‘संयुक्त राष्ट्र’ नामक संस्था पर ताला लगा देना चाहिए, क्योंकि उनकी बात अब कोई नहीं सुनता. बड़े राष्ट्र परवाह नहीं करते और छोटे राष्ट्रों के मन में भी संयुक्त राष्ट्र के प्रति सम्मान नहीं बचा है. हर एक का एक बाल देवता और फादरलैंड है. उन देवताओं की पूजा करके फादरलैंड के सामने वे आत्मसमर्पण करते हैं.

नम्रता अरविंद दुबे 10 वर्षों से अधिक समय से टीवी पत्रकारिता में विभिन्न मुद्दों को कवर कर रही हैं. वर्तमान में ABP न्यूज़ में बतौर संवाददाता कार्यरत हैं.

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