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जुगनू क्यों गायब हो रहे हैं? आपने आखिरी बार धरती पर टिमटिमाते इन तारों को कब देखा

जुगनू कोलियोप्टेरा समूह के लैंपिरिडी परिवार से संबंध रखते हैं. सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि यह जुगनू पृथ्वी पर डायनासोर के युग से हैं. पूरी दुनिया में जुगनुओं की लगभग 2000 प्रजातियां हैं.

जुगनू तेजी से गायब हो रहे हैं. क्या आपको याद है आपने आखिरी बार इन्हें कब देखा था. शहर तो छोड़िए अब ये हमारे गांवों से भी गायब हो गए हैं या गायब हो रहे हैं. ऐसा सिर्फ भारत में नहीं हो रहा है... बल्कि, पूरी दुनिया में जुगनू तेजी से गायब हो रहे हैं. यह गंभीर विषय है, क्योंकि रात में प्रकृति की ओर से दिए गए ये खूबसूरत तोहफे अब हमें अपने आसपास टिमटिमाते हुए नहीं दिखाई देते हैं.

कुछ विशेषज्ञ कहते हैं कि ऐसा इसलिए है क्योंकि हमारा वातावरण तेजी से बदल रहा है और यह जुगनुओं के अस्तित्व के लिए ठीक नहीं है. आपको जानकर हैरानी होगी कि दुनिया भर में जितने भी कीट पतंगे मौजूद हैं, उनमें जुगनुओं की हिस्सेदारी लगभग 40 फ़ीसदी है. सबसे बड़ी बात की ये पृथ्वी पर डायनासोर के समय से मौजूद हैं.

यह कैसे चमकते हैं

जुगनू रात में इसलिए चमकते हैं क्योंकि इनके पेट में एक रोशनी उत्पन्न करने वाला अंग होता है. दरअसल, जुगनू विशेष कोशिकाओं से ऑक्सीजन ग्रहण करता है और इसे अपने शरीर में एक लूसीफेरिन नामक तत्व से मिला देता है. जैसे ही ऑक्सीजन और लूसीफेरिन मिलता है, इनके रिएक्शन से एक रोशनी उत्पन्न होती है. इस रोशनी को बायोल्यूमिनिसेंस कहते हैं. हालांकि, इस रोशनी में गर्मी बिल्कुल ना के बराबर होती है.


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डायनासोर के युग से हैं जुगनू

जुगनू कोलियोप्टेरा समूह के लैंपिरिडी परिवार से संबंध रखते हैं. सबसे हैरान करने वाली बात तो ये है कि यह जुगनू पृथ्वी पर डायनासोर के युग से हैं. पूरी दुनिया में जुगनुओं की लगभग 2000 प्रजातियां हैं. अगर अंटार्कटिका को छोड़ दिया जाए तो पूरे पृथ्वी पर इनकी मौजूदगी के निशान मिलते हैं. भारत जैसे देश में पहले यह बहुत अधिक मात्रा में पाए जाते थे, यहां के हर इलाके में इनका अलग एक नाम हुआ करता था. लेकिन अब यह जीव धीरे-धीरे विलुप्ति की कगार पर आ गए हैं.

जीवन का संकेत हैं जुगनू

ये तारों की तरह टिमटिमाते जीव जीवन का संकेत हैं. अगर ये जीव आपके आसपास रह रहे हैं तो समझ जाइए कि आप जहां रह रहे हैं वहां का वातावरण जीवन जीने योग्य है. दरअसल, जुगनू बदलते वातावरण के प्रति बहुत ज्यादा संवेदनशील होते हैं. यह जीव वहीं जीवित रह सकते हैं जहां शुद्ध वातावरण और पानी में जहरीले रसायनों का मिश्रण ना हो. यहां तक कि यह छोटे से जीव आपको कैंसर जैसी मृत्यु दायक बीमारी से भी बचा सकते हैं. साल 2015 में नेचर कम्युनिकेशंस में एक लेख प्रकाशित हुआ था. इसमें कहा गया था कि स्विट्जरलैंड के कुछ वैज्ञानिकों ने जुगनुओं को चमकने में मदद करने वाले प्रोटीन को एक केमिकल में मिलाकर जब इस मिश्रण को एक ट्यूमर वाली कोशिका से जोड़ा तो यह चमक उठा.


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इंसान इनके दुश्मन बन रहे हैं

गांव में तेजी से पेड़ कट रहे हैं, जिन इलाकों में कभी घास और झाड़ियों के मैदान हुआ करते थे उन्हें अब तेजी से साफ किया जा रहा है. यह जुगनुओं का घर था. साल 2018 में इकोलॉजी एंड इवोल्यूशन की एक रिपोर्ट प्रकाशित हुई थी, इसमें बताया गया था कि प्रकाश प्रदूषण के कारण जुगनू रास्ता भटक रहे हैं, यहां तक कि वह इसकी वजह से अंधे हो रहे हैं. दरअसल, घने पेड़ और झाड़ियां इन्हें प्रकाश प्रदूषण से बचाती हैं, लेकिन अब यह तेजी से खत्म हो रहे हैं और इसी के साथ खत्म हो रहा है सितारों की तरह धरती पर चमकने वाले जुगनुओं का संसार.

वसंत आया लेकिन जुगनू नहीं आए

साल 2016 में साइंस में प्रकाशित एक 12 साल तक चले रिसर्च रिपोर्ट में कहां गया कि वसंत ऋतु में जुगनू अपने पीक पर होते हैं. इसका कारण बताया जाता है कि वसंत में नमी होती है, इसकी वजह से जुगनू इस मौसम में खूब दिखाई देते हैं. लेकिन पिछले कुछ वर्षों से न जाने कितने वसंत आए और गए, लेकिन जुगनू नहीं दिखाई दिए. आने वाली पीढ़ियां अब जुगनुओं को सिर्फ किताबों में पढ़ेंगी और वीडियो के माध्यम से उन्हें देखेंगी. अफसोस इस बात का है कि उन्हें हासिल नहीं होगी वह खुशी जो कभी बचपन में हमें मिलती थी... जब अपनी हथेली पर हम शाम को टिमटिमाते जुगनुओं को रखकर कौतूहलता से सिर्फ उन्हें एकटक निहारते रहते थे.


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विलुप्ति के कगार पर छोटे जीव

नेचर क्लाइमेट चेंज में प्रकाशित एक रिसर्च के अनुसार, आने वाले 50 से 100 सालों में पृथ्वी पर मौजूद तमाम कीट पतंगों की 65 फीसद आबादी विलुप्त हो सकती है. इस रिसर्च में बताया गया कि ये सब कुछ तेजी से बदलते जलवायु के कारण हो रहा है. गंभीर क्लाइमेट चेंज की वजह से उष्मीय दबाव बढ़ रहा है, जिसकी वजह से इन कीट पतंगों की जनसंख्या स्थिर हो रही है और इसने इनके विलुप्त होने के जोखिम को और भी ज्यादा बढ़ा दिया है. इस रिसर्च में यहां तक कहा गया है कि आने वाले कुछ वर्षों में अगर क्लाइमेट चेंज इसी तरह होता रहा तो इनके विलुप्त होने के पूर्वानुमान और भी तेज हो जाएंगे.

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सुष्मित सिन्हा एबीपी न्यूज़ के बिज़नेस डेस्क पर बतौर सीनियर सब एडिटर काम करते हैं. दुनिया भर की आर्थिक हलचल पर नजर रखते हैं. शेयर बाजार के उतार-चढ़ाव के बीच तेजी से बदलते आंकड़ों की बारिकियों को आसान भाषा में डिकोड करने में दिलचस्पी रखते हैं. डिजिटल मीडिया में 5 साल से ज्यादा का अनुभव है. यहां से पहले इंडिया टीवी, टीवी9 भारतवर्ष और टाइम्स नाउ नवभारत में अपनी सेवाएं दे चुके हैं.
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