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First Satellite In Space: किस देश ने‌ अंतरिक्ष में सबसे पहले भेजा था सैटेलाइट, जानें क्या था इसका मकसद?

First Satellite In Space: दुनिया के पहले आर्टिफिशियल सैटेलाइट ने साइंस और टेक्नोलॉजी को आकार देने में बड़ी भूमिका निभाई थी. आइए जानते हैं इसे किस देश ने लॉन्च किया था.

First Satellite In Space: दुनिया का पहला आर्टिफिशियल सैटेलाइट सोवियत यूनियन ने लॉन्च किया था. इसने साइंस, टेक्नोलॉजी और ग्लोबल पॉलिटिक्स को हमेशा के लिए बदल दिया था. वह सैटेलाइट जिसे स्पुतनिक 1 कहा जाता है 4 अक्टूबर 1957 को पृथ्वी के ऑर्बिट में दाखिल हुई थी. यहीं से स्पेस एज की शुरुआत हुई.

ऐतिहासिक लॉन्च के पीछे का देश 

सोवियत यूनियन ने यह कामयाबी कोल्ड वॉर के पीक पर हासिल की थी. इस सैटेलाइट को ऑर्बिट में कामयाबी से पहुंचाकर वह पहला देश बन गया जिसने साबित किया कि स्पेस फ्लाइट मुमकिन है. इस लॉन्च ने तुरंत यूएसएसआर की साइंटिफिक हैसियत को ऊंचा कर दिया. इस लॉन्च के तुरंत बाद पूरी दुनिया में खासकर यूनाइटेड स्टेट्स में सदमे की लहर आ गई थी. 

क्यों किया गया था इसे लॉन्च?

स्पुतनिक 1 को फोटोग्राफी, कम्युनिकेशन या मिलिट्री सर्विलांस के लिए नही डिजाइन किया गया था. इसका मकसद काफी ज्यादा बेसिक था. इसका मकसद यह साबित करना था कि एक आर्टिफिशियल चीज को पृथ्वी के  स्टेबल ऑर्बिट में लॉन्च किया जा सकता है. इस एक कामयाबी ने यह कंफर्म कर दिया कि रॉकेट इतने पावरफुल और एक्यूरेट थे कि वह पृथ्वी के एटमॉस्फेयर से बचकर स्पेस में रह सकते थे.

पृथ्वी के ऊपरी एटमॉस्फियर की स्टडी 

सेटेलाइट के सिंपल गोल डिजाइन ने साइंटिफिक रोल को निभाया. यह देखकर कि यह सैटेलाइट पृथ्वी पर वापस गिरने से पहले ऑर्बिट में कितनी देर रहा, साइंटिस्ट ऊपरी एटमॉस्फियर की डेंसिटी का अंदाजा लगा पाए. यह डेटा भविष्य के सैटेलाइट और स्पेस मिशन की प्लानिंग के लिए काफी जरूरी था.

रेडियो वेव्स के साथ एक्सपेरिमेंट 

इस सेटेलाइट के जरिए लगातार पृथ्वी पर रेडियो सिग्नल भेजा जाता था. इससे साइंटिस्ट यह स्टडी कर पाते थे कि रेडियो वेव्स आयनोस्फीयर से कैसे गुजरती है. इन सिग्नल को दुनिया भर के रेडियो ऑपरेटर पकड़ सकते थे. इससे स्पेस में स्पुतनिक की मौजूदगी सच में एक ग्लोबल इवेंट बन गई.

स्पुतनिक 1 के बारे में खास बातें

इस सैटेलाइट का वजन लगभग 83.6 किलोग्राम था और यह 50 सेंटीमीटर डायमीटर का पॉलिश किया हुआ मेटल का एक गोला था. इस गोले में चार लंबे एंटीना लगे थे. यह लगभग 29000 किलोमीटर प्रति घंटे की स्पीड से चलता था और इसकी बैटरी खराब होने से पहले 22 दिनों तक सिग्नल भेजता रहा.

इस सेटेलाइट की सफलता ने पूरी दुनिया को चौंका दिया था और सोवियत यूनियन और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच स्पेस रेस शुरू कर दी थी. इससे सीधे तौर पर साइंस एजुकेशन, रॉकेट टेक्नोलॉजी और आखिर में ह्यूमन स्पेस फ्लाइट में बड़े इन्वेस्टमेंट हुए.

ये भी पढ़ें: यह है दुनिया का पहला वाई फाई देश, लोगों को मिलता है फ्री वायरलेस इंटरनेट

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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