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Space Technology: अंतरिक्ष में सैटेलाइट्स को कहां से मिलती है बिजली, जानें कैसे किया जाता है इनका मेंटेनेंस?

Space Technology: अंतरिक्ष में बिजली का कोई भी स्रोत नहीं है. तो सवाल यह उठता है कि आखिर सैटेलाइट को ऊर्जा कहां से मिलती है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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  • अधिकांश सैटेलाइट सौर पैनलों से बिजली बनाते हैं.
  • अंधेरे में रिचार्जेबल बैटरियां बैकअप पावर देती हैं.
  • गहरे अंतरिक्ष मिशनों के लिए परमाणु ऊर्जा का उपयोग होता है.
  • पृथ्वी से रेडियो सिग्नल द्वारा सैटेलाइट की देखरेख होती है.

Space Technology: हजारों सैटेलाइट लगातार पृथ्वी का चक्कर लगा रहे हैं. यह सैटेलाइट जीपीएस, इंटरनेट, टेलीविजन, मौसम की भविष्यवाणी और संचार प्रणालियों को चलाने में मदद कर रहे हैं. लेकिन काफी कम लोग यह जानते हैं कि यह सैटेलाइट अंतरिक्ष में कैसे काम करते हैं. आइए जानते हैं कि जब अंतरिक्ष में बिजली की कोई सप्लाई नहीं होती और ना ही कोई इंसान आसपास उनकी देखभाल के लिए मौजूद होता है तो इन सैटेलाइट को ऊर्जा कहां से मिलती है.

सोलर पैनल बिजली का मुख्य स्रोत 

ज्यादातर सैटेलाइट अपने शरीर से जुड़े बड़े-बड़े सोलर पैनल पर निर्भर रहते हैं. यह पैनल सूरज की रोशनी को सोखते हैं और सौर ऊर्जा को बिजली में बदल देते हैं. जैसे-जैसे सैटेलाइट पृथ्वी का चक्कर लगाते हैं वे लंबे समय तक सूरज की रोशनी के संपर्क में रहते हैं. इस वजह से उन्हें संचार प्रणालियों, कैमरों, सेंसर और ऑनबोर्ड कंप्यूटर को चलाने के लिए जरूरी बिजली लगातार  मिलती रहती है.

अंधेरे के दौरान कैसे मिलती है बिजली ?

जब सैटेलाइट पृथ्वी की परछाई में चले जाते हैं तो सूरज की रोशनी कुछ समय के लिए गायब हो जाती है. इस दौरान रिचार्जेबल लिथियम आयन बैटरियां बैकअप बिजली देती हैं. जैसे ही सैटेलाइट वापस सूरज की रोशनी में आता है ये बैटरियां अपने आप रिचार्ज हो जाती हैं. 

परमाणु ऊर्जा का इस्तेमाल 

सूरज से काफी दूर भेजे गए सैटेलाइट और अंतरिक्ष यान जैसे कि मंगल या फिर बृहस्पति के मिशन पूरी तरह से सौर ऊर्जा पर निर्भर नहीं रह सकते. ऐसे गहरे अंतरिक्ष मीशन के लिए वैज्ञानिक रेडियोआइसोटोप थर्मोइलेक्ट्रिक जेनरेटर का इस्तेमाल करते हैं. ये सिस्टम प्लूटोनियम के रेडियोधर्मी  क्षय से पैदा होने वाली गर्मी का इस्तेमाल करके बिजली बनाते हैं. 

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अंतरिक्ष में सेटेलाइट की देखभाल कैसे की जाती है?

अंतरिक्ष में सीधे तौर पर सेटेलाइट की मरम्मत करना काफी मुश्किल और महंगा काम है. इस वजह से वैज्ञानिक पृथ्वी से ही दूर बैठकर उनकी देखभाल करने के लिए कई स्मार्ट तरीकों का इस्तेमाल करते हैं. ग्राउंड कंट्रोल स्टेशन लगातार सेटेलाइट पर नजर रखते हैं और रेडियो सिग्नल के जरिए सॉफ्टवेयर अपडेट भेजते रहते हैं. अगर कोई तकनीकी दिक्कत आती है तो इंजीनियर अक्सर ऑनबोर्ड सिस्टम को अपडेट या फिर रीस्टार्ट करके उसे दूर से ही ठीक कर देते हैं. 

इसके अलावा सैटेलाइट को इस तरह से बनाया जाता है कि उनके जरूरी हिस्सों के लिए डुप्लीकेट बैकअप सिस्टम भी मौजूद रहता है. अगर कोई एक हिस्सा काम करना बंद कर देता है तो बैकअप सिस्टम अपने आप ही उसकी जगह ले लेता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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