Delhi Khooni Darwaza History: दिल्ली के खूनी दरवाजे में क्या सच में दीवारों से टपकता है खून, यहां शाम को जाने की क्यों नहीं है इजाजत?
Delhi Khooni Darwaza: दिल्ली के खूनी दरवाजे के बारे में कई कहानियां सुनने को मिलती हैं. कहते हैं कि यहां रात के समय अजीब आवाजें सुनाई देती हैं, तो कुछ का दावा है कि इसकी दीवारों से खून टपकता है.

Delhi Khooni Darwaza History: दिल्ली अपने ऐतिहासिक किलों, स्मारकों और इमारतों के लिए दुनियाभर में मशहूर है. इन्हीं ऐतिहासिक धरोहरों के बीच एक ऐसी जगह भी मौजूद है, जिसका नाम सुनते ही लोगों के मन में डर और रहस्य दोनों पैदा हो जाते हैं. यह जगह खूनी दरवाजा है. इसके बारे में कई तरह की कहानियां सुनने को मिलती हैं. कुछ लोग कहते हैं कि यहां रात के समय अजीब आवाजें सुनाई देती हैं, तो कुछ का दावा है कि इसकी दीवारों से खून टपकता है.
हालांकि, इन बातों की कोई वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई है. इस दरवाजे का असली इतिहास कई घटनाओं से जुड़ा हुआ है. तो आइए जानते हैं कि दिल्ली के खूनी दरवाजे में क्या सच में दीवारों से खून टपकता है और यहां शाम को जाने की इजाजत क्यों नहीं है.
काबुली दरवाजा से कैसे बना खूनी दरवाजा?
इतिहासकारों के अनुसार, खूनी दरवाजा का निर्माण 16वीं सदी में अफगान शासक शेरशाह सूरी ने करवाया था. उस समय इसे काबुली दरवाजा कहा जाता था. काबुल की ओर जाने वाले काफिले इसी रास्ते से गुजरते थे. बाद में यह जगह कई खूनी घटनाओं की गवाह बनी. पुराने समय में अपराधियों को सजा देने के बाद उनके सिर इसी दरवाजे पर टांगे जाते थे, जिससे बाकी लोगों को सबक मिल सके. धीरे-धीरे यह जगह डर और सजा का प्रतीक बन गई.
कब बदला इस दरवाजे का नाम?
22 सितंबर 1857 को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के दौरान इस दरवाजे पर एक ऐसी घटना हुई, जिसने इसे हमेशा के लिए खूनी दरवाजा बना दिया. उस समय अंग्रेजों ने दिल्ली पर दोबारा कब्जा कर लिया था. बहादुर शाह जफर ने अपनी जान बचाने की शर्त पर आत्मसमर्पण कर दिया था. इसके बाद ब्रिटिश अधिकारी कैप्टन विलियम होडसन को उनके बेटों और पोते को गिरफ्तार करने की जिम्मेदारी दी गई.
तीन मुगल राजकुमारों की यहीं कर दी गई हत्या
बहादुर शाह जफर के बेटे मिर्जा मुगल, खिजर सुल्तान और पोते मिर्जा अबु बक्र ने भी आत्मसमर्पण कर दिया था. जब उन्हें खूनी दरवाजे के पास लाया गया, तब वहां बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हो गए. इसके बाद कैप्टन होडसन ने तीनों राजकुमारों को गाड़ी से नीचे उतरने को कहा, उनके ऊपरी कपड़े उतरवाए और वहीं गोली मार दी. बताया जाता है कि तीनों के शव करीब तीन दिनों तक इसी दरवाजे पर लटकाए गए थे, जिससे लोग ब्रिटिश शासन की ताकत देख सकें. इसी घटना के बाद इस दरवाजे को खूनी दरवाजा कहा जाने लगा.
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यहां शाम को जाने की क्यों नहीं है इजाजत?
खूनी दरवाजा दिल्ली के बहादुर शाह जफर मार्ग पर स्थित है और यह भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के संरक्षण में है. समय-समय पर यहां कुछ आपराधिक घटनाएं और असामाजिक गतिविधियां सामने आने के बाद सुरक्षा कारणों से इस जगह को आम लोगों के लिए बंद कर दिया गया. दरवाजे के ऊपरी हिस्से तक जाने वाले रास्ते भी बंद कर दिए गए हैं. आज लोग इसे बाहर से देख सकते हैं, लेकिन अंदर जाने की अनुमति नहीं है. यही वजह है कि शाम के बाद यहां लोगों का प्रवेश नहीं होता और यह जगह अब एक संरक्षित ऐतिहासिक स्मारक के रूप में मौजूद है.
औरंगजेब से जुड़ी घटना का भी मिलता है जिक्र
इतिहास में इस जगह का संबंध एक और बड़ी घटना से भी जोड़ा जाता है. बताया जाता है कि 10 सितंबर 1659 को औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह की हत्या करवाकर उसका सिर इसी दरवाजे पर लटकवाया था. इसी वजह से यह जगह पहले से ही खून और सत्ता संघर्ष की यादों से जुड़ी मानी जाती है.
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