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Natural Cooling: राजा महाराजा के समय बिना बिजली के भी कैसे ठंडे रहते थे महल, जानें क्या था इसके पीछे का राज?

Natural Cooling: अक्सर ही लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि जब राजा-महाराजाओं के समय में बिजली नहीं थी तब उनके महल कैसे ठंडे रहते थे? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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  • मोटी दीवारें, पत्थर, चूना, मिट्टी से बनी, गर्मी रोके रखती थीं।
  • दीवारों और छतों में छिपी नालियों से पानी, ठंडक पहुंचाता था।
  • झीलों, फव्वारों के पास निर्माण, वाष्पीकरण से हवा को ठंडा करता था।
  • खस घास के गीले पर्दों से गुजरकर हवा होती थी ठंडी।

Natural Cooling: एयर कंडीशनर, कूलर और बिजली के आने से काफी पहले राजा और महाराज काफी तेज गर्मी में भी बड़े महलों के अंदर आराम से रहते थे.  इनमें से कई शाही इमारतें बाहर के झुलसा देने वाले तापमान के बावजूद ठंडी रहती थीं.  इसके पीछे का राज जादू नहीं बल्कि प्राचीन वास्तुकला और प्राकृतिक संसाधनों के समझदारी भरे इस्तेमाल का एक शानदार मेल था. 

मोटी दीवारों का कमाल 

इन महलों के ठंडा रहने का एक सबसे बड़ा कारण उनकी बेहद मोटी दीवारें थी. सीमेंट से बनी आज की इमारतों के उलट प्राचीन महल पत्थर, चूना, मिट्टी और गारे का इस्तेमाल करके बनाए जाते थे. यह चीजें बाहर की गर्मी को धीरे-धीरे सोखती थीं और उसे कमरों के अंदर तेजी से आने से रोकती थीं. कई किलों और महलों में दीवारें कई फुट मोटी होती थीं. इससे सीधी धूप पड़ने पर भी अंदर का हिस्सा ठंडा रहता था.

पानी की छिपी हुई नालियां 

कई प्राचीन महलों में पानी से ठंडा करने की एडवांस तकनीक का इस्तेमाल किया जाता था. लोटस महल और आगरा किले जैसी जगहों पर दीवारों और खंभों के अंदर टेराकोटा के पाइप और छिपी हुई नालियां बनाई गई थी. इन नालियों से लगातार बहता पानी पत्थर की इमारतों को अंदर से ठंडा रखता था. छतों पर बने पानी के सिस्टम भी पूरे महल में तापमान को कम बनाए रखने में मदद करते थे. 

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कुछ प्राकृतिक कूलर

कई शाही महल झीलों, तालाब या फिर बावड़ियों के पास बनाए जाते थे. आंगन और बगीचे में बड़े-बड़े फव्वारे भी लगाए जाते थे. जब गर्म हवा पानी की सतह से गुजरती थी तो  वाष्पीकरण की वजह से हवा का तापमान अपने आप कम हो जाता था. इससे महल के अंदर एक आरामदायक माहौल बन जाता था. 

खस के पर्दों का इस्तेमाल 

गर्मियों के मौसम में खिड़कियों और दरवाजों पर खस घास से बने खास पर्दे और चटाइयां टांगी जाती थीं. इन पर्दों पर पानी का छिड़काव किया जाता था. जब गर्म हवा खस की गीली जाली से गुजरती थी तो वह ठंडी और खुशबूदार हो जाती थी. यह तरीका आज के कूलर जैसा ही काम करता था.

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स्पर्श गोयल एबीपी लाइव के साथ कंटेंट राइटर के तौर पर जुड़े हुए हैं. वह जनरल नॉलेज बीट की जिम्मेदारी संभालते हैं. कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में उन्हें चार साल का अनुभव है. एबीपी से पहले वह डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद में करीब दो साल तक काम कर चुके हैं. उन्होंने नमस्कार भारत से अपने करियर की शुरुआत की थी. .

वह अलग-अलग विषयों पर रिसर्च करके पाठकों के लिए जानकारी को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण अंदाज में पेश करते हैं. उन्होंने न्यूज राइटिंग के साथ-साथ स्क्रीनराइटिंग में भी अपनी पकड़ मजबूत की.

उन्होंने मां शाकुम्भरी यूनिवर्सिटी से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है. इसके साथ उन्होंने एशियन एकेडमी ऑफ फिल्म एंड टेलिविजन से स्क्रीनप्ले का डिप्लोमा भी हासिल किया है.

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