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जब खाड़ी देशों में नहीं है कोई नदी तो कहां से आता है पीने का पानी? इराक से जंग के बीच अब शुरू हुआ 'जल संकट'

Gulf Countries Drinking Water: ईरान-इजरायल जंग के बीच खाड़ी देशों में पानी का बड़ा संकट खड़ा हो गया है. बिना नदी वाले ये देश समुद्री पानी को कैसे पीने के लायक बनाते हैं, आइए जानते हैं.

ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच जारी भीषण संघर्ष ने मध्य पूर्व को एक ऐसे मुहाने पर खड़ा कर दिया है, जहां खतरा सिर्फ मिसाइलों और गिरती अर्थव्यवस्था का नहीं है. इस बार असली संकट उस चीज पर मंडरा रहा है, जिसके बिना जीवन मुमकिन नहीं- पीने का पानी. सऊदी अरब, यूएई और कुवैत जैसे 'पेट्रोस्टेट्स' जिन्हें दुनिया तेल के लिए जानती है, वे असल में तकनीक के दम पर टिके 'सॉल्टवाटर किंगडम्स' हैं. 

बिना किसी प्राकृतिक नदी के, ये देश समंदर के खारे पानी को मीठा बनाकर अपनी प्यास बुझाते हैं, लेकिन मौजूदा जंग में अब यही वाटर प्लांट्स दुश्मनों के निशाने पर हैं। अगर ये प्लांट रुके, तो रेगिस्तान के इन आलीशान शहरों में चंद दिनों के भीतर हाहाकार मच सकता है.

बिना नदी वाले देशों का जल प्रबंधन

खाड़ी देशों के भूगोल को देखें तो यहां सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), कतर और कुवैत जैसे राष्ट्रों में साल भर बहने वाली एक भी बारहमासी नदी मौजूद नहीं है. भीषण गर्मी और रेतीले धोरों के बीच इन देशों ने अपनी बढ़ती आबादी की प्यास बुझाने के लिए 'डिसैलिनेशन' (Desalination) यानी अलवणीकरण तकनीक का सहारा लिया है. 

यह एक जटिल और खर्चीली प्रक्रिया है जिसमें समुद्र के खारे पानी से नमक और अन्य अशुद्धियों को हटाकर उसे शुद्ध पेयजल में बदला जाता है. यूएई, कतर और कुवैत अपनी कुल जल आपूर्ति का 80 से 90 प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा इसी तकनीक से हासिल करते हैं. इन विशालकाय प्लांट्स को चलाने के लिए भारी मात्रा में ऊर्जा की आवश्यकता होती है, जो तेल और गैस के माध्यम से पूरी की जाती है.

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प्राकृतिक जल स्रोतों की कमी के कारण ये देश पूरी तरह से मानव निर्मित प्रणालियों पर निर्भर हो चुके हैं. यहां पानी का उत्पादन और बिजली का निर्माण अक्सर एक ही कॉम्प्लेक्स में होता है, जिन्हें 'को-जनरेशन' प्लांट्स कहा जाता है. इसके अलावा, जमीन के नीचे मौजूद 'एक्विफर्स' या भूजल का उपयोग भी किया जाता है, लेकिन इसकी मात्रा बहुत सीमित है और यह रिचार्ज नहीं होता. सिंचाई और बागवानी जैसे कार्यों के लिए ये देश सीवेज वाटर को ट्रीट (Recycle) करके इस्तेमाल करते हैं. इस पूरी व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह पूरी तरह से समुद्री तटों पर स्थित विशाल बुनियादी ढांचे पर टिकी है, जो युद्ध की स्थिति में सबसे आसान लक्ष्य बन जाते हैं.

मिसाइल और ड्रोन की जद में 'वाटर लाइफलाइन'

मौजूदा युद्ध में अब पानी के इन स्रोतों पर हमले की खबरें डराने वाली हैं. बहरीन ने हाल ही में दावा किया है कि ईरान ने उसके एक प्रमुख डिसैलिनेशन प्लांट को निशाना बनाने की कोशिश की है. इसी तरह, 2 मार्च 2026 को दुबई के जेबेल अली पोर्ट के पास हुए हमले एक बड़े वाटर प्लांट से मात्र 12 मील की दूरी पर गिरे. यूएई के फुजैराह F1 कॉम्प्लेक्स और कुवैत के दोहा वेस्ट प्लांट से भी नुकसान की खबरें सामने आई हैं. खाड़ी के देशों के लिए यह एक 'अस्तित्व का संकट' है क्योंकि पर्शियन गल्फ के तट पर स्थित ये सैकड़ों प्लांट सीधे तौर पर ईरानी मिसाइलों और ड्रोनों की पहुंच के भीतर हैं.

तकनीकी रूप से इन प्लांट्स का ढांचा बहुत संवेदनशील होता है. एक डिसैलिनेशन प्लांट में कई चरण होते हैं- समुद्री पानी खींचने वाला इनटेक सिस्टम, ट्रीटमेंट यूनिट, और सबसे महत्वपूर्ण 'ऊर्जा आपूर्ति' केंद्र. विशेषज्ञों का मानना है कि अगर मिसाइल हमले में प्लांट का केवल बिजली घर या इनटेक पंप भी क्षतिग्रस्त हो जाता है, तो पूरा प्लांट ठप हो जाएगा. कुवैत जैसा देश, जहां 90 प्रतिशत पानी इसी तकनीक से आता है, वहां एक छोटे से हमले का मतलब लाखों लोगों की प्यास का संकट है. ओमान में 86% और सऊदी अरब में लगभग 70% पानी इसी स्रोत से आता है, जो यह दर्शाता है कि पूरा क्षेत्र तकनीक के भरोसे एक पतली डोर से बंधा है.

जब युद्ध में पानी बना था सबसे बड़ा हथियार

युद्ध के दौरान पानी की आपूर्ति को निशाना बनाना कोई नई बात नहीं है, लेकिन खाड़ी क्षेत्र में इसके परिणाम भयावह होते हैं. 1990-91 के खाड़ी युद्ध के दौरान, इराकी सेना ने कुवैत से पीछे हटते समय जानबूझकर वहां के बिजली घरों और डिसैलिनेशन प्लांट्स को भारी नुकसान पहुंचाया था. उस समय कुवैत के पास पानी का कोई वैकल्पिक स्रोत नहीं था और हफ्तों तक वहां ताजे पानी की भारी कमी रही थी. आज के समय में आबादी कई गुना बढ़ चुकी है और शहरों का आकार विशाल हो गया है, जिससे जोखिम भी बढ़ गया है.

विशेषज्ञों का कहना है कि अगर आज बड़े पैमाने पर ये प्लांट बंद होते हैं, तो खाड़ी के बड़े शहरों के पास केवल कुछ ही दिनों का इमरजेंसी वॉटर स्टोरेज मौजूद है. स्टोरेज टैंक, पाइपलाइन और पंपिंग स्टेशनों पर हमला होने की स्थिति में पानी को शहरों तक पहुंचाना नामुमकिन हो जाएगा. 

चूंकि ये देश 'पेट्रोस्टेट' कहलाते हैं, दुनिया तेल की चिंता कर रही है, लेकिन हकीकत यह है कि इन 'सॉल्टवाटर किंगडम्स' के लिए तेल से भी कीमती पानी है. तेल के बिना अर्थव्यवस्था रुक सकती है, लेकिन पानी के बिना यहां जीवन का रुकना तय है. आने वाले दिनों में यह देखना होगा कि क्या यह जंग तेल के कुओं से निकलकर पानी के इन संयंत्रों तक पहुंचती है या संयम बरता जाता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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