क्या होता है जौहर का असली मतलब? जानें विवाद के बारे में सबकुछ
जौहर मध्यकालीन भारत में महिलाओं द्वारा अपने स्वाभिमान और चरित्र की रक्षा हेतु किया जाने वाला एक पवित्र एवं सामूहिक आत्मदाह अनुष्ठान था. स्वरा भास्कर की हालिया टिप्पणी ने बवाल मचाया है.

- चित्तौड़गढ़ में तीन बड़े जौहर हुए, जिसमें पद्मिनी भी शामिल।
फिल्म निर्माता संजय लीला भंसाली की ऐतिहासिक फिल्म 'पद्मावत' एक बार फिर देश भर में बहस का केंद्र बन गई है. आठ वर्षों के लंबे अंतराल के बाद इस फिल्म के जौहर वाले सीन को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है. हाल ही में अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने एक सार्वजनिक कार्यक्रम के दौरान फिल्म में दर्शाए गए सामूहिक जौहर के सीन को 'समस्याग्रस्त' और 'कायरतापूर्ण' करार दिया. इस विवादित टिप्पणी के सामने आते ही सोशल मीडिया पर तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं, जिसने आम जनता को जौहर की ऐतिहासिकता और उसकी वास्तविक पृष्ठभूमि को दोबारा गहराई से समझने पर मजबूर कर दिया है. आइए समझ लेते हैं कि जौहर क्या है और विवाद क्यों हो रहा है.
जौहर शब्द का इतिहास और अर्थ
जौहर शब्द की उत्पत्ति और इसके मूल अर्थ को लेकर इतिहासकारों में विस्तृत विवेचना मिलती है. प्रख्यात लेखक जॉन एस. हैवले ने अपनी प्रसिद्ध किताब 'सती, द ब्लेसिंग एंड द कर्स' में उल्लेख किया है कि यह शब्द मूल रूप से फारसी भाषा से प्रभावित है. वास्तव में यह शब्द 'जिवहर' का रूपांतरण माना जाता है, जिसका सीधा और शाब्दिक अर्थ 'जवाहरात', 'रत्न' या 'अमूल्य आभूषण' होता है. इतिहास में महिलाओं द्वारा अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए किए गए इस बलिदान को समाज में अनमोल और सर्वोच्च आभूषण के समान दर्जा दिया गया था.
राजपूती आन-बान और जौहर प्रथा की वजह
मध्यकालीन भारत में जौहर की परंपरा मुख्य रूप से राजपूताना संस्कृति, आत्मसम्मान और आन-बान से गहराई से जुड़ी हुई थी. जब राजा या सेनापति को युद्ध में पराजय की पूरी संभावना दिखती थी और दुश्मन सेना किले के मुहाने तक आ पहुंचती थी, तब यह कदम उठाया जाता था. बाहरी आक्रमणकारियों के हाथों में पड़ने, बंदी बनने या किसी भी प्रकार के शारीरिक और मानसिक अत्याचार से बचने के लिए राजपूत स्त्रियां आत्मदाह का रास्ता चुनती थीं. उनके लिए जीवन की तुलना में अपने स्वाभिमान और चरित्र की रक्षा करना सर्वोच्च प्राथमिकता होती थी.
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जौहर की पारंपरिक विधि और अनुष्ठान
जौहर की प्रक्रिया केवल आत्मदाह मात्र नहीं थी, बल्कि यह एक अत्यंत पवित्र और गरिमापूर्ण सामूहिक अनुष्ठान के रूप में संपन्न होती थी. किले के भीतर एक बहुत बड़ा और विशाल अग्निकुंड (जिसे जौहर कुंड कहा जाता था) तैयार किया जाता था. आत्मदाह से पहले सभी महिलाएं दुल्हन की तरह पूरा श्रृंगार करती थीं और अपने पारंपरिक लाल या पीले विवाह के जोड़े पहनती थीं. इसके बाद वैदिक मंत्रोच्चार, पूजा-पाठ और आध्यात्मिक अनुष्ठानों के साथ वे सामूहिक रूप से और हंसते-हंसते प्रज्वलित अग्नि कुंड में प्रवेश कर जाती थीं.
जौहर के बाद पुरुषों का शाका अनुष्ठान
जौहर की प्रक्रिया पूरी होने के बाद किले के पुरुषों द्वारा शाका नाम का अंतिम और अति-भीषण युद्ध लड़ा जाता था. अपनी महिलाओं के जौहर कुंड में प्रवेश करने के बाद, पुरुष जौहर कुंड की पवित्र राख को अपने माथे पर तिलक के रूप में लगाते थे. इसके बाद वे केसरिया साफे और वस्त्र धारण करके किले के मुख्य द्वार खोल देते थे. पुरुष युद्ध में अपनी निश्चित मृत्यु को जानते हुए भी दुश्मन सेना पर भूखे शेरों की तरह टूट पड़ते थे. शाका का उद्देश्य केवल दुश्मन को अधिक से अधिक नुकसान पहुंचाना और युद्धभूमि में वीरगति प्राप्त करना होता था.
इतिहास के तीन सबसे बड़े जौहर
भारतीय इतिहास में चित्तौड़गढ़ के किले में तीन ऐतिहासिक और विशाल जौहर दर्ज हैं. पहला जौहर वर्ष 1303 में हुआ था, जब अलाउद्दीन खिलजी के आक्रमण के दौरान महारानी पद्मिनी ने हजारों महिलाओं के साथ अग्नि में प्रवेश किया था.
दूसरा जौहर वर्ष 1535 में गुजरात के शासक बहादुर शाह के हमले के वक्त रानी कर्णावती के नेतृत्व में हुआ था.
इसके बाद तीसरा बड़ा जौहर वर्ष 1568 में मुगल बादशाह अकबर के चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण के दौरान लड़ा गया, जिसका विस्तृत विवरण ऐतिहासिक दस्तावेज 'आईन-ए-अकबरी' में भी स्पष्ट रूप से दर्ज मिलता है.

सिनेमा में दिखाए जौहर के सीन पर सवाल क्यों?
अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में एक चर्चा के दौरान 'पद्मावत' के अंतिम दृश्य पर गहरा ऐतराज जताया. उन्होंने साझा किया कि इस दृश्य को देखकर उनके मन में यह चिंता पैदा हुई कि सामूहिक आत्मदाह का यह चित्रण समाज, विशेषकर बलात्कार से प्रभावित महिलाओं को क्या संदेश देता है. उनका मानना था कि अपनी मर्यादा की रक्षा के लिए जीवन समाप्त कर लेने की अवधारणा गलत है और इससे उन महिलाओं में हीनभावना या कायरता का अहसास पनप सकता है जो किसी तरह के अपराध से उबरकर जीना चाहती हैं. इसी सोच के तहत उन्होंने निर्देशक संजय लीला भंसाली को चिट्ठी भेजी थी.
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