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क्या है वेलवेट डिवोर्स, क्या इसमें भी टूट जाता है रिश्ता या कहानी में है कुछ अनोखा ट्विस्ट?

इतिहास का सबसे अनोखा अलगाव 'वेलवेट डिवॉर्स' वास्तव में चेकोस्लोवाकिया के दो स्वतंत्र देशों, चेक गणराज्य और स्लोवाकिया में शांतिपूर्ण विभाजन की कहानी है. बिना किसी सैन्य हस्तक्षेप के यह पूरी तरह प्रभावी हुआ.

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  • 1993 में चेकोस्लोवाकिया दो देशों में शांतिपूर्वक विभाजित हुआ।

दुनिया के इतिहास में जब भी दो देशों या राज्यों के बंटवारे की बात आती है, तो जेहन में सबसे पहले युद्ध, खून-खराबा, दंगे और लाखों लोगों के बेघर होने की दर्दनाक तस्वीरें उभरती हैं. भारत का विभाजन हो, सोवियत संघ का टूटना हो या फिर उत्तर और दक्षिण कोरिया की जंग, हर जगह भारी तबाही देखने को मिली थी. लेकिन इसी दुनिया में एक ऐसा भी बंटवारा हुआ था जहां न तो कोई गोली चली और न ही नफरत की कोई दीवार खड़ी हुई. दो हिस्सों ने आपस में बैठकर बहुत ही शांति से बात की और बिना किसी कड़वाहट के हमेशा के लिए अलग हो गए. इतिहास की इस सबसे अनोखी और मखमली जुदाई को ही 'वेलवेट डिवॉर्स' का नाम दिया गया है, जिसने पूरी दुनिया को शांतिपूर्ण अलगाव का एक बेहतरीन और नायाब मॉडल दिखाया था.

चेकोस्लोवाकिया के जन्म और मतभेदों की शुरुआत

इस कहानी की शुरुआत साल 1918 में हुई थी जब ऑस्ट्रो-हंगेरियन साम्राज्य का पूरी तरह पतन हो गया था. इसके बाद चेक और स्लोवाक समुदाय के लोगों को एक साथ मिलाकर यूरोप के नक्शे पर एक नया देश बनाया गया जिसका नाम चेकोस्लोवाकिया रखा गया. शुरुआती सालों में तो सब कुछ सामान्य चलता रहा, लेकिन धीरे-धीरे दोनों समुदायों के बीच सामाजिक, आर्थिक और प्रशासनिक स्तर पर मतभेद पैदा होने लगे. एक ही देश का हिस्सा होने के बावजूद चेक और स्लोवाक क्षेत्रों के विकास की रफ्तार में जमीन-आसमान का अंतर था. चेक इलाका आर्थिक रूप से ज्यादा मजबूत और आधुनिक था, जबकि स्लोवाक हिस्सा विकास की दौड़ में थोड़ा पीछे छूट रहा था.

कम्युनिस्ट शासन का दबाव और दबे हुए विवाद

दूसरे विश्व युद्ध के बाद चेकोस्लोवाकिया पर सोवियत संघ के प्रभाव वाला कम्युनिस्ट शासन लागू हो गया था. इस तानाशाही और कड़े शासन के दौरान दोनों समुदायों के बीच के आपसी मतभेद और शिकायतें अंदर ही अंदर दबी रहीं क्योंकि किसी को भी आवाज उठाने की आजादी नहीं थी. लगभग 40 साल से भी अधिक समय तक कम्युनिस्ट सरकार ने देश को जबरन एक सूत्र में बांधे रखा, लेकिन अंदरूनी असंतोष लगातार सुलग रहा था. साल 1989 आते-आते सोवियत संघ की पकड़ कमजोर होने लगी और चेकोस्लोवाकिया के लोगों का गुस्सा फूट पड़ा जिसके बाद देश में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला.

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मखमली क्रांति ने उखाड़ फेंकी तानाशाही सरकार

साल 1989 में चेकोस्लोवाकिया की सड़कों पर एक ऐतिहासिक और विशाल जन आंदोलन शुरू हुआ जिसे इतिहास में 'वेलवेट रिवॉल्यूशन' यानी मखमली क्रांति कहा जाता है. इस आंदोलन की सबसे खास बात यह थी कि यह पूरी तरह से अहिंसक और शांतिपूर्ण था जिसमें छात्रों और आम नागरिकों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया था. इस मखमली क्रांति के भारी दबाव के आगे कम्युनिस्ट सरकार को घुटने टेकने पड़े और उसे देश की सत्ता छोड़नी पड़ी. इसके बाद लोकतंत्र का समर्थन करने वाले मशहूर लेखक वाक्लाव हावेल देश के पहले गैर-कम्युनिस्ट राष्ट्रपति चुने गए और देश में आजादी की नई सुबह हुई.

लोकतंत्र के आते ही उभरा अलगाव का बड़ा सवाल

कम्युनिस्ट शासन के खत्म होते ही और देश में लोकतंत्र की स्थापना के बाद सबसे बड़ा पेचीदा सवाल यह उठा कि क्या चेक और स्लोवाक लोग अब भी एक साथ रहना चाहते हैं. साल 1990 के दशक की शुरुआत में दोनों पक्षों के राजनीतिक नेताओं के बीच देश के भविष्य को लेकर गहरे मतभेद उभरने लगे. साल 1992 के चुनावों के बाद चेक समुदाय के नेता वाक्लाव क्लाउस और स्लोवाक समुदाय के नेता व्लादिमीर मेचियार के सामने यह पूरी तरह साफ हो गया कि एक साझा संघीय व्यवस्था को आगे खींचना अब नामुमकिन है. दोनों ही नेता अपने-अपने क्षेत्रों की प्राथमिकताओं को लेकर अलग-अलग राय रखते थे.

नेताओं की आपसी सहमति से बनी बंटवारे की बात

हैरानी की बात यह थी कि उस समय दोनों तरफ के आम नागरिकों के बीच देश को अलग करने की कोई बहुत बड़ी मांग या आंदोलन नहीं चल रहा था. इसके बावजूद दोनों पक्षों के राजनीतिज्ञों ने दूरदर्शिता दिखाते हुए यह फैसला लिया कि भविष्य के झगड़ों से बचने के लिए अभी शांति से अलग हो जाना ही सबसे बेहतर समाधान होगा. नेताओं के बीच बैठकों का दौर शुरू हुआ जिसमें संपत्तियों और सीमाओं के बंटवारे पर चर्चा की गई. इस पूरी बातचीत में न तो कभी सेना को बीच में आना पड़ा और न ही दोनों देशों की सीमाओं पर रहने वाले लोगों के बीच किसी तरह का कोई हिंसक विद्रोह देखने को मिला.

आधी रात को हुआ दो नए देशों का शांतिपूर्ण उदय

नवंबर 1992 में चेकोस्लोवाकिया की संघीय संसद ने कानूनी रूप से देश को दो हिस्सों में विभाजित करने के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी. इस ऐतिहासिक फैसले के तहत तय किया गया कि 1 जनवरी 1993 से दुनिया के नक्शे से चेकोस्लोवाकिया का नाम हमेशा के लिए हट जाएगा. तय योजना के अनुसार ठीक आधी रात को बिना किसी हंगामे के दो बिल्कुल नए और स्वतंत्र देशों का जन्म हुआ जिन्हें आज हम चेक गणराज्य और स्लोवाकिया के नाम से जानते हैं. पूरी दुनिया इस बात से दंग थी कि इतनी बड़ी विभाजन प्रक्रिया बिना किसी विवाद, अदालती कड़वाहट या खून की एक भी बूंद बहे पूरी हो गई थी.

वेलवेट डिवॉर्स नाम पड़ने की असली वजह

चूंकि पति-पत्नी के बीच होने वाले तलाक की तरह ही यह दो संस्कृतियों और क्षेत्रों का आपसी सहमति से अलगाव था, इसलिए इसे डिवॉर्स कहा गया. इस पूरी प्रक्रिया के मखमली अहसास, शांति और शालीनता के कारण ही इतिहासकारों ने इसे 'वेलवेट डिवॉर्स' यानी मखमली तलाक का नाम दिया. आज इस ऐतिहासिक घटना को पूरे 33 साल बीत चुके हैं.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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