डॉलर के मुकाबले कितनी है 1 रूबल की वैल्यू, भारत के रुपये से कम या ज्यादा?
रूबल और रुपये की वैल्यू का असर आम लोगों की जिंदगी पर भी पड़ता है. आइए जानें कि डॉलर के मुकाबले रूबल कहां टिकता है और क्या इसकी कीमत भारतीय करेंसी से ज्यादा है या कम है.

तेल, टैरिफ और दबाव की राजनीति के बीच अब नजर टिकती है मुद्रा की ताकत पर. ऐसे में जब रूस के विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव अमेरिका पर आर्थिक दबाव बनाने का आरोप लगाते हैं, तो सवाल उठता है कि वैश्विक मंच पर किस देश की करेंसी कहां खड़ी है. डॉलर के मुकाबले रूबल और रुपया किस स्थिति में हैं और इनकी वैल्यू क्या संकेत देती है, यही समझना आज के बदलते वैश्विक समीकरण में बेहद जरूरी हो गया है.
डॉलर के मुकाबले रूबल और रुपया
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर को सबसे मजबूत और प्रभावशाली करेंसी माना जाता है. इसी के मुकाबले अन्य देशों की मुद्राओं की स्थिति आंकी जाती है. मौजूदा दरों के अनुसार, 1 अमेरिकी डॉलर के बराबर लगभग 77.25 रूसी रूबल है. वहीं 1 अमेरिकी डॉलर के लिए करीब 90.55 भारतीय रुपये देने पड़ते हैं. इन आंकड़ों से साफ होता है कि डॉलर के मुकाबले रूबल की वैल्यू रुपये से ज्यादा मजबूत दिखाई देती है.
रूबल और रुपये की तुलना
अगर सीधे तौर पर तुलना करें, तो रूसी रूबल भारतीय रुपये से ज्यादा मजबूत नजर आता है. इसका मतलब यह है कि एक रूबल की कीमत एक रुपये से अधिक है. हालांकि आम तौर पर लोग यह सोचते हैं कि भारत की अर्थव्यवस्था बड़ी है, इसलिए रुपया ज्यादा मजबूत होगा, लेकिन मुद्रा की वैल्यू सिर्फ अर्थव्यवस्था के आकार से तय नहीं होती है. इसमें विदेशी मुद्रा भंडार, व्यापार संतुलन, तेल-गैस जैसे संसाधन और भू-राजनीतिक हालात भी बड़ी भूमिका निभाते हैं.
रूस की मुद्रा पर दबाव और मजबूती
रूस लंबे समय से पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का सामना कर रहा है. इसके बावजूद रूबल ने हाल के समय में अपेक्षाकृत स्थिर प्रदर्शन किया है. इसकी एक बड़ी वजह रूस का ऊर्जा निर्यात है. रूस तेल और गैस का बड़ा निर्यातक है, जिससे उसे लगातार विदेशी मुद्रा मिलती रहती है. इसके अलावा रूस ने कई देशों के साथ डॉलर से अलग भुगतान तंत्र अपनाने की कोशिश की है, जिससे डॉलर पर निर्भरता कुछ हद तक कम हुई है.
भारत का रुपया किन वजहों से कमजोर?
भारतीय रुपया लंबे समय से डॉलर के मुकाबले दबाव में रहा है. भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा कच्चे तेल के रूप में आयात करता है, जिससे विदेशी मुद्रा की मांग बढ़ती है. जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो रुपये पर असर पड़ता है. इसके अलावा वैश्विक अनिश्चितता, ब्याज दरों में बदलाव और विदेशी निवेश का आना-जाना भी रुपये की चाल को प्रभावित करता है.
डॉलर की ताकत और वैश्विक राजनीति
अमेरिकी डॉलर सिर्फ एक मुद्रा नहीं, बल्कि अमेरिका की ताकत का प्रतीक भी मानी जाती है. अंतरराष्ट्रीय व्यापार, तेल की खरीद-बिक्री और कर्ज देने में डॉलर की बड़ी भूमिका है. इसी वजह से जब अमेरिका किसी देश पर प्रतिबंध लगाता है, तो उसकी मुद्रा और अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ता है. रूस और भारत जैसे देश धीरे-धीरे वैकल्पिक रास्ते तलाश रहे हैं, ताकि डॉलर पर निर्भरता कम की जा सके.
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Source: IOCL




























