ईरान नहीं बना सकता परमाणु बम लेकिन इजरायल ने कैसे बना लिया, कहां से मिली टेक्नोलॉजी?
मिडिल ईस्ट में परमाणु हथियारों को लेकर हमेशा से दोहरा मापदंड रहा है. ईरान जहां वैश्विक संधियों और कड़े प्रतिबंधों के कारण चाहकर भी परमाणु बम नहीं बना पा रहा है, वहीं इजरायल ने इसे पहले ही बना लिया था.

- फ्रांस ने इजरायल को डिमोना में गुप्त परमाणु रिएक्टर बनाने में मदद की.
- फ्रांस ने अपने परमाणु परीक्षणों का डेटा इजरायल से साझा किया.
- अमेरिकी कंपनियों से यूरेनियम चोरी, नॉर्वे से भारी जल प्राप्त हुआ.
- इजरायल ने दक्षिण अफ्रीका के साथ गुप्त परमाणु परीक्षण किया.
अमेरिका और ईरान के बीच परमाणु डील को लेकर एक बार फिर खींचतान तेज हो गई है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में शांति समझौते के ड्राफ्ट में नए बदलावों की मांग की है, जिससे यह साफ है कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर दुनिया की नजरें कितनी टेढ़ी हैं. लेकिन इसी बीच एक बड़ा और जायज सवाल यह उठता है कि जिस मिडिल ईस्ट में ईरान को एक छोटा सा परमाणु बम बनाने की इजाजत नहीं है, वहीं उसके धुर विरोधी इजरायल ने पूरी दुनिया से छिपकर इतनी बड़ी परमाणु शक्ति कैसे खड़ी कर ली? आखिर इजरायल को यह घातक तकनीक किसने और कहां से दी?
फ्रांस की खुफिया दोस्ती और डिमोना का बड़ा राज
इजरायल के परमाणु संपन्न बनने की कहानी 1950 और 1960 के दशक से शुरू होती है. उस दौर में इजरायल को सबसे बड़ी और गोपनीय तकनीकी मदद फ्रांस से मिली थी. साल 1957 में फ्रांस और इजरायल के बीच एक गुप्त समझौता हुआ, जिसके तहत फ्रांस ने इजरायल के नेगेव रेगिस्तान में स्थित डिमोना में एक बेहद सीक्रेट परमाणु अनुसंधान रिएक्टर बनाने में मदद की. फ्रांस ने न सिर्फ रिएक्टर बनाया, बल्कि इजरायल को हथियार-ग्रेड प्लूटोनियम तैयार करने के लिए पुनर्संसाधन की बेहद जटिल तकनीक और वैज्ञानिक विशेषज्ञता भी मुहैया कराई.
फ्रांस के परीक्षणों से मिला इजरायल को तैयार डेटा
फ्रांस और इजरायल की यह जुगलबंदी सिर्फ रिएक्टर बनाने तक ही सीमित नहीं रही. फरवरी 1960 में फ्रांस ने जब अपना पहला सफल परमाणु परीक्षण किया, तो उसने इस बेहद संवेदनशील टेस्ट से जुड़े सभी वैज्ञानिक आंकड़े और गुप्त डेटा इजरायल के साथ साझा कर दिए. इस असीमित पहुंच की बदौलत इजरायल के वैज्ञानिकों को अपने स्तर पर कोई बड़ा परीक्षण किए बिना ही परमाणु बम की सटीक कार्यप्रणाली और डिजाइन का पूरा खाका मिल गया, जिससे उनका काम कई साल आगे बढ़ गया.
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अमेरिकी कंपनियों से यूरेनियम की रहस्यमयी चोरी
इजरायल के इस गुप्त मिशन में अमेरिका के कुछ खुफिया रास्तों का भी बड़ा योगदान रहा. अमेरिकी खुफिया एजेंसियों का मानना है कि 1960 के दशक में पेंसिलवेनिया में स्थित 'NUMEC' नामक एक अमेरिकी परमाणु ईंधन संयंत्र से बड़ी मात्रा में अत्यधिक समृद्ध यूरेनियम रहस्यमयी ढंग से गायब हो गया था. माना जाता है कि अमेरिकी और यूरोपीय यहूदी वैज्ञानिकों के एक मजबूत नेटवर्क ने इस बम-ग्रेड यूरेनियम को चुपचाप इजरायल भिजवा दिया था. इसके साथ ही वैश्विक स्तर पर फैले इस नेटवर्क ने इजरायल को कई महत्वपूर्ण क्लासिफाइड डेटा भी सौंपे.
नॉर्वे का भारी जल और दक्षिण अफ्रीका के साथ टेस्ट
एक परमाणु रिएक्टर को सुचारू रूप से चलाने और प्लूटोनियम बनाने के लिए भारी जल की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. इजरायल ने यह जरूरी संसाधन भी गुप्त रूप से नॉर्वे से हासिल कर लिया, जिसने डिमोना रिएक्टर को चालू करने में मुख्य भूमिका निभाई. अपनी तकनीक को अंतिम रूप देने के लिए इजरायल ने साल 1979 में दक्षिण अफ्रीका के साथ मिलकर दक्षिण अटलांटिक महासागर में एक गुप्त परमाणु परीक्षण भी किया, जिसे दुनिया 'वेला इंसिडेंट' के नाम से जानती है. इसी तरह इजरायल ने बिना किसी शोर-शराबे के खुद को परमाणु शक्ति बना लिया.
अस्पष्ट नीति के खेल से प्रतिबंधों से बचा इजरायल
इजरायल की सबसे बड़ी ताकत उसकी परमाणु अस्पष्टता की नीति रही है. उसने आज तक आधिकारिक तौर पर कभी यह स्वीकार नहीं किया कि उसके पास परमाणु बम हैं, और न ही कभी इसका पूरी तरह खंडन किया. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इजरायल ने कभी भी परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर नहीं किए. इस वजह से वह किसी भी अंतरराष्ट्रीय जांच के दायरे में नहीं आता और दुनिया के कड़े आर्थिक प्रतिबंधों से हमेशा सुरक्षित बच निकलता है.
ईरान के आड़े आती है अंतरराष्ट्रीय संधियों की दीवार
इजरायल के विपरीत, ईरान की स्थिति बिल्कुल अलग है. ईरान ने परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर दस्तखत किए हैं. कानूनन इस संधि से बंधे होने के कारण ईरान केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों, जैसे बिजली बनाने या मेडिकल रिसर्च के लिए ही परमाणु ऊर्जा का विकास कर सकता है. अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के निरीक्षक लगातार ईरान के परमाणु संयंत्रों की कड़ाई से निगरानी और जांच करते रहते हैं, जिससे उसके लिए चुपके से बम बनाना नामुमकिन हो जाता है.
अमेरिकी पाबंदियां और इजरायल के साइबर हमले
ईरान जब भी अपने परमाणु कार्यक्रम को थोड़ा आगे बढ़ाने की कोशिश करता है, उस पर अमेरिका और यूरोपीय देशों द्वारा बेहद कड़े आर्थिक और व्यापारिक प्रतिबंध थोप दिए जाते हैं. इन प्रतिबंधों के कारण ईरान का बैंकिंग सिस्टम और अंतरराष्ट्रीय व्यापार पूरी तरह टूट जाता है. सिर्फ इतना ही नहीं, अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के नतान्ज़ जैसे मुख्य परमाणु ठिकानों पर स्टक्सनेट जैसे खतरनाक साइबर हमले किए हैं, जिससे उनकी परमाणु मशीनें तबाह हो गईं और उनका पूरा कार्यक्रम कई साल पीछे चला गया.
वैज्ञानिकों की टारगेट किलिंग और धार्मिक फतवा
ईरान को परमाणु बम से दूर रखने के लिए इजरायल की खुफिया एजेंसी मोसाद ने उसके कई शीर्ष परमाणु वैज्ञानिकों को चुन-चुनकर मौत के घाट उतारा है. इन हमलों से ईरान का वैज्ञानिक ढांचा बुरी तरह प्रभावित हुआ है. इसके अलावा, ईरान के भीतर एक धार्मिक पहलू भी है. साल 2005 में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने एक धार्मिक फतवा जारी कर परमाणु हथियारों के निर्माण और इस्तेमाल को इस्लाम में पूरी तरह हराम घोषित किया था. हालांकि पश्चिमी देश इस फतवे को केवल एक राजनीतिक ढोंग मानते हैं.
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Source: IOCL
























