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G7 Summit: क्या है G7, यह कितना ताकतवर और रूस और चीन इसमें शामिल क्यों नहीं?

G7 Summit: जी7 समिट इस साल फ्रांस में होने जा रहा है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि आखिर यह समिट क्या है और यह कितना ताकतवर है. एक सवाल यह भी है कि इसमें चीन और रूस दोनों देश क्यों शामिल नहीं हैं.

G7 Summit: अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के मंच पर इस समय बेहद हलचल मची हुई है. फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के विशेष आमंत्रण पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 16-17 जून को आयोजित हो रहे प्रतिष्ठित जी7 शिखर सम्मेलन में शिरकत करने के लिए फ्रांस पहुंच चुके हैं. इस बेहद महत्वपूर्ण वैश्विक बैठक के दौरान प्रधानमंत्री मोदी जी7 के सभी सदस्य देशों, आमंत्रित सहयोगी राष्ट्रों और दुनिया के प्रमुख अंतरराष्ट्रीय संगठनों के शीर्ष नेताओं के साथ कई गंभीर मुद्दों पर सीधी बात करेंगे. इस बड़े वैश्विक आयोजन के बीच हर किसी के मन में यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर यह संगठन क्या है और रूस व चीन इसमें क्यों शामिल नहीं हैं. 

जी7 क्या है?

जी7 का पूरा नाम 'ग्रुप ऑफ सेवन' है, जो असल में दुनिया की सात सबसे ज्यादा विकसित और बड़ी औद्योगिक अर्थव्यवस्थाओं का एक बेहद प्रभावशाली अनौपचारिक संगठन है. इस खास समूह के भीतर अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा जैसे बेहद ताकतवर देश शामिल हैं. इस महत्वपूर्ण संगठन की शुरुआत साल 1975 में हुई थी, जब पूरी दुनिया भयानक तेल संकट, बेकाबू महंगाई और गंभीर आर्थिक अस्थिरता के दौर से गुजर रही थी. उस मुश्किल दौर में वैश्विक संकटों का हल निकालने के लिए फ्रांस ने एक बड़ी पहल की थी. फ्रांस के बुलावे पर ही अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, इटली और जापान के शीर्ष नेताओं ने मिलकर पहली बैठक की थी, जिसके बाद अगले ही साल यानी 1976 में कनाडा को भी इस समूह का हिस्सा बनाया गया और इस तरह जी7 का मौजूदा स्वरूप पूरी दुनिया के सामने आया.

बदलता हुआ वैश्विक एजेंडा

शुरुआती दौर में इस बेहद शक्तिशाली समूह को बनाने का एकमात्र मुख्य उद्देश्य दुनिया भर में लगातार उभर रही आर्थिक चुनौतियों पर मिलकर मंथन करना और उनसे निपटने के लिए एक मजबूत साझा प्लान तैयार करना था. समय बदलने के साथ-साथ इस संगठन की सोच और इसके काम करने के तौर-तरीकों में भी बहुत बड़ा बदलाव आया है. आज के समय में इस ग्रुप के मुख्य एजेंडे में केवल आर्थिक मुद्दे ही शामिल नहीं हैं, बल्कि अब इसमें पर्यावरण को बचाने के लिए जलवायु परिवर्तन, दुनिया की सुरक्षा, ऊर्जा संकट, अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद, तकनीकी विकास और दुनिया भर के बेहद संवेदनशील भू-राजनीतिक मुद्दे भी बहुत प्रमुखता से शामिल हो चुके हैं. इस मंच पर होने वाले फैसले पूरी दुनिया की नीतियों को बदलने की ताकत रखते हैं.

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कितना ताकतवर है जी7?

जी7 में कहने को तो दुनिया के सिर्फ 7 देश ही शामिल हैं, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के बहुत बड़े हिस्से पर इन देशों का सीधा नियंत्रण और भारी दबदबा है. दुनिया की तमाम बड़ी वित्तीय संस्थाओं, अंतरराष्ट्रीय निवेश, आधुनिक तकनीकी नवाचार और दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति पर इन सदस्य देशों का हमेशा से ही बहुत गहरा और महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है. इस संगठन के भीतर अमेरिका, जापान और यूरोप की सबसे बड़ी और समृद्ध अर्थव्यवस्थाएं एक साथ एक मंच पर बैठती हैं. यही सबसे बड़ी वजह है कि जी 7 की सालाना बैठकों में जो भी बड़े और कड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं, उनका सीधा और बहुत बड़ा असर वैश्विक बाजारों, अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीतियों और विभिन्न देशों के आपसी संबंधों पर साफ दिखाई देता है.

बदलती आर्थिक हिस्सेदारी

बीते कुछ सालों में दुनिया की आर्थिक स्थिति में बहुत तेजी से बदलाव देखने को मिला है. पिछले दो दशकों के दौरान चीन, भारत और दुनिया की दूसरी कई उभरती हुई बड़ी अर्थव्यवस्थाओं ने बहुत ही तेज गति से तरक्की की है. इस तीव्र विकास के कारण ही वैश्विक आर्थिक हिस्सेदारी के मामले में जी7 के देशों का ग्राफ पहले के दशकों के मुकाबले थोड़ा सा नीचे जरूर गिरा है. इसके बावजूद भी पूरी दुनिया की राजनीति, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और रणनीतिक फैसलों के मामले में इन सात देशों का सामूहिक प्रभाव आज भी उतना ही मजबूत और अटूट बना हुआ है. दुनिया का कोई भी बड़ा देश इस समूह के राजनीतिक फैसलों और उनकी रणनीतिक अहमियत को बिल्कुल भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है.

रूस जी7 में शामिल क्यों नहीं?

इस प्रभावशाली समूह के इतिहास में एक ऐसा दिलचस्प समय भी आया था जब महाशक्ति रूस भी आधिकारिक रूप से इस खास क्लब का हिस्सा बन गया था. साल 1998 में रूस को इस विशिष्ट समूह में बहुत ही सम्मान के साथ शामिल किया गया था, जिसके बाद इस संगठन का नाम बदलकर जी7 से जी8 हो गया था. हालांकि रूस का इस ग्रुप के साथ यह सफर बहुत ज्यादा लंबा नहीं चल सका. साल 2014 में जब रूस ने अंतरराष्ट्रीय नियमों को ताक पर रखकर क्रीमिया पर अपना सैन्य कब्जा कर लिया, तो अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और यूरोप के दूसरे तमाम पश्चिमी देश रूस के इस कदम के पूरी तरह खिलाफ खड़े हो गए.

रूस को दिखाया समूह से बाहर का रास्ता

पश्चिमी देशों ने रूस पर खुले तौर पर अंतरराष्ट्रीय कानूनों और दूसरे देश की संप्रभुता का उल्लंघन करने के बेहद गंभीर आरोप लगाए थे. इन बड़े विवादों के चलते ही रूस को इस समूह से हमेशा के लिए बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था. रूस के बाहर होने के बाद से यह संगठन एक बार फिर से अपने पुराने नाम यानी जी7 के रूप में ही काम कर रहा है. हालांकि रूस को इस समूह में दोबारा शामिल करने की मांग कई मौकों पर अलग-अलग देशों द्वारा उठती रही है, लेकिन वर्तमान में चल रहे यूक्रेन युद्ध के बाद इस बात की संभावना पूरी तरह खत्म हो चुकी है.

लोकतंत्र की मुख्य शर्त

अब सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण सवाल यह उठता है कि दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आर्थिक और सैन्य महाशक्ति होने के बावजूद चीन आखिर इस बेहद खास समूह का सदस्य क्यों नहीं है. इस बात पर जी7 के सभी सदस्य देश हमेशा से यह दावा करते आए हैं कि उनका यह संगठन कोई ऐसा मंच नहीं है जहां किसी देश को सिर्फ उसकी अर्थव्यवस्था के बड़े आकार या उसकी जीडीपी को देखकर सदस्यता दे दी जाए. यह संगठन मूल रूप से दुनिया के उन चुनिंदा देशों का समूह है जो पूरी तरह से लोकतांत्रिक मूल्यों पर विश्वास रखते हैं और जिनकी अर्थव्यवस्थाएं आधुनिक रूप से विकसित हैं.

चीन जी7 में शामिल क्यों नहीं?

जब 1970 के दशक में इस संगठन की स्थापना की गई थी, उस समय चीन की आर्थिक स्थिति आज जैसी मजबूत और विशाल बिल्कुल भी नहीं थी. बाद के सालों में चीन ने आर्थिक मोर्चे पर बहुत तेजी से प्रगति की और वह एक ग्लोबल महाशक्ति बनकर जरूर उभरा, लेकिन वह आज भी लोकतंत्र की बुनियादी राह से कोसों दूर खड़ा है. इसके अलावा चीन और जी 7 के सदस्य देशों के बीच मानवाधिकारों के हनन, दक्षिण चीन सागर में अवैध सैन्य विस्तार, ताइवान का पुराना विवाद, वैश्विक व्यापार के कड़े नियम और मौजूदा अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था जैसे कई बेहद संवेदनशील विषयों पर बहुत गहरे मतभेद हैं. यही मुख्य कारण है कि चीन इस लोकतांत्रिक समूह का हिस्सा नहीं है, हालांकि इसकी बैठकों में चीन से जुड़े मुद्दों पर हमेशा ही चर्चा होती है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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