केदारनाथ और नेपाल हादसे में क्या समानता, दोनों मामलों में काल कैसे बना पानी?
नेपाल की भोटेकोशी नदी और केदारनाथ की तबाही में मुख्य समानता ग्लेशियर झील का अचानक टूटना है. इस वजह से बिना बारिश के भी पानी प्रचंड काल बनकर बस्तियों को बहा ले गया.

पहाड़ी इलाकों में जब-जब कुदरत का गुस्सा फूटा है, तो इतिहास गवाह है कि इंसानों को बचने का जरा भी वक्त नहीं मिला. बीते दिन नेपाल की भोटेकोशी नदी में आई अचानक बाढ़ ने पूरे क्षेत्र में भारी तबाही मचाई है. बिना किसी पूर्व चेतावनी या भारी बारिश के अचानक उफनती नदी ने बस्तियों को अपनी चपेट में ले लिया. इस प्राकृतिक आपदा में अब तक 288 भारतीय लापता हैं और कई लोगों की जान जा चुकी है. इस भयंकर आपदा ने बिल्कुल 2013 में आई केदारनाथ आपदा की याद दिला दी है, लेकिन क्या आपको पता है कि केदारनाथ आपदा और नेपाल की आपदा में बड़ी समानता है, ग्लेशियर का फटना. चलिए इसके बारे में जानें.
केदारनाथ आपदा से नेपाल हादसे की सीधी समानता
नेपाल की इस घटना ने जून 2013 की उत्तराखंड केदारनाथ त्रासदी की यादें ताजा की हैं. दोनों ही घटनाओं के पीछे का मुख्य पैटर्न बिल्कुल एक जैसा है. केदारनाथ में भी चौराबाड़ी ग्लेशियर के ऊपर बनी झील के टूटने से मंदाकिनी नदी में विनाशकारी सैलाब आया था. नेपाल और उत्तराखंड, दोनों ही मामलों में मूसलाधार बारिश से ज्यादा नुकसान नदी के ऊपरी हिस्से में बने प्राकृतिक बांधों के अचानक टूटने से हुआ है. दोनों घटनाओं में चंद मिनटों के भीतर भारी मात्रा में पानी और मलबा नीचे की बस्तियों पर कहर बनकर टूटा.
ग्लेशियर झील फटने की प्रक्रिया
वैज्ञानिक शब्दावली में इस प्रकार की घटनाओं को ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड या जीएलओएफ (GLOF) कहा जाता है. आम भाषा में समझें तो ग्लेशियर खुद किसी गुब्बारे की तरह नहीं फटता, बल्कि ग्लेशियर के पिघलने से उसके आसपास बर्फ, मिट्टी और पत्थरों की मदद से एक अस्थाई प्राकृतिक झील बन जाती है. वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण जब ग्लेशियर तेजी से पिघलते हैं, तो इन झीलों में पानी का भार सीमा से अधिक हो जाता है. जब कोई भूकंपीय झटका आता है या भारी बर्फ खिसककर इसमें गिरती है, तो यह कच्चा बांध टूट जाता है.
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भोटेकोशी नदी में आई आपदा का घटनाक्रम
घटना 26 अगस्त की सुबह लगभग 9 बजे की है, जब नेपाल के रसुवा जिले के पास भोटेकोशी नदी में पानी का स्तर असामान्य रूप से बढ़ गया. तिब्बत की तरफ से बहकर आए मलबे और पानी के इस तेज सैलाब ने रास्ते में आने वाली हर इमारत को तबाह कर दिया. कई घर जमींदोज हो गए और लोग संभल भी नहीं पाए. नदी किनारे बनी बुनियादी संरचना पूरी तरह से नष्ट हो गई. प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, पानी आने से ठीक पहले एक तेज गर्जना सुनाई दी और देखते ही देखते चारों तरफ कीचड़ और मलबे का समंदर फैल गया.
भूकंपीय हलचल ने भी मचाई तबाही
विशेषज्ञों का मानना है कि नेपाल और चीन की सीमा के करीब बर्फ का एक विशाल हिस्सा टूटकर ल्हेन्दे नदी में गिर गया था. बर्फ का यह भारी ढेर नदी के प्रवाह में रुकावट बन गया, जिससे पीछे बहुत बड़ा जलभराव हो गया. पानी का दबाव जब बेहद बढ़ गया, तो यह प्राकृतिक रुकावट अचानक टूट गई. शोधकर्ताओं के अनुसार, तिब्बती क्षेत्र में सुबह 8:37 बजे 4.4 तीव्रता का भूकंप भी दर्ज किया गया था. इस भूकंपीय झटके के कारण बर्फ का पहाड़ खिसकने की आशंका को बल मिला है.
ग्लेशियर पिघलने और पुरानी घटनाओं से क्या जुड़ाव?
यह पहली बार नहीं है जब भोटेकोशी नदी में ऐसा हादसा हुआ है. पिछले साल 8 जुलाई को भी रसुवा क्षेत्र में इसी तरह की अचानक बाढ़ आई थी. सैटेलाइट तस्वीरों और मौसम विभाग की रिपोर्ट से यह साफ हुआ था कि उस समय भी ल्हेन्दे नदी के ऊपरी हिस्से में स्थित एक हिमनद झील के टूटने से जलप्रलय आया था. विशेषज्ञों की जांच इस दिशा में भी चल रही है कि क्या इस बार भी बर्फ का पहाड़ गिरने के साथ-साथ किसी ग्लेशियर झील का पानी इस तबाही में शामिल था, क्योंकि इस पूरे क्षेत्र में कई विशाल हिमनद मौजूद हैं.

तबाही का प्रभाव
दोनों ही त्रासदियों में मलबे के नीचे कई इमारतें और जिंदगियां दफन हो गईं. केदारनाथ में जहां हजारों लोगों ने अपनी जान गंवाई थी, वहीं नेपाल में भी इस सैलाब ने जनजीवन को पूरी तरह अस्त-व्यस्त कर दिया है. हिमालयी राज्यों में लगातार बढ़ रहे तापमान और मानवीय गतिविधियों के कारण ऐसी घटनाओं का जोखिम दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा है. यदि समय रहते इन संवेदनशील हिमनद झीलों की लगातार निगरानी और पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत नहीं किया गया, तो भविष्य में भी पानी का यह रौद्र रूप जन-धन की भारी हानि करता रहेगा.
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