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क्या होता है काला जादू, जानिए जादू में इस्तेमाल होने वाली गुड़िया का रहस्य 

काला जादू का नाम सामने आते है हमारी दिमाग में पिन लगी हुई गुड़िया की तस्वीर सामने आती है. आज हम आपको बताएंगे जादू में इस्तेमाल होने वाली उसी गुड़िया का सच. जानिए क्यों होता है गुड़िया का इस्तेमाल

 

काला जादू का नाम आते ही हमारे दिमाग में आटे से बनी हुई गुड़िया की तस्वीर सामने आती है. लेकिन काला जादू को लेकर अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग कहानियां सुनाई जाती है. आज हम आपको काला जादू और तंत्र विज्ञान के बारे में कुछ रोचक तथ्य बताएंगे. 

काला जादू

तंत्र विज्ञान के अनुसार जादू एक बहुत ही दुर्लभ प्रक्रिया है, जिसे बहुत ही विशेष परिस्थितियों में अंजाम दिया जाता है. इसे करने के लिए उच्च स्तर की विशेषज्ञता की जरूरत होती है और कुछ ही लोग इसे करने में सक्षम होते हैं. इस प्रक्रिया में एक मूर्ति जो गुड़िया जैसी दिखती है, उसका उपयोग किया जाता है. जिसे कई तरह की खाने की चीजों जैसे बेसन, उड़द के आटे आदि से बनाया जाता है. इसमें विशेष मंत्रों से जान डाली जाती है और उसके बाद जिस व्यक्ति पर जादू करना होता है, उसका नाम लेकर पुतले को जागृत किया जाता है.

काला जादू क्या होता है?

जानकारों का मानना है ये जादू और कुछ नहीं बस एक बंच ऑफ एनर्जी है. जो एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजा जाता है या कहें एक इंसान के द्वारा दूसरे इंसान पर भेजा जाता है. इसे Law of Conservation of Energy से समझा जा सकता है. जिसके अनुसार ‘’Energy may be transformed from one form to another, but it can not be created or destroyed’’. जिसका अर्थ है कि ऊर्जा को ना ही पैदा किया जा सकता है और ना ही इसे खत्म किया जा सकता है. सिर्फ इसके स्वरूप को दूसरे स्वरूप मे बदला जा सकता है. यदि ऊर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल है, तो नकारात्मक इस्तेमाल भी हो सकता है. आपको यह समझना होगा कि ऊर्जा सिर्फ ऊर्जा होती है, वह ना तो दैवीय होती है ना शैतानी. आप उसको अच्छा बुरा कुछ भी बना सकते है. 

जादू का सच

कुछ विशेषज्ञ मानते हैं पुतले से किसी इंसान को तकलीफ पहुंचाना इस जादू का उद्देश्य नहीं था. इस जादू के लिए काला जादू शब्द भी गलत है, दरअसल, ये तंत्र की एक विधा है. जिसे भगवान शिव ने अपने भक्तों को दिया था. पुराने समय में इस तरह का पुतला बनाकर उस पर प्रयोग सिर्फ कहीं दूर बैठे रोगी के उपचार और परेशानियां दूर करने के लिए किया जाता था. उस पुतले पर रोगी का बाल बांधकर विशेष मंत्रों से उसके नाम के साथ जागृत किया जाता था. उसके बाद रोगी के जिस भी अंग में समस्या होती थी, पुतले के उसी अंग पर सुई को गड़ाकर विशेषज्ञ अपनी सकारात्मक ऊर्जा को वहां तक पहुंचाता था. कुछ समय तक ऐसा करने पर तकलीफ खत्म हो जाती थी. यही कारण है कि इसे रेकी और एक्यूप्रेशर का मिश्रण भी कहा सकता है. जिसमें अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा की सहायता से किसी को जीवन दिया जा सकता है.

ज्ञान का गलत उपयोग

 किसी भी ज्ञान का गलत उपयोग होगा, तो उसका रिजल्ट गलत ही आएगा. ठीक इसी तरीके से कुछ स्वार्थी लोगों ने इस प्राचीन विधा को समाज के सामने गलत रूप में स्थापित किया. जिस तरह जादू की सहायता से सकारात्मक ऊर्जा पहुंचाकर किसी के रोग और परेशानी को दूर किया जा सकता है. ठीक उसी तरह सुई के माध्यम से किसी तक अपनी नकारात्मक ऊर्जा पहुंचाकर उसे तकलीफ भी दी जा सकती है. दरअसल कुछ लोगों ने अपने ज्ञान और अपनी ऊर्जा का उपयोग समाज को नुकसान पहुंचाने के लिए किया है. जिसके बाद से इस ज्ञान और विधा को काला जादू समझा जाता है. 
 

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