Sonam Wangchuk Hunger Strike: क्या अनशन करने वाले पर दर्ज हो सकता है आत्महत्या की कोशिश का केस, क्या हैं नियम?
Sonam Wangchuk Hunger Strike: सोनम वांगचुक लगातार 25 दिनों से अनशन पर बैठे हैं. ऐसे में सवाल है कि क्या अनशन के मामले में आत्महत्या का केस दर्ज हो सकता है कि नहीं. चलिए जानें.

Sonam Wangchuk Hunger Strike: पर्यावरण कार्यकर्ता सोनम वांगचुक द्वारा 25 से अधिक दिनों से जारी भूख हड़ताल के बीच केंद्र सरकार को लिखी गई चिट्ठी ने देश में अनशन के कानूनी पहलुओं पर नई बहस छेड़ दी है. वांगचुक ने छात्रों के खिलाफ कार्रवाई न किए जानें का भरोसा मिलने पर अनशन वापस लेने की बात कही है, नहीं तो भूख हड़ताल जारी रखने के बारे में बोला है. ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या अपनी मांगों को लेकर अनशन या भूख हड़ताल पर बैठने वाले किसी नागरिक के खिलाफ आत्महत्या के प्रयास से जुड़ी धाराओं के तहत पुलिस केस दर्ज किया जा सकता है, इस मामले में कानून क्या कहता है.
अनशन से जुड़े मामले में क्या कहता है कानून?
अनशन से जुड़े मामलों में कानूनी नजरिया काफी स्पष्ट है. अगर कोई व्यक्ति किसी सरकारी कर्मचारी या फिर लोक सेवक को उसके आधिकारिक कर्तव्यों का पालन करने से रोकने या किसी खास फैसले के लिए दबाव बनाने की नीयत से भूख हड़ताल करता है तो उस पर बीएनएस की धारा 226 के तहत मामला दर्ज कराया जा सकता है. यह धारा मुख्य रूप से सरकारी काम में बाधा डालने के इरादे से किए गए कामों को नियंत्रित करने के उद्देश्य के लागू की जाती है, ताकि प्रशासनिक व्यवस्था बाधित न हो.
कब दर्ज होता है आत्महत्या की कोशिश का केस?
अक्सर अनशन के मामलों को आत्महत्या के उकसावे से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन बीएनएस की धारा 108 इस स्थिति में लागू नहीं होती है. धारा 108 तब प्रभावी होती है जब कोई व्यक्ति किसी अन्य नागरिक को खुदखुशी के लिए भड़काता या उकसाता है, जिसकी सजा 10 साल तक की कैद है. चूंकि अनशनकारी खुद अपनी इच्छा से भूखा रहता है और किसी व्यक्ति को ऐसा करने के लिए प्रेरित नहीं करता है, इसलिए सामान्य भूख हड़ताल के दौरान प्रदर्शनकारी का धारा 108 का केस दर्ज करना पूरी तरह से अनुचित और कानून के खिलाफ माना जाता है.
मद्रास हाईकोर्ट ने भूख हड़ताल को लेकर क्या कहा था?
अदालतों ने भी समय-समय पर भूख हड़ताल को लेकर स्थिति स्पष्ट की है. साल 2021 में मद्रास हाईकोर्ट ने अपने एतिहासिक फैसले में स्पष्ट रूप से यह कहा था कि केवल अनशन पर बैठने मात्र को आईपीसी की धारा 309 के तहत आत्महत्या का प्रयास नहीं माना जा सकता है. हालांकि अतीत में मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला के लंबे अनशन के दौरान उन पर धारा 309 के तहत कार्रवाई हुई थी. नए कानूनी बदलावों और न्यायिक व्याख्याओं के बाद अब महज अहिंसक तरीके से विरोध दर्ज कराने और खाना त्याग देने को सीधे तौर पर अपराध नहीं माना जाता है.
अनशन के दौरान कब दर्ज होता है केस?
कुछ खास परिस्थितियों में पुलिस और प्रशासन अनशनकारी पर कानूनी कार्रवाई कर सकता है. अगर लंबे अनशन के कारण व्यक्ति की शारीरिक हालत बहुत बिगड़ने लगे और उसकी जान को सच में खतरा पैदा हो जाए, तो प्रशासन हस्तक्षेप करता है. इसके अलावा जब डॉक्टर मेडिकल बुलेटिन में यह पुष्टि कर दें कि तत्काल चिकित्सीय मदद न मिलने पर जान जा सकती है, या अनशन स्थल के कारण इलाके में कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति बन जाए, तब सुरक्षा बल अनिवार्य रूप से केस दर्ज कर मेडिकल कस्टडी में ले सकते हैं.
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