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West Bengal Election Result 2026: किसके पास होती है स्ट्रॉग रूम की चाबी, बंगाल चुनाव खत्म होने के बाद जहां रखी गई थीं ईवीएम?

West Bengal Election Result 2026: बंगाल चुनाव 2026 में वोटिंग के बाद ईवीएम को त्रिस्तरीय सुरक्षा वाले स्ट्रांग रूम में रखा गया. केंद्रीय बलों की निगरानी और सीसीटीवी के बीच मशीनों को सील किया जाता है.

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  • मतदान के बाद ईवीएम सील कर स्ट्रांग रूम में रखी जाती हैं.
  • स्ट्रांग रूम की डबल लॉक चाबी जिला निर्वाचन अधिकारी के पास.
  • केंद्रीय बल, राज्य पुलिस से तीन स्तरीय सुरक्षा घेरा.
  • सीसीटीवी निगरानी और उम्मीदवारों की सील से पारदर्शिता सुनिश्चित.

West Bengal Election 2026: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजे आज घोषित होंगे. यहां 293 विधानसभा सीटों पर बंगाल की जनता तय कर चुकी है कि इस बार सत्ता की चाबी किसे सौंपनी है. हालांकि, असली सवाल मतदान के बाद का है. जब 41,001 मतदान केंद्रों से वोटिंग मशीनें निकलती हैं, तो उन्हें स्ट्रांग रूम के सुरक्षित घेरे में कैद कर दिया जाता है. आखिर इस लोहे के दरवाजे की चाबी किसके पास होती है और कैसे 2,321 केंद्रीय सुरक्षा बलों की कंपनियां इन मशीनों की पहरेदारी करती हैं, यह जानना हर नागरिक के लिए बेहद दिलचस्प है?

मतदान के तुरंत बाद की सख्त प्रक्रिया

जैसे ही मतदान का समय समाप्त होता है, पोलिंग बूथ पर गहमागहमी बढ़ जाती है. वहां तैनात प्रीसाइडिंग ऑफिसर सबसे पहले ईवीएम में दर्ज कुल वोटों के रिकॉर्ड का बारीकी से परीक्षण करता है. यह प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाती है, ताकि किसी भी धांधली की गुंजाइश न रहे. वहां मौजूद सभी राजनीतिक दलों के पोलिंग एजेंटों को एक सत्यापित कॉपी सौंपी जाती है. इसके बाद ईवीएम को पूरी सावधानी के साथ सील किया जाता है. यहां से मशीनों का सफर स्ट्रांग रूम की ओर शुरू होता है, जहां लोकतंत्र की किस्मत को अगले कई दिनों के लिए सुरक्षित रख दिया जाता है.

कौन रखता है स्ट्रांग रूम की चाबी?

स्ट्रांग रूम की चाबी किसी एक व्यक्ति की सनक या मर्जी पर नहीं होती है. सुरक्षा मानकों के अनुसार, एक जिले की सभी ईवीएम मशीनों की कमान डिस्ट्रिक्ट इलेक्टोरल ऑफिसर (DEO) के हाथों में होती है. स्ट्रांग रूम में डबल लॉक सिस्टम यानी दोहरा ताला लगाया जाता है. इसकी चाबी जिला निर्वाचन अधिकारी और संबंधित रिटर्निंग ऑफिसर की निगरानी में सुरक्षित रखी जाती है. नियम यह भी है कि जब तक मतगणना का दिन नहीं आता, इस ताले को बिना चुनाव आयोग की अनुमति और उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बिना नहीं खोला जा सकता है.

यह भी पढ़ें: Kolkata Police Uniform: कोलकाता पुलिस की वर्दी सफेद क्यों है, बाकी सब राज्यों में खाकी क्यों?

सुरक्षा का त्रिस्तरीय अभेद्य चक्रव्यूह

स्ट्रांग रूम की सुरक्षा किसी किले से कम नहीं होती है. इसे तीन अलग-अलग सुरक्षा घेरों में बांटा जाता है. पहले और सबसे अंदरूनी घेरे की जिम्मेदारी केंद्रीय अर्धसैनिक बलों (CAPF) के पास होती है, जो दरवाजे के ठीक बाहर 24 घंटे तैनात रहते हैं. दूसरे घेरे में भी केंद्रीय बल ही पहरा देते हैं, जो आसपास की गतिविधियों पर नजर रखते हैं. सबसे बाहरी सुरक्षा चक्र की जिम्मेदारी राज्य पुलिस बल की होती है, जो बाहरी भीड़ या किसी भी अनधिकृत प्रवेश को रोकने का काम करती है.

उम्मीदवारों की सील और सीसीटीवी का पहरा

निर्वाचन आयोग पारदर्शिता बनाए रखने के लिए उम्मीदवारों को यह अधिकार देता है कि वे भी स्ट्रांग रूम पर अपनी सील लगा सकें. जब सभी ईवीएम मशीनों को अंदर रख दिया जाता है, तो दरवाजे को आधिकारिक रूप से सील किया जाता है और उसके ऊपर राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि अपने दस्तखत और अपनी सील लगा सकते हैं. इसके अलावा, पूरे परिसर की सीसीटीवी सर्विलांस के जरिए लाइव मॉनिटरिंग की जाती है. कई बार उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों को एक स्क्रीन दी जाती है, जहां से वे बाहर बैठकर स्ट्रांग रूम के दरवाजे को लाइव देख सकते हैं.

बंगाल चुनाव में सुरक्षा के कड़े इंतजाम

2026 के इस चुनाव में हिंसा की आशंकाओं को देखते हुए कोलकाता समेत पूरे बंगाल में रिकॉर्ड सुरक्षा बल तैनात हैं. अकेले कोलकाता में 273 कंपनियां लगाई गई हैं, ताकि ईवीएम के परिवहन और उनकी सुरक्षा में कोई चूक न हो. हर बूथ की वेबकास्टिंग की व्यवस्था की गई है, ताकि मतदान से लेकर मशीनों के स्ट्रांग रूम तक पहुंचने की हर हरकत रिकॉर्ड हो सके. जिला निर्वाचन अधिकारी की यह व्यक्तिगत जिम्मेदारी होती है कि वह हर दिन स्ट्रांग रूम के रजिस्टर की जांच करे और सुरक्षा बलों के लॉग बुक का मिलान करे.

क्यों अहम है डबल लॉक सिस्टम की तकनीक?

डबल लॉक सिस्टम का सीधा मतलब यह है कि किसी एक अधिकारी के पास पूरी ताकत नहीं होती है. यह सुनिश्चित करता है कि स्ट्रांग रूम के साथ कोई छेड़छाड़ न कर सके. मशीनों को जिस जगह रखा जाता है, वहां बिजली के तार तक काट दिए जाते हैं ताकि शॉर्ट सर्किट या किसी तकनीकी हेरफेर का डर न रहे. मतदान के बाद से लेकर मतगणना की सुबह तक, यह स्ट्रांग रूम एक ऐसा सुरक्षित टापू बन जाता है जहां परिंदा भी पर नहीं मार सकता और चाबियों की सुरक्षा के लिए बकायदा प्रोटोकॉल का पालन होता है.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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