BJP-TMC छोड़ दो तो सिर्फ मुस्लिमों का दबदबा, बंगाल का यह समीकरण उलझा देगा दिमाग
बंगाल चुनाव 2026 में बीजेपी ने जीतकर ममता बनर्जी को सत्ता से बाहर कर दिया है. जहां बीजेपी की जीत हिंदू वोटों के 64% ध्रुवीकरण पर टिकी है. आइए जानें कि इन दोनों को हटाकर किन मुस्लिमों ने बंगाल जीता.

- भाजपा ने 207 सीटों के साथ पश्चिम बंगाल में प्रचंड बहुमत हासिल किया.
- भाजपा को हिंदू मतदाताओं का रिकॉर्ड तोड़ समर्थन मिला, वोट प्रतिशत बढ़ा.
- टीएमसी 80 सीटों पर सिमट गई, मुस्लिम वोटों में बिखराव दिखा.
- छोटे दलों और निर्दलीय प्रत्याशियों ने मुस्लिम वोटों को बांटा, भाजपा को लाभ.
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव 2026 के नतीजों ने भारतीय राजनीति के सबसे पुराने और मजबूत समीकरणों में से एक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया है. 15 सालों से सत्ता के सिंहासन पर काबिज ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) को सत्ता से बेदखल करते हुए भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 207 सीटों के साथ प्रचंड बहुमत हासिल किया है. इस चुनाव ने न केवल सत्ता का हस्तांतरण किया, बल्कि बंगाल के सामाजिक और धार्मिक वोटिंग पैटर्न को भी एक नई दिशा दी है. जहां एक तरफ भाजपा ने हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पैठ को रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचाया, वहीं दूसरी तरफ टीएमसी और भाजपा के द्वंद्व के बीच मुस्लिम मतदाताओं के बिखराव ने एक ऐसी तस्वीर पेश की है, जो आने वाले समय में बंगाल की राजनीति को और अधिक जटिल बना देगी.
बीजेपी की जीत और हिंदू वोटों का जबरदस्त ध्रुवीकरण
इस बार के चुनाव परिणामों ने साफ कर दिया है कि बंगाल में हिंदू मतदाताओं का झुकाव भाजपा की तरफ अभूतपूर्व तरीके से बढ़ा है. राज्य में करीब 71 प्रतिशत हिंदू आबादी है, जिसमें से लगभग 63-64 प्रतिशत ने भाजपा को अपनी पसंद बनाया. 2019 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 57 प्रतिशत हिंदू वोट मिले थे, यानी इस बार करीब 7 प्रतिशत का इजाफा हुआ है. इसी बढ़त ने भाजपा को 207 सीटों के जादुई आंकड़े तक पहुंचाया. पार्टी को राज्य में कुल 46 प्रतिशत वोट शेयर मिला, जो ममता बनर्जी की पार्टी के 41 प्रतिशत से 5 प्रतिशत अधिक है. हिंदू वोटों के इस एकमुश्त ध्रुवीकरण ने ममता बनर्जी के बंगाल की बेटी वाले कार्ड को बेअसर कर दिया.
टीएमसी का गिरता ग्राफ और मुस्लिम वोट बैंक का सच
ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस इस बार 100 का आंकड़ा भी पार नहीं कर पाई और महज 80 सीटों पर सिमट गई. टीएमसी ने इस चुनाव में 47 मुस्लिम उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था, जबकि भाजपा ने एक भी मुस्लिम प्रत्याशी को टिकट नहीं दिया था. आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि लगभग 71 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं ने ममता बनर्जी का साथ दिया. हालांकि, दिलचस्प तथ्य यह है कि करीब 8 प्रतिशत मुस्लिम वोटरों ने भाजपा को वोट दिया है, लेकिन अगर कुल मुस्लिम आबादी के अनुपात में देखें, तो यह महज 2 प्रतिशत के आसपास बैठता है. मुस्लिम वोट बैंक का बड़ा हिस्सा ममता के पास रहने के बावजूद, हिंदू वोटों के भारी नुकसान ने उन्हें सत्ता से दूर कर दिया.
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छोटे दलों की एंट्री और मुस्लिम वोटों में सेंधमारी
इस चुनाव में बीजेपी और टीएमसी के अलावा मुस्लिम बहुल इलाकों में छोटे दलों ने जबरदस्त प्रभाव डाला है. कांग्रेस ने सबसे अधिक 70 मुस्लिम प्रत्याशियों को उतारा था, और उसे जो दो सीटें मिलीं, वे दोनों ही मुस्लिम उम्मीदवारों ने जीती हैं. वाम मोर्चे ने 29 और मौलाना पीरजादा अब्बास सिद्दीकी के इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) ने 24 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था. सबसे अधिक चौंकाने वाला प्रदर्शन हुमायूं कबीर की आम जनता उन्नयन पार्टी (AJUP) का रहा, जिसने 90 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवार उतारे थे. इन छोटे दलों और निर्दलीयों की मौजूदगी ने मुस्लिम वोटों को कई जगहों पर बांट दिया, जिसका सीधा फायदा भाजपा को हुआ.
टीएमसी और बीजेपी को हटाकर बंगाल में मुस्लिमों का दबदबा
आम जनता उन्नयन पार्टी के नेता हुमायूं कबीर इस चुनाव में एक बड़े फैक्टर बनकर उभरे हैं. उन्होंने न केवल अपनी पार्टी के उम्मीदवारों को जिताया, बल्कि खुद दो अलग-अलग विधानसभा सीटों से जीत हासिल की. नोवदा सीट पर हुमायूं कबीर ने भाजपा के राणा मंडल को 27,943 वोटों के अंतर से हराया. वहीं, रेजिनगर सीट पर उन्होंने और भी बड़ी जीत दर्ज करते हुए भाजपा के बापन घोष को 58,876 वोटों से शिकस्त दी. हुमायूं कबीर की इस जीत ने साबित कर दिया कि मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जैसे जिलों में अब मतदाता टीएमसी के अलावा अन्य विकल्पों को भी गंभीरता से देख रहे हैं.
कांग्रेस की साख बचाने वाले दो मुस्लिम चेहरे
बंगाल की राजनीति में हाशिए पर जा चुकी कांग्रेस पार्टी को इस बार सिर्फ दो सीटों पर संतोष करना पड़ा है. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि ये दोनों ही सीटें मुस्लिम बहुल इलाकों से आई हैं और दोनों ही विजेता मुस्लिम उम्मीदवार हैं. रानीनगर सीट से कांग्रेस के जुल्फिकार अली ने टीएमसी के दिग्गज अब्दुल सौमिक को 2,701 वोटों के करीबी अंतर से हराया. वहीं, फरक्का सीट पर कांग्रेस के मोताब शेख ने भाजपा के सुनील चौधरी को 8,193 वोटों से मात देकर अपनी सीट बचाई. ये नतीजे बताते हैं कि मालदा और मुर्शिदाबाद के कुछ हिस्सों में कांग्रेस का वजूद अभी भी मुस्लिम पहचान से जुड़ा हुआ है.
लेफ्ट और आईएसएफ के मुस्लिम विधायकों की मौजूदगी
वामपंथ का कभी गढ़ रहा बंगाल अब सिमट चुका है, लेकिन इस बार के नतीजों में एक मुस्लिम चेहरा सीपीएम की लाज बचाने में कामयाब रहा. दोमकल विधानसभा सीट से सीपीएम के मोस्ताफिजुर रहमान ने टीएमसी के कद्दावर नेता हुमायूं कबीर को 16,296 वोटों के अंतर से हराकर जीत दर्ज की. दूसरी ओर, भांगड़ सीट पर इंडियन सेकुलर फ्रंट (ISF) के नौशाद सिद्दीकी ने अपनी ताकत दिखाई. उन्होंने टीएमसी के शौकत मोल्ला को 32,088 वोटों के भारी अंतर से पराजित किया. सीपीएम और आईएसएफ का यह एक-एक विधायक भी मुस्लिम समुदाय से ही आता है, जो यह दर्शाता है कि तीसरे मोर्चे का अस्तित्व अब मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों पर टिका है.
धार्मिक ध्रुवीकरण और सत्ता परिवर्तन का सार
अगर हम टीएमसी और बीजेपी को छोड़ दें, तो बंगाल के इस चुनावी दंगल में जो भी अन्य दल या चेहरे जीत कर आए हैं, उनमें मुस्लिमों का दबदबा साफ दिखाई देता है. बीजेपी की जीत का आधार पूरी तरह से हिंदू वोटों का एकीकरण रहा, जबकि टीएमसी के हारने की बड़ी वजह हिंदू वोटों का उससे छिटकना और मुस्लिम वोटों का कई छोटे दलों में बंट जाना रहा. पश्चिम बंगाल का यह नया समीकरण भविष्य की राजनीति के लिए बेहद उलझाने वाला है, क्योंकि यहां अब केवल दो विचारधाराओं की लड़ाई नहीं, बल्कि पहचान और समुदायों के बीच वोटों के बंटवारे का खेल शुरू हो चुका है.
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Source: IOCL


























