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जब डूब रहा था अमेरिका, तब दुनिया के सबसे ताकतवर बैंकर ने संभाली थी कमान; टाइटैनिक से भी है गहरा कनेक्शन

आज दुनिया के सबसे ताकतवर बैंकर के रूप में जाना जाने वाला शख्स का नाम अमेरिकी इतिहास के उन पन्नों में सुनहरे अक्षरों में दर्ज है, जो संकट के समय दुनिया के सबसे ताकतवर देश के मसीहा बने थे. चलिए जानें.

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  • जेपी मॉर्गन ने 1893 की मंदी में बचाया अमेरिका को.
  • 1895 में अमेरिकी सरकार को सोना देकर डॉलर बचाया.
  • 1907 के संकट में बैंकरों को एकजुट कर संभाला.
  • टाइटैनिक जहाज की निर्माता कंपनी जेपी मॉर्गन की थी.

अमेरिका को आज महाशक्ति कहा जाता है. 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका तेजी से अपनी औद्योगिक पहचान बना रहा था, लेकिन अंदरूनी तौर पर उसका बैंकिंग ढांचा बेहद नाजुक था. उस समय एक शख्स का नाम पूरी दुनिया में गूंज रहा था- जॉन पियरपॉन्ट मॉर्गन (J.P. Morgan). जेपी मॉर्गन केवल एक नाम नहीं, बल्कि उस दौर के अमेरिकी अर्थतंत्र की वह ढाल थे, जिसने देश को न केवल एक बार, बल्कि तीन बार आर्थिक पतन से बचाया था. आज का विशाल 'जेपी मॉर्गन' साम्राज्य उसी महान शख्सियत की दूरदर्शिता का परिणाम है. उनके जीवन की कहानियां केवल बैंकिंग तक सीमित नहीं हैं; उनका नाता उस समुद्री त्रासदी से भी है, जिसे आज पूरी दुनिया टाइटैनिक के नाम से जानती है.

1893 की मंदी जब रेलवे की बर्बादी ने हिलाया अमेरिका

'पैनिक ऑफ 1893' अमेरिका के इतिहास की सबसे भयावह आर्थिक मंदी मानी जाती है. इसका मुख्य कारण था रेलवे कंपनियों द्वारा किया गया बेतहाशा निवेश और अंधाधुंध कर्ज. जब मुनाफा उम्मीद से कम रहा, तो इन बड़ी कंपनियों ने दम तोड़ना शुरू कर दिया, जिससे पूरे बाजार में हड़कंप मच गया. स्थिति इतनी बदतर हो गई कि करीब 500 से ज्यादा बैंक ताले लगाने को मजबूर हुए और 15,000 से अधिक कंपनियां दिवालिया घोषित कर दी गईं. बेरोजगारी का स्तर 20 प्रतिशत तक पहुंच गया था. तब जेपी मॉर्गन ने पहली बार आगे आकर बिखरे हुए आर्थिक सिस्टम को संवारा और देश को रसातल में जाने से रोका.

सोने का वो भंडार, जिसने डॉलर को बचाया

1895 में एक बार फिर अमेरिका पर संकट के बादल मंडरा रहे थे. इस बार समस्या सरकारी खजाने से जुड़ी थी- देश का गोल्ड रिजर्व खाली हो रहा था और डॉलर की कीमत लगातार लुढ़क रही थी. अमेरिकी सरकार की साख दांव पर थी, क्योंकि उनके पास अपनी करेंसी को सहारा देने के लिए पर्याप्त सोना नहीं बचा था. ऐसे में जेपी मॉर्गन ने सरकार के साथ एक ऐतिहासिक और साहसिक डील की. उन्होंने अपने यूरोपीय भागीदारों के साथ मिलकर लगभग 65 मिलियन डॉलर मूल्य का सोना- जो कि करीब 30 टन से ज्यादा था- अमेरिकी सरकार को उपलब्ध कराया. यह कोई दान नहीं था, बल्कि एक मास्टर बिजनेस डील थी जिसके बदले सरकार ने बॉन्ड दिए. इस कदम ने डॉलर को डूबने से बचा लिया.

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1907 का महासंकट और मॉर्गन का मास्टरस्ट्रोक

1907 का वित्तीय संकट अमेरिका के लिए सबसे बड़ी चुनौती साबित हुआ. उस दौर में अमेरिका के पास आज के 'फेडरल रिजर्व' जैसा कोई केंद्रीय बैंक नहीं था जो सिस्टम को संभाल सके. जब कई बैंक और ट्रस्ट कंपनियां एक साथ धराशायी होने लगीं, तो आम जनता में अफरा-तफरी मच गई. तब जेपी मॉर्गन ने एक प्राइवेट बैंकर के तौर पर अपना प्रभाव दिखाया. उन्होंने न्यूयॉर्क के दिग्गज बैंकरों और उद्योगपतियों को अपने घर बुलाया और एक कड़ा संदेश दिया. किंवदंतियों के अनुसार, उन्होंने उन सभी को तब तक उस कमरे से बाहर नहीं निकलने दिया, जब तक वे संकट से निपटने के लिए फंड देने पर राजी नहीं हो गए. उनकी इस दबंग रणनीति ने बैंकिंग प्रणाली को टूटने से बचा लिया.

टाइटैनिक से कनेक्शन

जेपी मॉर्गन के जीवन का टाइटैनिक से नाता बेहद गहरा और चौंकाने वाला है. 'व्हाइट स्टार लाइन' नामक कंपनी, जिसने टाइटैनिक जहाज का निर्माण किया था, उस पर मॉर्गन की कंपनी 'इंटरनेशनल मर्केंटाइल मरीन' का ही नियंत्रण था. यानी तकनीकी रूप से टाइटैनिक जेपी मॉर्गन के विशाल साम्राज्य का एक हिस्सा था. सबसे दिलचस्प बात यह है कि जेपी मॉर्गन को उस जहाज की पहली यात्रा पर जाना था, और उनके लिए एक आलीशान सुइट भी बुक था. लेकिन, फ्रांस में स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उन्होंने अंतिम समय में अपनी यात्रा रद्द कर दी. उनकी किस्मत देखिए कि 15 अप्रैल 1912 को जब टाइटैनिक डूबा, तो वे उस जहाज पर नहीं थे.

इतिहास में दर्ज जेपी मॉर्गन का कद

जेपी मॉर्गन का नाम अमेरिकी वित्तीय इतिहास में एक ऐसे स्तंभ के रूप में दर्ज है, जिसने सरकार से भी बड़ी भूमिका निभाई. जिस देश में केंद्रीय बैंक नहीं था, वहां मॉर्गन का एक फैसला पूरे देश की अर्थव्यवस्था को हिला सकता था या बचा सकता था. उनका प्रभाव इतना था कि उन्होंने खुद को 'राष्ट्र का रक्षक' साबित किया. चाहे वह 30 टन सोने की डील हो या फिर बैंकरों को कमरे में बंद कर फंड जुटाने का दबाव, जेपी मॉर्गन की रणनीति ने आज के बैंकिंग सिस्टम की नींव रखी. वे एक ऐसे शख्स थे जिनके लिए व्यापार और देश की सुरक्षा एक ही सिक्के के दो पहलू थे.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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