US Midterm Elections:भारतीय मूल के अमेरिकी नेताओं को क्यों कहते हैं समोसा कॉकस? जानें वजह
US Midterm Elections: अमेरिकी संसद में भारतीय मूल के सांसदों की बढ़ती ताकत की क्या है इनसाइड स्टोरी, जानिए क्यों इस खास गुट को मिला समोसा कॉकस का दिलचस्प नाम और राजनीति में इसका क्या है प्रभाव

US Midterm Elections: अमेरिका में मिडटर्म चुनावों को लेकर राजनीतिक सरगर्मियां चरम पर हैं. इस बार के चुनाव तय करेंगे कि अमेरिकी संसद के निचले सदन हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स और सीनेट में किसका दबदबा होगा. लेकिन इन सबके बीच वैश्विक मीडिया और अमेरिकी सियासत में एक शब्द की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है, जिसे समोसा कॉकस कहा जाता है. मिडटर्म चुनाव के इस माहौल में भारतीय-अमेरिकी वोटर्स और नेताओं की भूमिका बेहद निर्णायक हो गई है. ऐसे में यह जानना बेहद दिलचस्प है कि आखिर वाशिंगटन की राजनीति में भारतीय मूल के नेताओं के इस समूह को समोसा कॉकस क्यों कहा जाता है.
क्या होता है कॉकस और कैसे पड़ा यह नाम?
अमेरिकी राजनीतिक व्यवस्था में कॉकस शब्द का इस्तेमाल सांसदों या नेताओं के एक ऐसे अनौपचारिक समूह के लिए किया जाता है, जिनकी पृष्ठभूमि, विचारधारा या हित समान होते हैं. अमेरिकी संसद में अश्वेत सांसदों के गुट को ब्लैक कॉकस और लातीनी नेताओं के गुट को हिस्पैनिक कॉकस कहा जाता है.
ठीक इसी तर्ज पर, अमेरिकी संसद में पहुंचे भारतीय मूल के सांसदों के समूह को समोसा कॉकस का अनोखा नाम दिया गया है. समोसा भारत का सबसे लोकप्रिय और दुनिया भर में पहचाने जाने वाला स्नैक है. इसी वजह से भारतीय संस्कृति, विरासत और साझा पहचान को दर्शाने के लिए इस समूह का नाम समोसे से जोड़ दिया गया.
कहां से आया है यह शब्द और क्या है इतिहास?
इस मजेदार और चर्चित शब्द की शुरुआत साल 2017 के आसपास हुई थी. अमेरिकी संसद में इलिनोइस का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय मूल के डेमोक्रेटिक नेता राजा कृष्णमूर्ति को इस शब्द का जनक माना जाता है. उन्होंने अमेरिकी राजनीति में भारतीय प्रवासियों के बढ़ते प्रभाव और उनकी सांस्कृतिक जड़ों को एक अनूठी पहचान देने के लिए मजाकिया लहजे में समोसा कॉकस शब्द का इस्तेमाल किया था. समय के साथ यह नाम इतना लोकप्रिय हो गया कि खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अमेरिकी कांग्रेस के अपने संबोधन में इस शब्द का जिक्र किया था.
अमेरिकी राजनीति में क्यों बढ़ रही है इसकी धमक?
समोसा कॉकस सिर्फ एक मजेदार नाम नहीं है, बल्कि वाशिंगटन में नीति निर्माण को प्रभावित करने वाला एक बेहद मजबूत ग्रुप बन चुका है. इस कॉकस के सदस्य आज अमेरिकी संसद की बेहद महत्वपूर्ण समितियों में शामिल हैं.
उदाहरण के लिए, एमी बेरा हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी में हैं, प्रमिला जयपाल प्रोग्रेसिव कॉकस की कमान संभालती हैं और रो खन्ना इंडिया कॉकस के सह-अध्यक्ष हैं, जो भारत और अमेरिका के बीच रणनीतिक और व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की नीतियां तय करता है. अमेरिका में रह रहे करीब 45 लाख भारतीय-अमेरिकी नागरिकों के मुद्दों, जैसे कि ग्रीन कार्ड का बैकलॉग और वीजा नियमों में सुधार, को लेकर यह समूह हमेशा अमेरिकी सरकार पर दबाव बनाने में कामयाब रहता है.
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2026 के मिडटर्म चुनाव में समोसा कॉकस की स्थिति
मौजूदा अमेरिकी संसद में समोसा कॉकस के सदस्यों की संख्या रिकॉर्ड छह तक पहुंच गई थी, जो सभी डेमोक्रेटिक पार्टी से हैं. इस शक्तिशाली गुट में राजा कृष्णमूर्ति, प्रमिला जयपाल (संसद में चुनी गईं पहली भारतीय-अमेरिकी महिला), डॉ. एमी बेरा, रो खन्ना, श्री थानेदार और सुहास सुब्रमण्यम शामिल हैं. हालांकि, इस बार के मिडटर्म चुनाव में इस समूह की ताकत में थोड़े बदलाव की उम्मीद है.
इस साल हुए प्राइमरी चुनावों में राजा कृष्णमूर्ति ने हाउस के बजाय सीनेट के लिए दांव आजमाया था लेकिन वह पार्टी की आंतरिक रेस हार गए, जबकि श्री थानेदार भी अपनी प्राइमरी रेस में पीछे रह गए. ऐसे में इस चुनाव के बाद समूह की संख्या छह से घटकर चार होने का जोखिम है. हालांकि, एरिजोना से अमिश शाह और फ्लोरिडा से पिया डांडिया जैसे नए भारतीय-अमेरिकी डेमोक्रेटिक चेहरे मैदान में हैं, जिनकी जीत पर यह निर्भर करेगा कि समोसा कॉकस अपनी पुरानी ताकत बरकरार रख पाता है या नहीं.
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