दुनिया में सबसे ज्यादा कागज कहां बनता है, भारत इस लिस्ट में कितने नंबर पर?
विश्व के कुल 33 प्रतिशत उत्पादन के साथ चीन दुनिया का सबसे बड़ा कागज निर्माता देश है, जबकि अमेरिका दूसरे और 5 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ भारत तीसरे स्थान पर बना हुआ है.

- चीन कई देशों को कागज उत्पाद निर्यात करता है।
स्मार्टफोन और कंप्यूटर के इस डिजिटल युग में भी कागज और उससे जुड़े पैकेजिंग उत्पादों की अहमियत जरा भी कम नहीं हुई है. दैनिक पठन-पाठन से लेकर वैश्विक व्यापार के सामान को पैक करने तक, हर जगह कागजी उत्पादों का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर हो रहा है. ऐसे में यह जानना बेहद दिलचस्प है कि पूरी दुनिया को कागज की सप्लाई करने वाले मुख्य देश कौन से हैं. वैश्विक आंकड़ों के अनुसार, कागज के कुल निर्माण में चीन, अमेरिका, भारत, जापान और जर्मनी शीर्ष पांच स्थानों पर काबिज हैं. लेकिन जब बात आती है सबसे बड़े मैन्युफैक्चरर की, तो चीन दुनिया भर के देशों को पछाड़ते हुए इस उद्योग के सबसे शीर्ष शिखर पर बैठा है.
चीन, अमेरिका और भारत किसकी वैश्विक हिस्सेदारी ज्यादा?
कागज और पेपरबोर्ड निर्माण के अंतरराष्ट्रीय आंकड़ों पर नजर डालें तो चीन दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक देश बना हुआ है. वर्ष 2024 में वैश्विक स्तर पर तैयार किए गए कुल कागज और पेपरबोर्ड का लगभग 33 प्रतिशत (यानी एक तिहाई) उत्पादन अकेले चीन की पेपर मिलों में हुआ है. इस सूची में 15 प्रतिशत की हिस्सेदारी के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) दूसरे पायदान पर स्थिर है. वहीं, भारत ने वैश्विक उत्पादन में 5 प्रतिशत की मजबूत हिस्सेदारी दर्ज कराते हुए दुनिया में तीसरा स्थान हासिल किया है, जबकि जापान चौथे नंबर पर आता है. भारत का यह प्रदर्शन उसके उभरते औद्योगिक क्षमता को दर्शाता है.
ई-कॉमर्स क्रांति और पैकेजिंग मटेरियल की अचानक बढ़ी मांग
सवाल यह उठता है कि आखिर चीन कागज उद्योग का इतना बड़ा हब कैसे बन गया? दरअसल, पिछले कुछ वर्षों में इंटरनेट क्रांति के चलते पूरी दुनिया में ई-कॉमर्स और ऑनलाइन शॉपिंग का चलन तेजी से बढ़ा है. अमेजन और अलीबाबा जैसी कंपनियों के विस्तार से सामान की पैकेजिंग के लिए गत्ते (कार्डबोर्ड) और मजबूत पेपर बैग्स की मांग में भारी उछाल आया. इसके अलावा, फूड डिलीवरी ऐप्स के आने से प्लास्टिक के विकल्प के रूप में कागज के बने थैलों और बॉक्स का इस्तेमाल अनिवार्य हो गया. चीन ने बाजार के इस बदलाव को समय रहते पहचाना और बड़े पैमाने पर इनका निर्माण शुरू कर दिया.
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तेजी से होता औद्योगीकरण और भारी खपत
चीन की आर्थिक नीतियों ने देश के भीतर औद्योगीकरण, शहरीकरण और आम लोगों के जीवन स्तर को ऊंचा उठाने पर ध्यान केंद्रित किया. पिछले तीन दशकों में चीनी शहरों में हाइजीन प्रोडक्ट्स जैसे टिश्यू पेपर, प्रिंटिंग पेपर और पैकेजिंग की खपत में रिकॉर्ड वृद्धि दर्ज की गई. चीन न केवल सबसे बड़ा उत्पादक है बल्कि सबसे बड़ा उपभोक्ता भी है. वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, चीन ने 280 मिलियन टन से अधिक पल्प और पेपर उत्पादों का निर्माण किया, जिसमें से 230 मिलियन टन की खपत उसने खुद अपने देश के भीतर कर ली. सस्ता लेबर और विशाल आबादी इस विशाल आपूर्ति श्रृंखला को मजबूती देते हैं.
सिंगल यूज प्लास्टिक पर सख्त बैन और सरकारी मदद
चीन के कागज पैकेजिंग उद्योग में 2022 के दौरान लगभग 12 प्रतिशत की सालाना दर से बढ़ोतरी देखी गई. इस सफलता का बड़ा श्रेय वहां की सरकार की नीतियों को जाता है. चीनी सरकार ने 'ग्रीन पैकेजिंग' को बढ़ावा देने के लिए शहरों में सिंगल यूज प्लास्टिक पर कड़े प्रतिबंध लगा दिए. प्लास्टिक पर रोक लगते ही पैकेजिंग और शॉपिंग के लिए कागजी थैलों की मांग घरेलू बाजार में कई गुना बढ़ गई. सरकार की इस नीतिगत प्रोत्साहन ने स्थानीय पेपर मिलों को उत्पादन क्षमता बढ़ाने और आधुनिक तकनीक में निवेश करने का सीधा मौका दिया.
किन-किन देशों तक फैली है चीन के कागज की सप्लाई?
चीन में तैयार होने वाले कागज और इससे बने पैकेजिंग सामान की मांग केवल उसके अपने देश तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया के दर्जनों बड़े और छोटे देश इस पर निर्भर हैं. चीन से बड़े पैमाने पर कागज का आयात करने वाले देशों में अमेरिका, वियतनाम, जापान, दक्षिण कोरिया, मेक्सिको, मलेशिया, जर्मनी, नीदरलैंड और पोलैंड जैसे विकसित और विकासशील राष्ट्र शामिल हैं. इसके अलावा, मिडिल ईस्ट और अफ्रीकी महाद्वीप के कई देश भी अपनी कागजी जरूरतों और पैकेजिंग गत्तों के लिए मुख्य रूप से चीन से आयात होने वाले माल पर ही निर्भर रहते हैं.

कैसे बनता है लकड़ी से कागज?
कागज बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह वैज्ञानिक और ऑटोमैटिक होती है. इसे बनाने के लिए मुख्य रूप से लकड़ी के टुकड़ों या रीसायकल किए गए पुराने कागज का इस्तेमाल किया जाता है.
पल्पिंग और ब्लीचिंग- सबसे पहले लकड़ी के छिलकों को हटाकर उन्हें रासायनिक घोल में उबाला जाता है, जिससे लकड़ी को आपस में जोड़ने वाला प्राकृतिक गोंद पिघल जाता है और फाइबर अलग हो जाते हैं. इसे पल्पिंग कहते हैं. इसके बाद क्लोरीन या अन्य रसायनों से इस लुगदी को ब्लीच किया जाता है ताकि यह पूरी तरह सफेद हो जाए.
जाली पर फैलाना और दबाना- 99 फीसदी पानी से भरपूर इस पतली लुगदी को तेजी से घूमती हुई महीन जालीदार बेल्ट पर डाला जाता है. जाली से पानी नीचे गिर जाता है और रेशे आपस में चिपक जाते हैं. इसके बाद भारी और विशाल रोलर्स के बीच से गुजारकर इस नम परत को दबाया जाता है, जिससे बचा हुआ अधिकांश पानी निचोड़ जाता है.
सुखाना और कैलेंडरिंग: अगली प्रक्रिया में इस गीले कागज को 100 से 200 डिग्री सेल्सियस तक गर्म रोलर्स के ऊपर से गुजारा जाता है, जिससे नमी भाप बनकर उड़ जाती है. सबसे अंत में कैलेंडरिंग प्रक्रिया के तहत इसे अत्यधिक दबाव वाले चिकने रोलर्स से निकालकर समतल और चमकदार बनाया जाता है, और फिर मशीनों द्वारा इसे बड़े-बड़े रोल्स या शीट्स में काट लिया जाता है.
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