Can India Help PoK Protest: क्या भारत से मदद मांग सकते हैं POK के प्रदर्शनकारी, क्या हैं इसके नियम?
Can India Help PoK Protest: POK में बगावत के बीच क्या प्रदर्शनकारियों को मानवीय मदद भेज सकता है भारत और क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय सीमा के नियम, जानिए इस बेहद संवेदनशील मुद्दे का पूरा कानूनी सच

Can India Help PoK Protest: पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले कश्मीर POK में पिछले काफी समय से बुनियादी सुविधाओं की कमी, महंगाई और मानवाधिकारों के हनन को लेकर बड़े पैमाने पर जन-आंदोलन चल रहे हैं. जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी के नेतृत्व में हो रहे इन प्रदर्शनों के बीच कई बार स्थानीय प्रदर्शनकारियों और एक्टिविस्ट्स ने वीडियो जारी कर भारत सरकार से सीधे मानवीय सहायता की गुहार लगाई है.
प्रदर्शनकारियों की ओर से राशन, दवाइयां उपलब्ध कराने और दोनों तरफ के कश्मीर को जोड़ने वाली लाइन ऑफ कंट्रोल LoC को खोलने की मांग भी की गई है. इस स्थिति के बीच राजनीतिक और कानूनी गलियारों में यह बड़ी बहस छिड़ गई है कि क्या POK के नागरिक भारत से कानूनी तौर पर मदद मांग सकते हैं और इस पर भारत के नियम व संवैधानिक स्थिति क्या कहती है.
भारतीय संविधान के तहत POK के नागरिकों का दर्जा
भारतीय संविधान के अनुसार, पाकिस्तान के कब्जे वाला कश्मीर POK किसी अन्य देश का हिस्सा नहीं है, बल्कि वह पूरी तरह से भारत का अभिन्न अंग है. साल 1947 में महाराजा हरिसिंह द्वारा हस्ताक्षरित इंस्टूमेंट ऑफ एक्सेसियन के बाद से ही पूरा जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा बन गया था. इसके बाद 1994 में भारतीय संसद ने सर्वसम्मति से एक ऐतिहासिक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें स्पष्ट कहा गया था कि POK भारत का अटूट हिस्सा है और पाकिस्तान को इस अवैध कब्जे को खाली करना होगा.
घरेलू नियमों की बात करें तो जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019 के तहत भी POK के क्षेत्रों को भारतीय केंद्र शासित प्रदेश का हिस्सा माना जाता है और वहां की विधानसभा में 24 सीटें आज भी खाली रखी जाती हैं. तकनीकी और कानूनी रूप से POK में रहने वाले लोग भारत के ही नागरिक हैं, इसलिए अपनी ही सरकार से मानवीय आधार पर मदद की गुहार लगाना उनके अधिकार क्षेत्र में आता है.
अंतरराष्ट्रीय नियम और संप्रभुता की व्यावहारिक चुनौतियां
संवैधानिक रूप से POK का अपना हिस्सा मानने के बावजूद व्यावहारिक तौर पर भारत के लिए वहां सीधे मदद पहुंचाना अंतरराष्ट्रीय नियमों के कारण बेहद जटिल है. अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, भले ही पाकिस्तान का वहां अवैध कब्जा हो, लेकिन वर्तमान में उस क्षेत्र का प्रशासनिक और भौतिक नियंत्रण इस्लामाबाद के पास है.
अंतरराष्ट्रीय संप्रभुता के नियमों के तहत, भारत सरकार पाकिस्तान की अनुमति या किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते के बिना अपनी सीमाओं को पार करके वहीं सीधे राशन या दवाइयों की खेप नहीं भेज सकती. अगर भारत बिना किसी आधिकारिक तालमेल के LoC पार कर मदद भेजता है, तो इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीमा का उल्लघंन और दूसरे क्षेत्र के प्रशासनिक मामलों में हस्तक्षेप माना जा सकता है, जिससे सैन्य तनाव बढ़ने का खतरा रहता है.
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वैश्विक मंचों पर भारत का रुख
प्रदर्शनकारियों की सीधी मदद करने के बजाय भारत सरकार कूटनीतिक और अंतरराष्ट्रीय नियमों के तहत इस मुद्दे को वैश्विक मंचों पर उठाती रही है. संयुक्त राष्ट्र महासभा और मानवाधिकार परिषद के मंचों पर भारत ने हाल ही में POK में हो रही हिंसा, इंटरनेट पाबंदियों और मानवाधिकारों के गंभीर उल्लघंन पर सख्त चिंता जताई है.
भारत सरकार का आधिकारिक नियम यह है कि वह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों और संयुक्त राष्ट्र से जवाबदेही तय करने की मांग करती है ताकि पाकिस्तान पर दबाव बनाया जा सके. भारत का स्पष्ट मानना है कि वहां के नागरिकों को बुनियादी अधिकार मिलने चाहिए, लेकिन भौतिक सहायता पहुंचाने के लिए LoC को खोलने या व्यापार शुरू करने का कोई भी फैसला तभी संभव है जब दोनों देशों के बीच कूटनीतिक वार्ता के जरिए इस पर कानूनी सहमति बने.
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