क्यों ज्यादातर याचिकाओं पर तुरंत सुनवाई नहीं करता SC, क्या है तारीख के नियम?
सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों के भारी बोझ और कागजी कमियों के कारण हर याचिका पर तुरंत सुनवाई नहीं हो पाती, केवल अति-आवश्यक व जमानत मामलों को प्राथमिकता मिलती है. आइए तारीख के नियम जानें.

देश की सबसे बड़ी अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में हर दिन सैकड़ों नई याचिकाएं दाखिल की जाती हैं, लेकिन उनमें से ज्यादातर मामलों पर तत्काल सुनवाई होना लगभग असंभव सा हो जाता है. अक्सर आम नागरिक और याचिकाकर्ता यह सवाल उठाते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय आखिर हर केस को प्राथमिकता के आधार पर तुरंत क्यों नहीं सुन पाता और कोर्ट में अगली तारीख मिलने या केस लिस्ट होने का पूरा कानूनी सिस्टम किस तरह काम करता है. आइए समझते हैं कि केस पेंडेंसी से लेकर तारीखों के निर्धारण से जुड़े सर्वोच्च अदालत के मुख्य कायदे-कानून और प्रशासनिक दिशा-निर्देश क्या हैं.
लंबित मामलों का भारी दबाव और मुकदमों का अंबार
सर्वोच्च न्यायालय में तात्कालिक सुनवाई न हो पाने के पीछे सबसे बड़ी और बुनियादी वजह पेंडिंग मुकदमों की वह भारी-भरकम संख्या है जो सालों से लगातार बढ़ती जा रही है. शीर्ष अदालत के डिजिटल और प्रशासनिक रिकॉर्ड बताते हैं कि कोर्ट के पास पहले से ही लाखों की तादाद में जटिल मुकदमे कतार में मौजूद हैं. ऐसी स्थिति में रोस्टर प्रबंधन के तहत रोजाना नए आने वाले आम मुकदमों को बिना किसी विशेष कारण के पुराने लिस्टेड मामलों से पहले जगह देना मुमकिन नहीं हो पाता है.
कागजी कमियां और याचिकाओं की तकनीकी खामियां
सुप्रीम कोर्ट में जब भी कोई याचिका दाखिल होती है, तो उसे सबसे पहले रजिस्ट्री विभाग की बारीक जांच प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है. प्रशासनिक आंकड़ों के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में आने वाली कुल याचिकाओं में से करीब 22 प्रतिशत मामले शुरुआती स्तर पर कागजी कमियों, गलत दस्तावेज लगाने या कानूनी औपचारिकताओं के पूरा न होने की वजह से सीधे सुनवाई योग्य नहीं पाए जाते. जब तक याचिकाकर्ता या उनके वकील इन त्रुटियों को दुरुस्त नहीं कर लेते, तब तक केस आगे नहीं बढ़ता.
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आपातकालीन मामलों और मौलिक अधिकारों को प्राथमिकता
देश की सबसे बड़ी अदालत हर याचिका को एक ही नजरिए से नहीं देख सकती, इसलिए यहां प्राथमिकताओं का एक स्पष्ट वर्गीकरण मौजूद है. कोर्ट सबसे पहले उन मामलों को प्राथमिकता देता है जिनका सीधा संबंध किसी व्यक्ति के जीने के अधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता या गंभीर आपातकालीन स्थितियों से होता है. उदाहरण के लिए, जमानत की अर्जियां या गैर-कानूनी हिरासत से जुड़ी बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) जैसी याचिकाओं को अति-महत्वपूर्ण मानकर तुरंत सुना जाता है, जबकि सामान्य दीवानी या व्यावसायिक याचिकाओं को नियमित प्रक्रिया के तहत समय दिया जाता है.
दूसरे पक्ष का जवाब और नोटिस जारी करने की समय-सीमा
न्याय का सार्वभौमिक नियम यह कहता है कि बिना दूसरे पक्ष को सुने कोई भी एकतरफा फैसला या आदेश नहीं दिया जा सकता है. जब भी सुप्रीम कोर्ट में कोई नई याचिका दर्ज होती है, तो पीठ अक्सर उस पर सीधी अंतिम सुनवाई शुरू करने के बजाय सामने वाले पक्ष, जैसे कि संबंधित सरकार, राज्य प्रशासन या जांच एजेंसियों को नोटिस जारी करती है. इस नोटिस का लिखित जवाब दाखिल करने के लिए विरोधी पक्ष को पर्याप्त कानूनी समय प्रदान किया जाता है, जिसके चलते अगली तारीख तय होना स्वाभाविक है.
जमानत याचिकाओं का ऑटोमैटिक सिस्टम
मामलों के जल्द निपटारे के लिए सुप्रीम कोर्ट ने अपने लिस्टिंग प्रबंधन में तकनीकी और नीतिगत सुधार लागू किए हैं. इन नई गाइडलाइंस के मुताबिक, जमानत या व्यक्तिगत आजादी से जुड़े केसों के लिए एक ऑटोमैटिक लिस्टिंग की व्यवस्था तैयार की गई है. इस नियम का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि जमानत से संबंधित मामलों को हर सप्ताह या कम से कम दो हफ्तों के भीतर स्वचालित कंप्यूटर प्रणाली के तहत पीठ के सामने सुनवाई के लिए जरूर सूचीबद्ध कर दिया जाए.
तारीख मांगने की प्रथा पर लगाम
सुप्रीम कोर्ट ने वकीलों द्वारा बिना किसी ठोस या अपरिहार्य कारण के सुनवाई को आगे टलवाने यानी एडजर्नमेंट मांगने की परंपरा पर काफी सख्ती दिखाई है. नए कड़े नियमों के मुताबिक, यदि किसी पक्ष का वकील सुनवाई स्थगित कराना चाहता है, तो उसे इसका बेहद ठोस कारण लिखित में देना होता है. इतना ही नहीं, सुनवाई की तय तारीख से ठीक एक दिन पहले सुबह 11 बजे तक इसकी औपचारिक सूचना दूसरे पक्ष के वकील को देना अनिवार्य कर दिया गया है.
समय प्रबंधन और वकीलों की बहस के लिए लिखित वादा
न्यायालय का कीमती समय बचाने के उद्देश्य से भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) द्वारा संचालित नई व्यवस्था के तहत बहस की समय-सीमा तय की जा रही है. इसके तहत किसी मामले की विस्तृत सुनवाई शुरू होने से पहले ही दोनों पक्षों के वकीलों को अपनी मौखिक दलीलें पूरी करने के लिए समय-सीमा का लिखित वचन देना होता है. इस अनुशासन से अदालत के समय का बराबर और सही बंटवारा हो पाता है, जिससे एक ही दिन में ज्यादा से ज्यादा मुकदमों पर सुनवाई संभव हो पाती है.
उच्च न्यायालयों के लिए फैसलों और सुनवाई की डेडलाइन
सर्वोच्च न्यायालय केवल अपने काम के तरीके में बदलाव नहीं कर रहा, बल्कि उसने देश के तमाम हाई कोर्ट्स के लिए भी सख्त समय-सीमा तय कर रखी है. सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के तहत सभी उच्च न्यायालयों को यह स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं कि किसी भी केस की सुनवाई पूरी होने के बाद सुरक्षित रखे गए फैसलों को हर हाल में 3 महीने के भीतर सुना दिया जाए. इसके साथ ही निचली और उच्च अदालतों में लंबित जमानत की अर्जियों को भी तय समय के भीतर बिना देरी निपटाने के आदेश दिए गए हैं.
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