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Space Effects On Brain: स्पेस में शरीर ही नहीं दिमाग पर भी पड़ता है असर, जानें क्या आता है बदलाव?

Space Effects On Brain: अंतरिक्ष में अंतरिक्ष यात्रियों में शारीरिक बदलाव ही नहीं बल्कि मानसिक रूप से भी बदलाव आता है. आइए जानते हैं क्या होते हैं यह बदलाव.

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  • अंतरिक्ष में दिमाग ऊपर खिसकता, तरल पदार्थ सिर में बढ़ता है।
  • माइक्रोग्रैविटी ग्रे मैटर बदलता, याददाश्त और निर्णय प्रभावित होते हैं।
  • अंतरिक्ष यात्री 'स्पेस फॉग' और संतुलन की समस्या झेलते हैं।

Space Effects On Brain: अंतरिक्ष की यात्रा में जीरो ग्रेविटी में तैरने से कहीं ज्यादा चुनौतियां होती हैं. इंसानी शरीर लाखों सालों में पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण के हिसाब से विकसित हुआ है और जब अंतरिक्ष यात्री अंतरिक्ष के माइक्रोग्रैविटी वाले माहौल में जाते हैं तो शरीर का हर अंग का सिस्टम उसके हिसाब से ढलने लगता है. वैज्ञानिकों का यह कहना है कि यह बदलाव सिर्फ मांसपेशी और हड्डियों तक ही सीमित नहीं है बल्कि इसका असर दिमाग पर भी पड़ता है.

दिमाग का जगह बदलना

अंतरिक्ष यात्रियों के ब्रेन स्कैन से हुई सबसे हैरान करने वाली खोज में से एक यह है कि माइक्रोग्रैविटी में दिमाग अपनी जगह बदल देता है. पृथ्वी के गुरुत्वाकर्षण खिंचाव के बिना दिमाग धीरे-धीरे खोपड़ी के अंदर ऊपर की तरफ खिसक जाता है और थोड़ा पीछे की तरफ झुक जाता है.

इसी के साथ सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड वह रक्षात्मक तरल पदार्थ जो दिमाग और रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ होता है समान रूप से फैलने के बजाय सिर की तरफ बढ़ने लगता है. इससे दिमाग के वेंट्रिकल्स फैल जाते हैं. वैज्ञानिक अभी भी इन संरचनात्मक बदलाव के लंबे समय तक रहने वाले प्रभावों को स्टडी कर रहे हैं. 

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याददाश्त और फैसले लेने की क्षमता पर असर 

अंतरिक्ष में लंबे समय तक रहने का संबंध दिमाग के ग्रे मैटर में होने वाले बदलावों से भी है. यह वह हिस्सा है जो याददाश्त, सीखने और जानकारी को प्रोसेस करने का काम करता है. रिसर्च से यह पता चलता है कि लंबे समय तक माइक्रोग्रैविटी में रहने से ग्रे मैटर का वॉल्यूम बदल सकता है. हालांकि अंतरिक्ष यात्रियों का पृथ्वी पर लौटने के बाद इनमें से कुछ बदलाव आंशिक रूप से ठीक भी हो जाते हैं. अंतरिक्ष यात्रियों को कुछ समय के लिए स्पेस फॉग भी महसूस हो सकता है. ऐसी स्थिति में ध्यान कम लगना, सोचने की रफ्तार धीमी होना, चिड़चिड़ापन और फैसला लेने की क्षमता में अस्थायी कमी शामिल हो सकती है. 

शरीर का संतुलन बनाने वाला सिस्टम 

कान के अंदरूनी हिस्से को यह तय करने में गुरुत्वाकर्षण एक बड़ी भूमिका निभाता है कि कौन सी दिशा ऊपर की तरफ है और कौन सी नीचे. अंतरिक्ष में वेस्टिबुलर सिस्टम को वैसे सिग्नल नहीं मिल पाते. यह सिस्टम शरीर का संतुलन बनाए रखने वाला सिस्टम है. यही वजह है कि कई अंतरिक्ष यात्रियों को स्पेस मोशन सिकनेस का अनुभव होता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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