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Artificial Life: अब लैब में बनेगी जिंदगी... क्या है वैज्ञानिकों का आर्टिफिशियल लाइफ मिशन, जानें इसका फायदा

Artificial Life: वैज्ञानिक अब आर्टिफिशियल जिंदगी बनाने में लगे हैं. आइए जानते हैं क्या है यह और क्या है इसके पीछे की वजह.

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  • वैज्ञानिक सिंथेटिक डीएनए से कृत्रिम जीवित कोशिकाएं बनाने में जुटे हैं।
  • हाल ही में, प्रोफेसर केट टीम ने 'स्पडसेल' सिंथेटिक सेल बनाई।
  • इसका उपयोग रीजेनरेटिव मेडिसिन, लक्षित दवा वितरण में होगा।

Artificial Life: दुनिया भर के वैज्ञानिक आधुनिक जीव विज्ञान के सबसे बड़े प्रोजेक्ट में से एक पर काम कर रहे हैं. यह प्रोजेक्ट है आर्टिफिशियल जिंदगी बनाना. पारंपरिक जेनेटिक इंजीनियरिंग के उलट इस रिसर्च का मकसद सिंथेटिक डीएनए का इस्तेमाल करके निर्जीव केमिकल घटकों से जीवित कोशिकाएं बनाना है. रिसर्चर्स का ऐसा कहना है कि यह उभरता हुआ क्षेत्र आने वाले दशकों में चिकित्सा, बायोटेक्नोलॉजी और पर्यावरण विज्ञान में क्रांति ला सकता है. 

प्रोटोटाइप सिंथेटिक सेल 

प्रोफेसर केट अडमाला की रिसर्च टीम की हालिया कामयाबी ने उम्मीद को फिर से जगा दिया है. उनकी टीम ने निर्जीव केमिकल्स को मिलाकर spudcell नाम की एक प्रोटोटाइप सिंथेटिक सेल बनाई है. हालांकि यह तकनीक अभी शुरुआती दौर में है लेकिन वैज्ञानिक इसे भविष्य के कामों के लिए प्रोग्राम करने योग्य जीवित सिस्टम डिजाइन करने की दिशा में एक बड़ा कदम मानते हैं.

आर्टिफिशियल लाइफ मिशन क्या है? 

आर्टिफिशियल लाइफ मिशन सिंथेटिक बायोलॉजी पर आधारित है. यह विज्ञान की एक ऐसी शाखा है जिसका मकसद सिर्फ मौजूदा जीवों में बदलाव करने के बजाय जैविक सिस्टम को डिजाइन करना और बनाना है.  स्पर्म और एग सेल्स के जरिए प्राकृतिक प्रजनन पर निर्भर रहने के बजाय रिसचर्स लैब की स्थिति में सावधानी से चुने गए केमिकल कंपाउंड और सिंथेटिक डीएनए को मिलाकर सेल जैसी संरचना बनाते हैं जो जिंदा जीवों से जुड़े कुछ काम कर सकती हैं.

सिंथेटिक सेल्स कैसे काम करती है?

वैज्ञानिक ऐसी कोशिका बनाने की कोशिश कर रहे हैं जो जरूरी जैविक गतिविधि कर सके. जैसे ऊर्जा का इस्तेमाल करना, अपने आसपास के माहौल के प्रति प्रतिक्रिया देना और कंट्रोल्ड स्थिति में प्रजनन करना. हालांकि यह सिंथेटिक सेल जटिल जीवित जीवों के बराबर नहीं है लेकिन रिसचर्स को ऐसी उम्मीद है कि आगे जाकर वे प्राकृतिक कोशिकाओं के कई बुनियादी कामों की नकल कर सकेंगी और साथ ही खास मकसद के लिए विशेष रूप से तैयार भी की जाएंगी.

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मेडिकल साइंस को बदलने की क्षमता 

आर्टिफिशियल लाइफ के सबसे बड़े इस्तेमाल में से एक है रीजेनरेटिव मेडिसिन. वैज्ञानिकों का ऐसा कहना है कि सिंथेटिक सेल्स एक दिन खराब हो चुके टिशु की मरम्मत करने या फिर लीवर, किडनी या दिल जैसे अंगों को बदलने के लिए नए अंग उगाने में मदद कर सकती हैं. अगर यह तकनीक सफल होती है तो इससे अंगदान पर निर्भरता कम हो सकती है. 

इसी के साथ शोधकर्ता इस बात की भी कल्पना कर रहे हैं कि वह दवाओं को सीधे रोग ग्रस्त टिशु तक पहुंचा सकें. कैंसर जैसी स्थिति में यह इंजीनियर कोशिकाएं स्वस्थ टिशु को कम से कम नुकसान पहुंचाते हुए दवाओं को खास तौर से ट्यूमर तक पहुंचा सकती है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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