हवाई जहाज या हेलिकॉप्टर... किसमें सफर ज्यादा खतरनाक, कौन जल्दी होता है क्रैश?
Helicopter VS Airplane Safety: झारखंड के रांची में एक एयर एंबुलेंस दुर्घटनाग्रस्त हो गया. इसके अलावा अंडमान इलाके में पवन हंस हेलीकॉप्टर में भी तकनीकी खराबी आ गई. आइए जानते हैं पूरी जानकारी.

Helicopter VS Airplane Safety: हाल ही में झारखंड के रांची में एक एयर एंबुलेंस की दुखद दुर्घटना हो गई. इस हादसे में सात पैसेंजर की मौत हो गई. इसी के साथ मंगलवार सुबह अंडमान और निकोबार द्वीप समूह में पवन हंस के हेलीकॉप्टर में तकनीकी खराबी आ गई थी. इसके बाद लोगों के बीच बड़ा सवाल खड़ा हो गया है कि आखिर हवाई जहाज से सफर करना ज्यादा सुरक्षित है या हेलीकॉप्टर से. दरअसल हवाई जहाज और हेलीकॉप्टर दोनों ही आंकड़ों के हिसाब से सड़क यात्रा से ज्यादा सुरक्षित है लेकिन एविएशन में जोखिम का लेवल काफी अलग होता है.
क्या कहते हैं आंकड़े?
अगर आंकड़ों की बात करें तो हेलीकॉप्टर का क्रैश रेट हवाई जहाज से ज्यादा होता है. आम सिविलियन विमान के लिए एक्सीडेंट रेट लगभग 7.28 प्रति 1 लाख उड़ान घंटे है. दूसरी ओर हेलीकॉप्टर प्रति 1 लाख उड़ान घंटे में लगभग 9.84 एक्सीडेंट होते हैं. यह लगभग 35% ज्यादा है. हालांकि एयर इंडिया और इंडिगो जैसी बड़ी कमर्शियल एयरलाइंस पूरी तरह से एक अलग सुरक्षा कैटेगरी में आती हैं. बड़े कमर्शियल एयरक्राफ्ट में मौत की दर हर 2.7 मिलियन फ्लाइट में सिर्फ एक है. तो आंकड़ों के हिसाब से अगर आप किसी बड़े कमर्शियल जेट में सवार हो रहे हैं तो आप सबसे सुरक्षित ट्रैवल माहौल में से एक में जा रहे हैं.
हेलीकॉप्टर का क्रैश रेट ज्यादा क्यों होता है?
हेलीकॉप्टर का ज्यादा एक्सीडेंट रेट काफी हद तक उनके डिजाइन और ऑपरेशनल इस्तेमाल से जुड़ा है. हेलीकॉप्टर में कॉम्पलेक्स मैकेनिक सिस्टम होते हैं. इसमें मेन रोटर, टेल रोटर और गियरबॉक्स शामिल है. इन सभी को बिना किसी दिक्कत के काम करना चाहिए. किसी भी जरूरी कंपोनेंट में खराबी जल्द ही इमरजेंसी में बदल सकती है.
इसी के साथ वे आमतौर पर कम ऊंचाई पर भी काम करते हैं. ये अक्सर पहाड़ों, इमारतों, पेड़ों और बिजली के लाइनों के पास उड़ते हैं. इससे टक्कर या मौसम से जुड़ी दिक्कतों की संभावना बढ़ जाती है. एक फिक्स्ड विंग एयरप्लेन चलाने की तुलना में हेलीकॉप्टर उड़ाना टेक्निकली ज्यादा मुश्किल है. हेलीकॉप्टर पायलट के इनपुट और मौसम में बदलाव के प्रति ज्यादा सेंसिटिव होते हैं.
ऑटोरोटेशन का फायदा
क्रैश के ज्यादा आंकड़ों के बावजूद अगर हेलीकॉप्टर का इंजन फेल हो जाता है तो वह पत्थर की तरह नहीं गिरते. वे ऑटोरोटेशन नाम की एक तकनीक का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसमें एयर फ्लो इंजन पावर के बिना भी रोटर ब्लेड को घूमाता रहता है. इससे पायलट कुछ खास हालात में कंट्रोल इमरजेंसी लैंडिंग कर सकते हैं.
हाल ही में हुई कुछ घटनाएं
हाल ही में रांची में हुए एयर एंबुलेंस हादसे में इस बात पर रोशनी पड़ी है कि मुश्किल हालात में चलने वाले छोटे फिक्स्ड विंग एयरक्राफ्ट में बड़े कमर्शियल जेट की तुलना में ज्यादा जोखिम हो सकता है.
इसी के साथ मंगलवार सुबह पवन हंस हेलीकॉप्टर में अंडमान इलाके में माया बंदर के पास तकनीकी खराबी आ गई थी. पायलट ने समुद्र में कंट्रोल्ड इमरजेंसी लैंडिंग की और सभी यात्रियों को सुरक्षित बचा लिया.
कुछ बड़े एविएशन हादसे
इसी के साथ हाल के सालों में हुए सबसे भयानक एविएशन हादसों में से एक एयर इंडिया का बोइंग 787 ड्रीमलाइनर था. यह अहमदाबाद से टेक ऑफ के तुरंत बाद क्रैश हो गया था. इस घटना में 241 लोगों की जान चली गई थी. हालांकि कमर्शियल एविएशन आंकड़ों के हिसाब से काफी सुरक्षित है, लेकिन काफी कम होने वाली गड़बड़ियों से काफी ज्यादा मौतें हो सकती हैं. ऐसा इसलिए क्योंकि विमान में ज्यादा यात्री होते हैं.
इतना ही नहीं बल्कि शशशश उत्तराखंड में भी तीर्थ यात्री को ले जा रहे एक हेलीकॉप्टर के क्रश में कई लोगों की मौत हो गई थी. पहाड़ी इलाका, खराब मौसम और ज्यादा ऊंचाई पर उड़ने की वजह से ऐसे मिशन में ऑपरेशनल रिस्क काफी बढ़ जाते हैं.
तो कौन ज्यादा खतरनाक?
अगर आंकड़ों के हिसाब से देखें तो हेलीकॉप्टर का एक्सीडेंट रेट हवाई जहाज से ज्यादा होता है. बड़े कमर्शियल जेट हवाई यात्रा का सबसे सुरक्षित तरीका बने हुए हैं. छोटे चार्टर एयरक्राफ्ट और मिशन बेस्ड हेलीकॉप्टर ऑपरेशन में इलाके, मौसम और ऑपरेशनल जरूरत की वजह से तुलना में ज्यादा रिस्क होता है.
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Source: IOCL


























