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न टैक्सी न कार..सीधे महल के ड्राइंग रूम तक आती थी ट्रेन, इस शख्स ने घर में ही बनवा रखा था स्टेशन

रामपुर रियासत के नवाब हामिद अली खान ने अपने महल के अंदर 113 करोड़ की लागत से एक निजी रेलवे स्टेशन बनवाया था. मिलक से रामपुर तक 40 किमी लंबी लाइन सीधे उनके ड्राइंग रूम तक आती थी.

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  • नवाब रजा अली खान ने बंटवारे में ट्रेन का इस्तेमाल लोगों को बचाने हेतु किया.

उत्तर प्रदेश की रामपुर रियासत के नवाबों की जीवनशैली दुनिया भर में अपनी भव्यता और बेमिसाल शौक के लिए जानी जाती थी. नवाब हामिद अली खान के दौर में रामपुर की शानो-शौकत का आलम यह था कि उनके महल खास बाग के भीतर तक रेल की पटरियां बिछी हुई थीं. आवागमन के लिए न तो उन्हें कार की जरूरत थी और न ही किसी बग्घी की, क्योंकि ट्रेन सीधे उनके ड्राइंग रूम के करीब बने निजी स्टेशन तक पहुंचती थी. यह उस दौर की एक ऐसी इंजीनियरिंग और शाही विलासिता का उदाहरण था, जिसे सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं.

हामिद अली खान और शाही स्टेशन

रामपुर के नौवें नवाब हामिद अली खान ने अपनी सुख-सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए महल के भीतर ही एक पूरा रेलवे स्टेशन तैयार करवाया था. इस स्टेशन और रेल लाइन के निर्माण पर उस दौर में जो खर्च आया था, उसकी कीमत आज के समय के अनुसार लगभग 113 करोड़ रुपये आंकी जाती है. नवाब ने यह सुनिश्चित किया था कि उन्हें मुख्य रेलवे लाइन तक जाने के लिए महल से बाहर न निकलना पड़े, इसलिए मिलक से रामपुर तक करीब 40 किलोमीटर लंबी एक विशेष रेल लाइन बिछाई गई थी.

ड्राइंग रूम तक ट्रेन का सफर

यह कोई सामान्य रेल सेवा नहीं थी, बल्कि नवाब की निजी पहुंच और अधिकार का प्रतीक थी. यह रेल लाइन सीधे उनके महल को मुख्य रेल नेटवर्क से जोड़ती थी. नवाब जब भी किसी यात्रा पर निकलते या वापस लौटते, तो ट्रेन सीधे महल के प्रांगण में प्रवेश करती थी. यह सुविधा उस समय के किसी भी भारतीय राजा या नवाब के पास होना बहुत बड़ी बात मानी जाती थी. नवाब हामिद अली खान का रहन-सहन आम लोगों की कल्पना से काफी परे और वैभवशाली था.

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शाही ट्रेन द सैलून की भव्यता

साल 1925 में नवाब ने अपने लिए एक विशेष शाही ट्रेन का निर्माण करवाया, जिसे 'द सैलून' के नाम से जाना गया. यह ट्रेन महज लोहे का डिब्बा नहीं थी, बल्कि पटरी पर चलता हुआ एक चलता-फिरता महल था. इसके भीतर एक आलीशान बेडरूम, डाइनिंग रूम और किचन की व्यवस्था थी. मनोरंजन के लिए अलग कक्ष बनाया गया था, जिसमें फारसी कालीन बिछे थे और कीमती लकड़ी का फर्नीचर लगा था. इस ट्रेन की सजावट और सुविधाएं नवाबों के विलासी जीवन की गवाह थीं.

विरासत का हस्तांतरण और दयालुता

19 जून 1930 को नवाब हामिद अली खान के निधन के बाद रामपुर रियासत की बागडोर उनके बेटे नवाब रजा अली खान के हाथों में आई. रजा अली खान ने न केवल अपने पिता की इस शाही विरासत को संभाला, बल्कि मानवीय मूल्यों को भी प्राथमिकता दी. 1947 में जब देश का बंटवारा हुआ और सांप्रदायिक तनाव बढ़ा, तब नवाब रजा अली खान ने इसी निजी शाही ट्रेन का इस्तेमाल शरणार्थियों और परेशान लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुंचाने के लिए किया था.

इतिहास के पन्नों में सिमटी यादें

समय बदलने और राजशाही के अंत के साथ ही यह निजी रेलवे स्टेशन और शाही ट्रेन भी धीरे-धीरे इतिहास के पन्नों में खो गए. देश के आजाद होने और रियासतों के विलय के बाद रखरखाव के अभाव और बदलती जरूरतों के कारण यह विशेष रेल सेवा बंद हो गई. आज रामपुर के उस भव्य स्टेशन के अवशेष और 'द सैलून' की कहानियां केवल पर्यटकों और इतिहास प्रेमियों को भारत के रजवाड़ों की उस जादुई दुनिया की याद दिलाती हैं, जहां राजाओं के शौक की कोई सीमा नहीं थी.

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About the author निधि पाल

निधि पाल एबीपी लाइव में कंटेंट राइटर हैं. ये यहां पर जीके सेक्शन की जिम्मेदारियां संभाल रही हैं. पिछले 7 साल से पत्रकारिता की दुनिया में कार्यरत निधि पाल ने इससे पहले अमर उजाला डिजिटल, न्यूज 24, ईटीवी भारत हैदराबाद जैसे बड़े संस्थानों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां निभाईं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है.

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो उन्होंने आईआईएस ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशन लखनऊ से जर्नलिज्म में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है.

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