1942 में ही अंग्रेजों से 'आजाद' हो गया था यूपी का यह जिला, ऐसी हो गई थी अंग्रेजों की हालत
1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उत्तर प्रदेश का बलिया अंग्रेजों से खुद को आजाद घोषित करने वाला पहला जिला बना. गांधी जी के नारे से प्रेरित होकर लोगों ने अंग्रेजी शासन को उखाड़ फेंका था.

देश इस साल 15 अगस्त को आजादी के 79 साल पूरे होने का जश्न मनाने जा रहा है. हर साल की तरह इस बार भी राजधानी दिल्ली के लाल किले से प्रधानमंत्री तिरंगा फहराएंगे, लेकिन आजादी का यह पर्व उन ऐतिहासिक घटनाओं को भी याद करने का मौका है जिन्होंने स्वतंत्र भारत की नींव रखी थी. इनमें से एक है 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन और उत्तर प्रदेश का बलिया जिला, जिसने इस आंदोलन के दौरान ही खुद को अंग्रेजी हुकूमत से आजाद घोषित कर दिया था. ऐसे में चलिए आज हम आपको बताते हैं की अंग्रेजी हुकूमत से यूपी का यह जिला कैसे आजाद हुआ था और उस समय अंग्रेजों की हालत क्या हो गई थी.
भारत छोड़ो आंदोलन में करो या मरो की गूंज
साल 1942 में सेकंड वर्ल्ड वॉर जारी था. जापानी सेना भारत की सीमाओं की ओर बढ़ रही थी और विश्व राजनीति में उत्तर-पुथल मची थी. इस दौरान ब्रिटिश सरकार के प्रस्ताव जिसमें भारत को युद्ध के बाद डोमिनियन स्टेट देने की बात कही गई को कांग्रेस ने ठुकरा दिया था. महात्मा गांधी ने स्पष्ट कहा था कि देश को पूर्ण स्वराज चाहिए. इसी दौरान 7 और 8 अगस्त को मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में कांग्रेस ने भारत छोड़ो प्रस्ताव पारित किया और इसी मंच से गांधी जी ने जनता को करो या मरो का नारा भी दिया था.
बलिया में बगावत की चिंगारी
महात्मा गांधी के भाषण के बाद अगले ही दिन पूरे देश के बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था. बलिया में उस समय सिर्फ दो लोगों के पास रेडियो था, जिससे यह खबर वहां के लोगों को मिली थी. यहां के लोग महात्मा गांधी के नारे का अर्थ नहीं समझ पाए और आर-पार की लड़ाई के लिए तैयार हो गए. 10 अगस्त 1942 को गांव-गांव से लोग लाठी, भाला, हांसिया लेकर जिला मुख्यालय की ओर बढ़ने लगे. महिलाएं भी झाड़ू और बेलन लेकर जत्थों में शामिल हो गई. बिना किसी नेता और योजना के हजारों लोग कलेक्ट्रेट पर जुट गए जिससे अंग्रेजी प्रशासन के हाथ पैर फूल गए.
स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र की स्थापना
19 अगस्त 1942 को बलिया के बागियों ने अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकते हुुए जिले को स्वतंत्र बलिया प्रजातंत्र घोषित कर दिया. यहां समानांतर सरकार बनाई गई जिसने कुछ समय तक काम भी किया. हालांकि सितंबर में ब्रिटिश सेना ने दोबारा कब्जा कर लिया और कई स्वतंत्रता सेनानियों को गिरफ्तार कर सजा दी.
महिलाओं और युवाओं की भूमिका रही अहम
भारत छोड़ो आंदोलन की खासियत यह भी रही कि इसमें महिलाओं की भागीदारी अभूतपूर्व थी. उस समय आंदोलन में देश की कई बड़ी महिलाओं ने आंदोलन का नेतृत्व किया. वहीं बलिया में महिलाएं पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ी रही थी.
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Source: IOCL






















