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हर साल कितने नोट खराब हो जाते हैं, देखें RBI का आंकड़ा?

RBI Banknotes: भारत में प्लास्टिक के नोट लाने की तैयारी चल रही है. इसी बीच आइए जानते हैं कि देश में हर साल कितने नोट खराब हो जाते हैं.

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  • आरबीआई ने तीन साल में 62.13 अरब नोट नष्ट किए हैं।
  • आरबीआई को नोट बदलने पर भारी खर्च होता है।
  • गंदे और कटे-फटे नोट बैंकों से बदले जा सकते हैं।
  • नष्ट नोटों को श्रेडिंग-ब्रिकेटिंग कर पुनर्चक्रित किया जाता है।

RBI Banknotes: हर दिन भारत भर में बाजारों, बैंक, एटीएम और व्यवस्थाओं के जरिए काफी बड़ी मात्रा में मुद्रा नोट का आदान-प्रदान होता है. वक्त के साथ इनमें से कई नोट फटे, गंदे, फीके या फिर खराब हो जाते हैं. इसके बाद उनका इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाता है. इसी परेशानी को देखते हुए अब भारत में प्लास्टिक के नोट लाने पर भी चर्चा चल रही है. लेकिन सवाल यह उठता है कि आखिर हर साल कितने नोट खराब हो जाते हैं? आइए जानते हैं क्या कहते हैं आरबीआई के आंकड़े.

आरबीआई ने 3 साल में कितने नोट नष्ट किए?

आरबीआई की वार्षिक रिपोर्ट से यह पता चलता है कि भारी सार्वजनिक इस्तेमाल की वजह से खराब हो चुकी मुद्रा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. वित्त वर्ष 2023-24 और वित्त वर्ष 2025-26 के बीच कुल 62.13 बिलियन बैंक नोटों को इस्तेमाल के लिए अयोग्य घोषित किए जाने के बाद प्रचलन से हटा दिया गया. 

सालाना ब्रेकअप से यह पता चलता है कि वित्त वर्ष 2023-24 में 21.25 बिलियन नोट नष्ट हो गए थे. इसके बाद वित्त वर्ष 2024-25 में 23.86 बिलियन नोट नष्ट हो गए. वित्त वर्ष 2025-26 में यह संख्या घटकर 17.02 बिलियन नोट रह गई थी. हालांकि मात्रा वैश्विक मानकों से काफी ज्यादा रही है. 


हर साल कितने नोट खराब हो जाते हैं, देखें RBI का आंकड़ा?

खराब नोटों के प्रकार और आरबीआई विनिमय नियम 

आरबीआई खराब मुद्रा को अलग-अलग श्रेणियों में बांटता है. हर प्रकार के विनिमय के लिए अलग-अलग नियम हैं. गंदे नोट वे होते हैं जो लगातार इस्तेमाल की वजह से गंदे, ढीले-ढाले या फिर थोड़े फटे हुए होते हैं. यहां तक कि अगर ऐसे नोटों को दो टुकड़ों में फाड़ दिया जाता है और ठीक से एक साथ जोड़ा जाता है तो उन्हें आमतौर पर किसी भी बैंक शाखा में बदला जा सकता है. यहां ग्राहकों को उनका पूरा मूल्य मिलता है. 

कटे-फटे नोट ज्यादा गंभीर रूप से खराब होते हैं, बड़े हिस्से गायब होते हैं या फिर नोट कई टुकड़ों में फट जाता है. ऐसे मामलों में बैंक रिफंड चेक करने से पहले नोट के बाकी इस्तेमाल योग्य क्षेत्र की गणना करते हैं. अगर नोट का लगभग 80% या फिर ज्यादा हिस्सा बरकरार रहता है तो आमतौर पर पूरी कीमत का भुगतान किया जाता है. अगर सिर्फ एक बीच का भाग बचता है तो सिर्फ आधा मूल्य ही वापस किया जा सकता है. जिन नोटों की हालत काफी ज्यादा खराब होती है उन्हें किसी भी भुगतान के लिए योग्य नहीं माना जाता. 

अपूर्ण नोटों में रसायन, आग, तेल या फिर पानी से इस हद तक खराब मुद्रा शामिल होती है कि इसकी सुरक्षा सुविधाओं को सत्यापित करना मुश्किल हो जाता है. इन नोटों को आमतौर पर नियमित बैंक शाखाओं में नहीं बदला जा सकता और इन्हें नामित आरबीआई कार्यालय में जमा किया जाना चाहिए. यहां विशेषज्ञ रिफंड तय करने से पहले उनकी जांच करते हैं. 

हजारों करोड़ का खर्च 

खराब बैंक नोटों को बदलने में आरबीआई के लिए एक बड़ी वित्तीय प्रतिबद्धता शामिल है. अकेले वित्त वर्ष 2024-25 के दौरान केंद्रीय बैंक ने सुरक्षा मुद्रण पर ₹6,500 करोड़ से ज्यादा खर्च किए. ₹500 मूल्य वर्ग सबसे बड़ी चुनौती पैदा करता है क्योंकि यह भारत में सबसे व्यापक रूप से प्रसारित नोट है और इसलिए सबसे ज्यादा टूट-फूट का सामना करता है. हर साल बैंकिंग प्रणाली में वापस आने वाले सभी नोटों में से लगभग 10% से 15% नोट प्रचलन के लिए काफी ज्यादा खराब पाए जाते हैं और उन्हें नए सिरे से मुद्रित मुद्रा में बदला जाना चाहिए. 

यह भी पढ़ेंः आम पुलिस से कितनी अलग होती है SIT? जानें यहां

आरबीआई क्षतिग्रस्त मुद्रा को कैसे नष्ट करता है? 

एक बार जब खराब नोट बैंकों में जमा हो जाते हैं तो उन्हें मुद्रा चेस्ट के जरिए आरबीआई प्रसंस्करण केंद्रों में भेज दिया जाता है. वहां एडवांस्ड मुद्रा सत्यापन और प्रसंस्करण प्रणाली मशीन नकली की पहचान करने और वास्तविक खराब मुद्रा को अलग करने के लिए हर नोट का निरीक्षण करती है.

इसके बाद अस्वीकृत नोटों को श्रेडिंग और ब्रिकेटिंग सिस्टम में भेज दिया जाता है. उच्च रफ्तार वाले श्रेडर मुद्रा को बेहतर महीन पट्टियों में काट देते हैं. इससे दोबारा से उन्हें बनाना असंभव हो जाता है. कटी हुई सामग्री को बाद में भारी दबाव के तहत घने ब्लॉक में संपीड़ित किया जाता है जिन्हें ब्रिकेट कहा जाता है.


हर साल कितने नोट खराब हो जाते हैं, देखें RBI का आंकड़ा?

कटे हुए बैंक नोटों का क्या होता है? 

आरबीआई बेकार मुद्रा को जलाने के बजाय पर्यावरण के अनुकूल रीसाइकलिंग प्रकिया का पालन करता है. कंप्रेस्ड ब्रिकेट अधिकृत औद्योगिक खरीदारों को बेचे जाते हैं. यहां उन्हें औद्योगिक ईंधन के रूप में दोबारा इस्तेमाल किया जाता है या फिर कार्डबोर्ड कैलेंडर और दूसरे कागज आधारित वस्तुओं जैसे उत्पादों के लिए कच्चे माल में बदल दिया जाता है. यह प्रक्रिया न सिर्फ मुद्रा का सुरक्षित निपटान सुनिश्चित करती है बल्कि वेस्ट मटेरियल से अतिरिक्त राजस्व उत्पन्न करते हुए पर्यावरणीय प्रभाव को भी कम करती है.

यह भी पढ़ेंः 100, 200 या 500 के कितने नोट चलन में, ज्यादा क्यों नहीं छापता RBI?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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