100, 200 या 500 के कितने नोट चलन में, ज्यादा क्यों नहीं छापता RBI?
RBI Note Printing: देश में पॉलीमर नोट लाने की चल रही चर्चा के बीच आइए जानते हैं कि आखिर देश में 100, 200 और 500 के कितने नोट चलन में हैं.

- देश में पॉलीमर नोट लाने की तैयारी, ₹500 नोट प्रमुख।
- RBI बड़े नोटों को प्राथमिकता, लागत कम करने हेतु।
- आरबीआई आर्थिक स्थिति देख छापता, अधिक से महंगाई।
RBI Note Printing: देश में पॉलीमर नोट लाने की तैयारी शुरू हो चुकी है. इसके प्रस्ताव को भी मंजूरी मिल चुकी है. आपको बता दें कि भारतीय रिजर्व बैंक के मुताबिक देश में अभी ₹41.23 लाख करोड़ मूल्य के बैंक नोट चलन में हैं. सभी तरह के नोटों में ₹500 का नोट भारत की कैश इकोनॉमी में सबसे आगे है. चलन में मौजूद कुल करेंसी वैल्यू का 85.5% हिस्सा इसी का है. इन आंकड़ों ने एक बड़े सवाल को फिर से खड़ा कर दिया है. अगर इकोनॉमी को ज्यादा कैश की जरूरत है तो आरबीआई और नोट क्यों नहीं छाप देता? आइए जानते हैं इस सवाल का जवाब.
₹500 के नोटों की हिस्सेदारी
आरबीआई के मुताबिक भारतीय इकोनॉमी में अभी ₹41.23 लाख करोड़ मूल्य के बैंक नोट चलन में हैं. इनमें से ₹500 के नोटों की वैल्यू लगभग ₹35.27 लाख करोड़ है. यह कुल वैल्यू का 85.5% है. ₹2000 के नोट को हटाने के बाद से ₹500 का नोट ज्यादा वैल्यू वाले कैश ट्रांजैक्शन और कैश जमा करने के लिए मुख्य करेंसी बन गया. सबसे ज्यादा वैल्यू वाले नोट को धीरे-धीरे हटाने के बाद पैदा हुई मांग को पूरा करने के लिए आरबीआई ने ₹500 के नोट की सप्लाई धीरे-धीरे बढ़ाई है.
₹100 और ₹200 के नोटों की हिस्सेदारी
हालांकि वैल्यू के मामले में ₹500 के नोट सबसे आगे हैं लेकिन कम वैल्यू वाले नोट भी रोजमर्रा के लेन-देन में एक बड़ी भूमिका निभाते हैं. आरबीआई के डेटा के मुताबिक चलन में मौजूद कुल करेंसी वैल्यू में ₹100 के नोटों की हिस्सेदारी लगभग 7.5% है. हालांकि मॉनेटरी हिस्सेदारी के लिहाज से ये कम हैं लेकिन इसके बावजूद भी रिटेल खरीदारी और रोजमर्रा के कैश पेमेंट के लिए इनका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल होता है.
वहीं चलन में मौजूद कुल करेंसी वैल्यू में ₹200 के नोटों का योगदान लगभग 2.5% है. 2017 में शुरू किए गए इस नोट का मकसद ₹100 और ₹500 के नोटों के बीच के अंतर को कम करना और कैश ट्रांजैक्शन को ज्यादा सुविधाजनक बनाना था.

₹500 के नोटों पर ज्यादा ध्यान क्यों?
बीते कुछ सालों में आरबीआई ने कम वैल्यू वाली करेंसी बड़ी मात्रा में छापने के बजाय ज्यादा वैल्यू वाली करेंसी छापने को प्राथमिकता दी है. ज्यादा वैल्यू वाले कम नोट छापने से प्रोडक्शन, स्टोरेज और ट्रांसपोर्टेशन की लागत कम करने में मदद मिलती है. इसी के साथ इकोनॉमी में पर्याप्त लिक्विडिटी भी बनी रहती है. यही वजह है कि भले ही चलन में मौजूद कुल करेंसी की वैल्यू बढ़ गई है लेकिन आरबीआई का सालाना करेंसी छपाई का खर्च लगभग 23.5% घटकर ₹4,875.2 करोड़ हो गया है.
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यह कैसे तय होता है कि कितने नोट छापने हैं?
आरबीआई मनमाने ढंग से करेंसी नहीं छापता है. हर साल वह आर्थिक गतिविधि और मौजूदा करेंसी की हालत के आधार पर नए नोटों की मांग का अनुमान लगाता है. एक अहम फैक्टर क्लीन नोट पॉलिसी है. हर साल बैंक फटे, खराब और गंदे नोट आरबीआई को लौटाते हैं. इन्हें करेंसी वेरिफिकेशन एंड प्रोसेसिंग सिस्टम का इस्तेमाल करके नष्ट कर दिया जाता है. साथ ही उनकी जगह नए छपे नोट जारी किए जाते हैं. कितनी करेंसी छापी जानी चाहिए इस बात को तय करने से पहले आरबीआई देश की जीडीपी ग्रोथ, कैश की मांग, मौसमी जरूरत और कुल लिक्विडिटी की जरूरत पर भी विचार करता है.

अनलिमिटेड करेंसी छापने पर क्या होगा?
बिना आर्थिक विकास के काफी ज्यादा पैसा छापने से भारी महंगाई बढ़ सकती है. अगर अर्थव्यवस्था में बड़ी मात्रा में करेंसी लाई जाती है और सामान और सेवाओं की सप्लाई में कोई भी बदलाव नहीं होता तो लोगों के खरीदने की क्षमता तेजी से बढ़ जाती है. इससे कीमत तेजी से ऊपर जाती है. काफी ज्यादा मामलों में इससे हाइपरइन्फ्लेशन की स्थिति बन सकती है. इस मामले में पैसे की वैल्यू खत्म हो जाती है. जिम्बाब्वे और वेनेजुएला जैसे देशों ने काफी ज्यादा करेंसी छापने के बाद ऐसे ही संकट का सामना किया है.
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