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Banna Tribe: इस जनजाति के लोग लकड़ी के डंडों पर चलते हैं, जानिए क्यों पैरों पर चलने से बचते हैं?

दुनिया के कई देशों में अलग-अलग जनजाति के लोग रहते हैं. इन सभी जनजाति के लोगों की मान्यताएं अलग-अलग होती है. आज हम आपको एक ऐसी जनजाति के बारे में बताएंगे, जहां पर लोग लकड़ी के डंडे पर चलते हैं.

दुनियाभर के देशों में अलग-अलग जनजाति के लोग रहते हैं. आज के आधुनिक युगों के मुकाबले इन सभी जनजाति के लोगों की वेशभूषा, खान-पान, रहन-सहन और रीति रिवाज, मान्यताएं बिल्कुल अलग हैं. आज आधुनिक युग में अधिकांश लोग जिस तरीके का खान-पान करते हैं और कपड़े पहनते, तकनीक का इस्तेमाल करते हैं. दरअसल जनजाति समुदाय से जुड़े लोग इन सभी चीजों से बहुत दूर रहते हैं. जीवन जीने का उनका तरीका आज भी सालों पुराना है. 

जनजाति समुदाय

ये सच है कि दुनियाभर में मौजूद जनजातियों के तौर-तरीके बिल्कुल अलग है. लेकिन ये भी सच है कि ये सालों पुरानी अपनी मान्यताओं और रिवाजों को कायम रखे हुए हैं. अफ्रीका,अमेरिका, भारत जहां पर भी जनजाति समुदाय के लोग मौजूद हैं, उन सभी लोगों का रहन-सहन और तरीका आज के वक्त से बहुत अलग है. आज हम आपको एक ऐसे जनजाति के बारे में बताएंगे, जहां के लोग आज भी लकड़ी के डंडों पर चलते हैं. आपके मन में सवाल आ रहा होगा कि आखिर ये लोग पैदल क्यों नहीं चलते हैं. आज हम आपको इसके पीछे की वजह बताएंगे.  

अफ्रीका में रहती है ये जनजाति

बता दें कि ये जनजाति अफ्रीका में रहती है. इस जनजाति के लोग लकड़ी के डंडों पर चलते हैं. टेल्स ऑफ अफ्रीका वेबसाइट की रिपोर्ट के मुताबिक इथियोपिया में एक बन्ना जनजाति रहती है. इन्हें बेना, बान्या, या बेन्ना नाम से भी जाना जाता है. इनका मुख्य काम खेती करना, शिकार करना और मवेशियों को चराना है. इस जनजाति में से कुछ इस्लाम को मानते हैं, जबकि कुछ ईसाई मान्यतों के हैं. इन लोगों को बांस की लकड़ियों पर चलने के लिए जाना जाता है.

 लकड़ी का डंडा क्यों?

बता दें कि ऐसा वो सैकड़ों सालों से करते आ रहे हैं. हालांकि हमेशा वो लकड़ी के डंडों पर नहीं चलते हैं. लेकिन जब ये अपने मवेशियों को चराने जाते हैं. उस वक्त कई बार मवेशियों पर जंगली जानवर हमला कर देते हैं. उनसे बचने के लिए ये लोग लकड़ी का सहारा लेते हैं. उसी पर चलकर ये मवेशियों को हंकाते हैं. 

इसके अलावा जब जनजाति में कोई उत्सव मनाया जाता है. उस वक्त अविवाहित युवक शरीर पर सफेद धारियां बना लेते हैं. इस दौरान वो इन लकड़ियों पर चलते हैं. इसपर चलने के कई सांस्कृतिक और सामाजिक महत्व भी हैं. जानकारी के मुताबिक समुदाय के युवक जब इन लकड़ियों के डंडों पर चलते हैं. उस वक्त समुदाय को ये दिखता है कि युवक अब समझदार हो गया है. इसके अलावा युवक मन और तन से भी मजबूत हो चुका है. वो अब जिंदगी को आगे इसी प्रकार चला सकते हैं. बता दें कि इस लकड़ी के डंडों को पैरों से चलाने में बल के साथ-साथ संतुलन और दिमाग की भी काफी जरूरत पड़ती है. बन्ना जनजाति में जो लोग इन लकड़ियों पर चलते हैं, उन्हें परिवार में बड़ा और मजबूत माना जाता है. 

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गिरिजांश गोपालन को मीडिया इंडस्ट्री में चार साल से ज्यादा का अनुभव है. फिलहाल वह डिजिटल में सक्रिय हैं, लेकिन इनके पास प्रिंट मीडिया में भी काम करने का तजुर्बा है. दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्रकारिता की पढ़ाई करने के बाद गिरिजांश ने नवभारत टाइम्स अखबार से पत्रकारिता की शुरुआत की. उन्हें घूमना बेहद पसंद है. पहाड़ों पर चढ़ना, कैंपिंग-हाइकिंग करना और नई जगहों को एक्सप्लोर करना उनकी हॉबी में शुमार है। यही कारण है कि वह तीन साल से पहाड़ों में ज्यादा वक्त बिता रहे हैं. अपने अनुभव और दुनियाभर की खूबसूरत जगहों को अपने लेखन-फोटो के जरिए सोशल मीडिया के रास्ते लोगों तक पहुंचाते हैं.
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