इजरायल-अमेरिका या यूएई, अगर ईरान हार गया तो उसके तेल पर किसका होगा कब्जा?
ईरान की संभावित हार की स्थिति में उसके विशाल तेल भंडारों पर नियंत्रण का सवाल वैश्विक चर्चा में है. अगर वाकई ऐसा होता है तो वहां का तेल नियंत्रण अमेरिका, इजराइल या यूएई में से किसके पास जाएगा?

मिडिल ईस्ट में इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सीधे टकराव ने वैश्विक भू-राजनीति में हलचल पैदा कर दी है. यह केवल दो देशों की जंग नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा संसाधनों पर नियंत्रण की लड़ाई भी बन सकती है. ईरान के पास कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का विशाल भंडार है, जो वैश्विक अर्थव्यवस्था की धड़कन माना जाता है. अगर मौजूदा तनाव एक पूर्ण युद्ध में बदलता है और ईरान की सैन्य शक्ति या सत्ता को नुकसान पहुंचता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठेगा कि उसके तेल भंडारों और सप्लाई लाइनों पर किसका कब्जा होगा? आइए जानें.
ईरान का तेल भंडार
ईरान दुनिया के उन चुनिंदा देशों में शामिल है जिनके पास कच्चे तेल का दूसरा सबसे बड़ा और प्राकृतिक गैस का दुनिया का दूसरा सबसे विशाल भंडार मौजूद है. वर्तमान में मिडिल ईस्ट में जारी तनाव के बीच ईरान की आर्थिक कमर उसके तेल निर्यात पर टिकी है. यदि इजरायल और अमेरिका की सैन्य कार्रवाई से ईरान की सत्ता अस्थिर होती है या उसकी हार होती है, तो उसके तेल संसाधनों का भविष्य पूरी तरह से बदल जाएगा.
ऐतिहासिक रूप से ऐसे मामलों में देखा गया है कि युद्ध के बाद संसाधनों का प्रबंधन उन शक्तियों के हाथ में चला जाता है जो युद्ध में विजयी होती हैं या जिनके पास उस क्षेत्र में निवेश होता है.
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अमेरिका और पश्चिमी ताकतों की रणनीतिक भूमिका
यदि ईरान के तेल बुनियादी ढांचे पर इजरायल या अमेरिका का प्रभाव बढ़ता है, तो अमेरिका की पहली प्राथमिकता 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) को सुरक्षित करना होगी. दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत कच्चा तेल इसी रास्ते से गुजरता है. अमेरिका सीधे तौर पर ईरान के तेल कुओं पर कब्जा करने के बजाय अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार को स्थिर करने की कोशिश करेगा.
अमेरिकी कंपनियां और पश्चिमी तेल दिग्गज (जैसे शेल या एक्सॉनमोबिल) भविष्य में ईरान के तेल क्षेत्र के आधुनिकीकरण और प्रबंधन में बड़ी भूमिका निभा सकते हैं. इसका मुख्य उद्देश्य तेल की कीमतों को कम करना और रूस या चीन जैसे देशों को मिलने वाली सप्लाई को रोकना होगा.
यूएई और सऊदी अरब का क्षेत्रीय प्रभाव
ईरान की हार की स्थिति में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और सऊदी अरब जैसे खाड़ी देश अपनी 'स्पेयर कैपेसिटी' (अतिरिक्त उत्पादन क्षमता) का उपयोग करके बाजार पर अपनी पकड़ और मजबूत करेंगे. वर्तमान में ईरान का तेल मुख्य रूप से चीन को जाता है. यदि ईरान के तेल उत्पादन पर पश्चिमी प्रतिबंधों का असर बढ़ता है या वहां का प्रबंधन बदलता है, तो यूएई और सऊदी अरब जैसे देश वैश्विक सप्लाई चेन में ईरान की जगह ले सकते हैं.
यूएई अपनी उन्नत रिफाइनिंग क्षमता और निवेश के जरिए ईरान के कुछ तेल क्षेत्रों के प्रबंधन में हिस्सेदारी की कोशिश कर सकता है ताकि क्षेत्र में स्थिरता बनी रहे और तेल की कीमतों पर ओपेक (OPEC) देशों का नियंत्रण बना रहे.
चीन और भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर संकट
वर्तमान में ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है. अगर ईरान की हार होती है और वहां अमेरिकी समर्थित व्यवस्था आती है, तो चीन के लिए सस्ते तेल का रास्ता बंद हो सकता है. भारत के लिए भी यह स्थिति दोधारी तलवार जैसी होगी. एक ओर, युद्ध रुकने से तेल की कीमतें स्थिर हो सकती हैं, लेकिन दूसरी ओर ईरान के साथ भारत के पुराने ऊर्जा संबंध और चाबहार जैसे प्रोजेक्ट्स पूरी तरह से पश्चिमी शक्तियों के प्रभाव में आ जाएंगे.
ईरान के तेल पर प्रत्यक्ष कब्जा भले ही कोई एक देश न करे, लेकिन उसके वितरण और मूल्य निर्धारण की चाबी वाशिंगटन और उसके सहयोगियों के पास चली जाएगी.
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Source: IOCL



























