Monsoon In India: बारिश होगी या नहीं, मौसम का पूर्वानुमान कैसे तैयार होता है, सैटेलाइट, रडार या AI... किस चीज का होता है इस्तेमाल?
मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगाने के लिए आईएमडी सैटेलाइट, डॉपलर रडार, वेदर बैलून और समुद्री बॉय से मिले अरबों डेटा पॉइंट्स का विश्लेषण करके उसकी सटीक भविष्यवाणी करता है.

Monsoon In India: हम जब सुबह अपने मोबाइल पर यह देखते हैं कि आज बारिश होगी या फिर तेज धूप निकलेगी, तो हमको ऐसा लगता है कि यह बेहद सामान्य प्रक्रिया है. लेकिन वास्तव में मौसम का यह सटीक पूर्वानुमान लगाने के पीछे दुनिया का सबसे जटिल विज्ञान, अत्याधुनिक तकनीक और बड़े-बड़े सुपरकंप्यूटर काम करते हैं. भारतीय मौसम विभाग बादलों के बरसने और तूफान आने की भविष्यवाणी हवा में नहीं करते हैं, बल्कि इसके लिए अंतरिक्ष से लेकर जमीन तक फैले डेटा का विश्लेषण किया जाता है. आइए विस्तार से समझें कि आखिर मौसम का हाल जानने के लिए किन-किन चीजों का सहारा लिया जाता है.
डॉपलर वेदर रडार
आईएमडी के पास मौसम का तुरंत हाल जानने के लिए डॉपलर वेदर रडार जैसा एक बेहद जरूरी और अचूक हथियार मौजूद है. यह खास रडार अपने चारों तरफ लगभग 150 से 200 किलोमीटर के दायरे में बादलों और मौसम की हर हलचल पर पैनी नजर रखता है. यह रडार लगातार वायुमंडल में शक्तिशाली इलेक्ट्रमैग्नेटिक तरंगें भेजता रहता है, जो कि बादलों में मौजूद बारिश की बूंदों से टकराकर वापस लौटती हैं. इन वापस आने वाले सिग्नलों की मदद से मौसम वैज्ञानिक रियल टाइम में बादलों की रफ्तार, बारिश की सघनता और तूफान की दिशा का सटीक पता लगा लेते हैं.
अंतरिक्ष से सैटेलाइट रखती हैं चौबीस घंटे नजर
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग अंतरिक्ष में मौजूद अपने आधुनिक मौसम संबंधी सैटेलाइट्स पर बहुत ज्यादा निर्भर करता है. ये सैटेलाइट पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर तैरते हुए हर 15 मिनट में मौसम से जुड़ी ताजा और हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरें भेजते हैं. इस सैलेटाइट डेटा से वैज्ञानिकों को बादलों की बनावच, हवा में मौजूद नमी के स्तर, समुद्र की सतह के तापमान और वायुमंडलीय दबावकी पल-पल की जानकारी मिलती है. चक्रवात, मानसून की चाल और वेस्टर्न डिस्टरबेंस जैसी बड़ी मौसमी घटनाओं को ट्रैक करने में यह तकनीक रीढ़ की हड्डी साबित होती है.
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ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन
अंतरिक्ष और हवा के साथ-साथ मौसम की सटीक भविष्यवाणी के लिए जमीन से मिलने वाली सटीक जानकारियों की भी उतनी ही जरूरत होती है. इसके लिए पूरे भारत में सैकड़ों की संख्या में ऑटोमेटिक वेदर स्टेशन का एक बड़ा नेटवर्क स्थापित किया गया है. ये जमीनी मॉनिटरिंग स्टेशन बिना रुके लगातार अपने आसपास के इलाके का तापमान, हवा में नमी, होने वाली बारिश की मात्रा, हवा की वास्तविक रफ्तार और उसकी दिशा को डिजिटल रूप में रिकॉर्ड करते रहते हैं, जिससे जमीनी बदलावों का तुरंत पता चलता है.
वेदर बैलून से ऊपरी वायुमंडल की जांच
हवा की ऊपरी परतों में क्या चल रहा है, यह जानने के लिए आईएमडी प्रतिदिन दो बार खास किस्म के वेदर बैलून हवा में छोड़ता है. इन विशाल गुब्बारों में बेहद संवेदनशील वैज्ञानिक उपकरण और सेंसर लगे होते हैं, जो आसमान में जैसे-जैसे ऊपर जाते हैं, वैसे-वैसे अलग-अलग ऊंचाइयों का वायुमंडलीय स्थितियों को मापते हैं. ये गुब्बारे ऊपरी वायुमंडल में मौजूद तापमान, हवा के दबाव, नमी के स्तर और हवा के बहने के खास पैटर्न के बारे में बेहद गोपनीय और महत्वपूर्ण डेटा नीचे भेजते हैं.
समुद्री बॉय के जरिए मौसम पर नजर
चूंकि भारत में मानसून और अधिकांश बड़े चक्रवाती तूफान समुद्र के ऊपर ही आकार लेना शुरू करते हैं, इसलिए आईएमडी Sea Buoys के नेटवर्क का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल करता है. समुद्र की लहरों पर तैरने वाले ये उपकरण पानी की सतह के तापमान, उठने वाली लहरों की ऊंचाई, हवा की गति और समुद्र के अंदर होने वाली हलचलों पर लगातार नजर रखते हैं.
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का कमाल
आधुनिक युग में मौसम विज्ञान ने न्यूमेरिकल वेदर प्रडिक्शन को अपनाया है, जिसमें भौतिकी के नियमों को जटिल गणितीय समीकरणों में बदला जाता है. इसके बाद सुपरकंप्यूटरों पर वायुमंडल का एक वर्चुअल सिमुलेशन तैयार किया जाता है. अब इस काम में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बिग डेटा एनालिसिस की मदद की जा रही है. एआई सैटेलाइट, रडार और सभी स्टेशनों से मिलने वाले विशाल डेटा का इतनी तेजी से विश्लेषण करता है कि पहले जिस गणना को करने में 12 घंटे लगते थे, अब वह सुपरकंप्यूटर और एआई के दम पर सिर्फ तीन घंटे में पूरी हो जाती है.
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