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War Economy: 100 साल से लगातार जंग जैसे हालात से जूझ रहे ये देश, जानें युद्ध के लिए कहां से जुटाते हैं पैसा?

War Economy: दुनिया में कुछ ऐसे देश है जो लगभग 100 सालों से युद्ध में शामिल हैं. आइए जानते हैं कि यह देश युद्ध का खर्चा कैसे संभाल पाते हैं.

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  • विदेशी मदद और अंतरराष्ट्रीय संगठन भी संघर्षों को बनाए रखते हैं।

War Economy: मिडिल ईस्ट में संघर्ष रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है. हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच इस वक्त सीजफायर चल रहा है लेकिन इसके बावजूद भी तनाव अभी भी कायम है. जहां ज्यादातर देशों में शांति और संघर्ष के दौर आते-जाते रहते हैं वहीं दुनिया के कुछ इलाके दशकों से युद्ध के चक्कर में फंसे हुए हैं. लेकिन सवाल यह उठता है कि जब कोई देश इतने लंबे समय तक युद्ध में फंसा होता है तो उसके पास पैसा कहां से आता है? आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब. 

लंबे समय से संघर्ष में फंसे इलाके 

लंबे समय से चले आ रहे संघर्षों में से एक इजरायल और फिलीस्तीन के बीच का संघर्ष है. इसकी जड़ एक सदी से भी ज्यादा पुरानी है. शांति की कई कोशिशें के बावजूद भी तनाव बार-बार हिंसा का रूप ले लेता है. इसी तरह म्यांमार में 1948 से गृह युद्ध चल रहा है. यह इसे दुनिया के सबसे लंबे समय से चले आ रहे अंदरूनी संघर्षों में से एक बनाता है. अफगानिस्तान ने भी लगातार उथल-पुथल देखी है.

युद्ध की अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ावा 

युद्ध से प्रभावित इलाकों में पैसे का सबसे बड़ा जरिया प्राकृतिक संसाधन होते हैं. सूडान और मध्य पूर्व के कुछ हिस्सों जैसे देश अपनी फौजी कार्रवाइयों के लिए पैसे जुटाने के लिए तेल, सोना और खनिजों पर काफी ज्यादा निर्भर रहते हैं. यह संसाधनों पर कब्जा अक्सर खुद संघर्ष की वजह बन जाता है. ऐसा इसलिए क्योंकि अलग-अलग गुट पैसा कमाने वाले इलाकों पर अपना दबदबा बनाने के लिए आपस में लड़ते रहते हैं.

टैक्स और सरकारी आमदनी 

युद्ध के दौरान भी सरकारें काम करती रहती हैं. कम से कम कुछ हद तक तो जरूर. वे टैक्स लगाकर पैसे जुटाती हैं और अक्सर फौजी खर्चों को पूरा करने के लिए नागरिकों पर टैक्स बढ़ा देती हैं. कई मामलों में सामान और सेवा पर लगने वाला अप्रत्यक्ष टैक्स तेजी से बढ़ा दिया जाता है. 

कर्ज लेना और युद्ध बॉन्ड

पैसे जुटाने का एक और बड़ा तरीका है कर्ज लेना. सरकारें बॉन्ड जारी करती हैं.  इन्हें अक्सर युद्ध बॉन्ड कहा जाता है. ऐसा इसलिए ताकि नागरिकों और संस्थाओं से पैसा जुटाया जा सके. इसी के साथ वे सेंट्रल बैंक से भी कर्ज लेती हैं. इससे ज्यादा पैसे छापने की जरूरत पड़ सकती है.

विदेशी मदद 

लंबे समय तक चलने वाले संघर्षों को बनाए रखने में बाहरी मदद की बड़ी भूमिका होती है. ताकतवर देश अक्सर किसी एक पक्ष का साथ देते हैं. यह साथ आर्थिक, राजनीतिक या फिर फौजी तौर पर हो सकता है. विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठन भी ऋण और सहायता प्रदान करते हैं.

यह भी पढ़ें: भारत के पड़ोसी देशों की सेनाएं कितनी ताकतवर, जानें दुनिया में कौन आता है किस नंबर पर?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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