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Web Browser: अपना वेब ब्राउजर बनाने के लिए किसी देश को क्या-क्या करना पड़ता है, कहां से लेनी होती है परमिशन?

Web Browser: केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि वह धीरे-धीरे स्वदेशी वेब ब्राउजर जोहो पर शिफ्ट हो रहे हैं. इस बयान के बाद वेब ब्राउजर को लेकर लोक ज्यादा से ज्यादा जानकारी ले रहे हैं.

Web Browser: आज के समय में इंटरनेट का इस्तेमाल हर कोई करता है. चाहे मोबाइल हो, लैपटॉप हो या टैबलेट... इंटरनेट हर जगह उपलब्ध है. हालांकि, इंटरनेट के इस्तेमाल के लिए सबसे जरूरी चीज है वेब ब्राउजर है. आप गूगल पर कुछ भी सर्च करें, यूट्यूब पर वीडियो देखें या किसी वेबसाइट पर ऑनलाइन फॉर्म भरें. हर काम ब्राउजर के जरिए ही होता है.

हाल ही में केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि वह धीरे-धीरे स्वदेशी वेब ब्राउजर जोहो पर शिफ्ट हो रहे हैं. इस बयान के बाद वेब ब्राउजर को लेकर लोक ज्यादा से ज्यादा जानकारी ले रहे हैं. बता दें, हाल फिलहाल दुनिया भर में ज्यादातर लोग गूगल क्रोम, मोजिला फायरफॉक्स, माइक्रोसॉफ्ट एज, सफारी, ओपेरा जैसे ब्राउजर यूज करते हैं, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ये ब्राउजर आखिर बनते कैसे हैं, क्या कोई भी देश या कंपनी अपना खुद का ब्राउजर बना सकता है और इसके लिए क्या-क्या जरूरी होता है तो चलिए जानते हैं...

वेब ब्राउजर क्या होता है और कैसे काम करता है?

वेब ब्राउजर एक ऐसा सॉफ्टवेयर होता है जो इंटरनेट पर मौजूद वेबसाइटों को खोलने और दिखाने का काम करता है. इंटरनेट पर सारी जानकारी कोडिंग में होती है (जैसे HTML, CSS, JavaScript). ब्राउजर इन कोड्स को पढ़कर उसे इंसानों के समझने लायक बनाता है यानी टेक्स्ट, फोटो, वीडियो और पेज का पूरा डिजाइन बनाकर आपको स्क्रीन पर दिखाता है. 

अपना वेब ब्राउजर बनाने के लिए किसी देश को क्या-क्या करना पड़ता है

  • किसी भी देश को अपना वेब ब्राउजर बनाने के लिए कई तकनीकी और प्रशासनिक कदम उठाने पड़ते हैं. सबसे पहले तकनीकी तैयारी करनी होती है. इसके साथ ही ब्राउजर बनाने के लिए एक बड़ी टीम की जरूरत होती है जिसमें सॉफ्टवेयर डेवलपर्स, वेब डिजाइनर, सिक्योरिटी एक्सपर्ट, यूजर इंटरफेस डिजाइनर, टेस्टर और डिबगर हों. 
  • इसके अलावा ब्राउजर बनाने के लिए प्रोग्रामिंग भाषाएं सीखना और यूज करना आना चाहिए. ब्राउजर बनाने के लिए मुख्य भाषाएं HTML, CSS, JavaScript और C++ या Rust हैं. 
  • इसके बाद रेंडरिंग इंजन का चुनाव करना होता है. रेंडरिंग इंजन वह हिस्सा होता है जो वेबसाइटों को असली पेज में बदलता है. कुछ फेमस इंजन Blink, Gecko, WebKit हैं. वहीं कोई देश चाहे तो अपना खुद का इंजन बना सकता है  या किसी ओपन-सोर्स इंजन का यूज कर सकता है. 
  • अब ब्राउजर बनाने के लिए लाइसेंस और परमिशन लेना होता है. अगर देश कोई पहले से मौजूद इंजन जैसे Blink या Gecko का यूज करना चाहता है, तो इन्हें यूज करने के लिए ओपन-सोर्स लाइसेंस की शर्तों को मानना होगा. अगर देश अपना खुद का इंजन बनाता है तो कोई परमिशन नहीं लेनी होती, लेकिन बड़ी तकनीकी और वित्तीय लागत आती है. दुनिया भर के वेबसाइट स्टैंडर्ड्स को फॉलो करना होता है ताकि ब्राउजर ठीक से वेबसाइट खोल सके. 
  • अगर देश या संस्था कोई नया ब्राउजर बनाती है, तो कुछ जरूरी टेस्टिंग की जाती है. जैसे W3C स्टैंडर्ड टेस्ट, सिक्योरिटी टेस्टिंग, स्पीड और प्रदर्शन, मल्टी डिवाइस सपोर्ट
  • किसी देश को वैश्विक इंटरनेट नियमों, जैसे ICANN, W3C, और IETF जैसे संगठनों के साथ नियमों में रहना पड़ता है. अगर ब्राउजर में किसी वेबसाइट को रोकने या ब्लॉक करने जैसी सुविधा है तो वह देश के आईटी कानून के अधीन आ जाएगा. अगर ब्राउजर सरकारी यूज या आम नागरिकों के लिए बन रहा है तो उसे सरकार या साइबर सिक्योरिटी एजेंसियों से सुरक्षा certification लेना होता है. 

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