इस शख्स से ही भगत सिंह ने सीखा था बम बनाना, 63 दिन तक की थी भूख हड़ताल
भगत सिंह को बम बनाना सिखाने वाले क्रांतिकारी जतिन दास की शौर्य गाथा, जानिए कैसे उन्होंने जेल में 63 दिनों तक भूख हड़ताल कर अंग्रेजों को हिलाया और देश के लिए दे दी अपनी शहादत

आज देश के महान क्रांतिकारी और स्वतंत्रता सेनानी यतीन्द्रनाथ दास (जतिन दास) का जन्मदिन है. 27 अक्टूबर 1904 को कलकत्ता में जन्मे जतिन दास भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन चुनिंदा नायकों में से एक हैं, जिन्होंने बंदूक या गोली से नहीं, बल्कि अपनी अटूट इच्छाशक्ति से ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी. उन्हें इतिहास में एक ऐसे वीर के रूप में याद किया जाता है, जिन्होंने जेल के भीतर भारतीय कैदियों के मान-सम्मान के लिए ऐतिहासिक 63 दिनों तक भूख हड़ताल की और अपने प्राणों की आहुति दे दी. बहुत कम लोग जानते हैं कि यह जतिनदास ही थे, जिनसे भगतसिंह ने बम बनाना सीखा था.
जब कोलकाता में हुई भगतसिंह से ऐतिहासिक मुलाकात
जतिन दास कॉलेज के दिनों से ही क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए थे और वे अनुशीलन समिति के सदस्य थे. बम बनाने की कला में उन्हें महारत हासिल थी. दिसंबर 1928 में जब कांग्रेस का कलकत्ता में एक बड़ा सम्मेलन चल रहा था. तब फणींद्र घोष एक पार्क में भगतसिंह की मुलाकात जतिन दास से करवाई थी.
भगत सिंह अपनी पार्टी हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के लिए एक ऐसा विशेषज्ञ चाहते थे जो सुरक्षित और असरदार बम बना सके. जतिन दास इस काम के लिए तैयार हो गए और इसके बाद वे बम बनाने की ट्रेनिंग देने के लिए आगरा आ गए.
सेंट्रल असेंबली में जो बम फेंके, वे जतिन दास ने ही बनाए थे
आगरा की गुप्त लैबोरेट्री में जतिन दास ने भगत सिंह और उनके साथियों को रसायन विज्ञान और बम बनाने की बारीकियां सिखाईं. 8 अप्रैल 1929 को दिल्ली की केंद्रीय असेंबली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने अंग्रेजी सरकार को जगाने के लिए जो धमाका किया था, वे बम जतिन दास के हाथों से ही तैयार किए गए थे.
इसके बाद जब अंग्रेजों ने लाहौर षड्यंत्र केस की जांच शुरू की, तो 14 जून 1929 को जतिन दास को भी कोलकाता से गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें लाहौर सेंट्रल जेल भेज दिया गया.
जेल के भीतर अधिकारों के लिए लड़ी सबसे बड़ी लड़ाई
लाहौर जेल में बंद भारतीय राजनीतिक कैदियों के साथ अंग्रेज बहुत बुरा बर्ताव करते थे. उन्हें गंदे कपड़े, खराब खाना और पढ़ने के लिए अखबार तक नहीं दिए जाते थे, जबकि यूरोपिय कैदियों को हर तरह की सुविधाएं मिलती थीं.
इस भेदभाव के खिलाफ भगत सिंह और उनके साथियों ने जेल में अनशन शुरू किया, जिसमें जतिन दास भी शामिल हुए. हालांकि जतिन दास का मानना था कि भूख हड़ताल तभी शुरू होनी चाहिए जब उसे आखिरी सांस तक निभाने का पक्का इरादा हो. 13 जुलाई 1929 से उन्होंने अपना ऐतिहासिक अनशन शुरू कर दिया.
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63 दिनों का अनशन और देश के लिए सर्वोच्च बलिदान
अंग्रेज अधिकारियों ने जतिन दास का अनशन तोड़ने के लिए कई हथकंडे अपनाए. उनके कमरे में पानी के घड़े में दूध भरकर रखा गया ताकि वे अनजाने में दूध पी लें, लेकिन जतिन दास ने प्यासे रहना कबूल किया पर अनशन नहीं तोड़ा.
डॉक्टरों ने उन्हें जबरन नाक की नली से खाना खिलाने की कोशिश की, जिससे भोजन उनके फेफड़ों में चला गया और उनकी हालत बेहद गंभीर हो गई. 63 दिनों की इस बेहद दर्दनाक और लंबी भूख हड़ताल के बाद 13 सितंबर 1929 को मात्र 24 वर्ष की आयु में इस महान देशभक्त ने देश के लिए अपने प्राण न्योछावर कर दिए.
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