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खून से सना है ईरान का इतिहास, जानिए अब तक कितने युद्ध लड़े और उसमें से कितने जीते?

ईरान को पहले फारस कहा जाता था. यह क्षेत्र दुनिया के लिए सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा है, वजह है फारस की समृद्धि. इस कारण फारस पर कई आक्रांताओं की नजर रही. चलिए जानते हैं इसका इतिहास

ईरान एक बार फिर युद्ध लड़ रहा है. उसके कट्टर दुश्मन इजरायल और अमेरिका उस पर ताबड़तोड़ हमले कर रहे हैं और इन हमलों से पूरा मिडिल ईस्ट दहल गया है. दुनिया के लिए यह युद्ध भले ही नया हो, लेकिन ईरान का इतिहास ही युद्ध से भरा पड़ा है. उसने अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिए कई लड़ाईयां लड़ीं, कभी आक्रांताओं से तो कभी अपने ही लोगों से. ईरान कई बार हारा तो कई बार उसने हराया भी. ऐसे में चलिए जानते हैं खून से सने ईरान का इतिहास... 

सामरिक दृष्टि से रहा है महत्वपूर्ण क्षेत्र

ईरान को पहले फारस कहा जाता था. यह क्षेत्र दुनिया के लिए सामरिक दृष्टि से काफी महत्वपूर्ण रहा है, वजह है फारस की समृद्धि. इस कारण फारस पर कई आक्रांताओं की नजर रही. अपनी समद्धि के कारण ही ईरान को कभी अरबों से तो कभी मंगोलों से कई युद्ध लड़ने पड़े और इन युद्धों के कारण ईरान की सत्ता में समय-समय पर परिवर्तन भी हुए. 

सासानी साम्राज्य का पतन

सातवीं सदी में ईरान ने अरबों से युद्ध लड़ा. इस समय ईरान में सासानी साम्राज्य था. अरबों ने सासानी साम्राज्य पर आक्रमण किया. एक के बाद एक कई युद्ध लड़े गए और सासानी साम्राज्य खत्म हो गया. यहीं से ईरान में इस्लाम का उदय भी हुआ. यह वह समय था जब यहां शिया समुदाय का विकास हुआ ओर फारसी संस्कृति मानने वालों ने भी इस्लाम को मानना शुरू कर दिया. इसके बाद 11वीं और 12वीं सदी में तुर्कों ने यहां कई युद्ध लड़े और ईरान में सत्ता हासिल की.  

चंगेज खान का हमला

तुर्कों के बाद ईरान पर मंगोलों की नजर पड़ी मंगोल नेता चंगेच खान ने 1219 से 1260 के बीच ईरान पर कई हमले किए. यहां भीषण नरसंहार हुआ और कई शहर खत्म हो गए. इसके बाद चंगेज खान की अगली पीढ़ी ने यहां साम्राज्य का विस्तार किया. बाद में मंगोलों ने भी इस्लाम स्वीकार कर लिया, लेकिन उन्होंने फारसी संस्कृति को ही अपनाया. 

इस्लामिक क्रांति के बाद भी जारी रहे युद्ध

1979 में ईरान में पश्चिम समर्थक सरकार का तख्तापलट हुआ और इस्लामिक क्रांति हुई. ईरान की सत्ता पर काबिज हुए धार्मिक नेता आयतुल्ला खुमैनी. इस्लामिक क्रांति के बाद ईरानियों को लगा कि सदियों से चले आ रहे युद्ध अब खत्म होंगे और शांति बहाल होगी, हालांकि ऐसा नहीं हुआ. इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान इजरायल और अमेरिका की नजरों में आ गया और धीरे-धीरे ये दोनों देश ईरान के कट्टर दुश्मन बन गए. तब से लेकर अब तक ईरान जंग ही लड़ रहा है.  

यह भी पढ़ें: पूरे ईरान को कितनी देर में उड़ा सकता है अमेरिका? जानिए इसके सबसे खतरनाक हथियार की ताकत

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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