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जब ईरान के लोगों ने अमेरिकी एंबेसी पर कर लिया था कब्जा, 66 अधिकारियों को बनाया बंधक

ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद ऐसी घटना घटी, जिसने इस मुल्क पर हमेशा के लिए काला धब्बा लगा दिया. ईरान में इस संकट को ईरान बंधक संकट के रूप में जाना जाता है, जो पूरे 444 दिन तक चला.

Iran Hostage Crisis: ईरान और इजरायल के बीच शुरू हुए सैन्य संघर्ष में अमेरिका की भूमिका धीरे-धीरे सामने आने लगी है. यहां तक कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के लिए सरेंडर करने की टाइमलाइन भी तय कर दी है. अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान को दो सप्ताह का समय दिया है, जिसके बाद संभव है कि यूएस आर्मी भी ईरान के खिलाफ जंग का ऐलान कर सकती है. 

अमेरिका और ईरान की यह दुश्मनी नई नहीं है. इन दो मुल्कों के बीच कटुता पूर्ण संबंधों का इतिहास काफी पुराना है. इसके पीछे करीब 45 साल पहले घटी वह घटना है, जिसके बाद ये दोनों देश हमेशा के लिए कट्टर दुश्मन बन गए. इतिहास में इस घटना को ईरान बंधक संकट के रूप में जाता है. चलिए जानते हैं इसके बारे में... 

1979 में शुरू हुआ था ईरान बंधक संकट

अमेरिका और ईरान के बीच दुश्मनी की शुरुआत 1953 में तख्तापलट के साथ हुई थी. अमेरिकी खुफिया एजेंसी CIA और ब्रिटेन की खुफिया एजेंसी ने ईरान के तेल भंडार पर कब्जा करने के लिए यहां प्रधानमंत्री मोहम्मद मोसद्दिक को सत्ता से हटाकर शाह रजा पहलवी को ईरान की सत्ता पर बिठाया. अमेरिका समर्थन शाह रजा पहलवी ने धीरे-धीरे ईरान के संसाधन अमेरिका व ब्रिटेन को सौंप दिए. ईरान की जनता में इसके खिलाफ गुस्सा बढ़ता गया और यह नाराजगी ही ईरान में इस्लामिक क्रांति की वजह बन. आयतोल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में 16 जनवरी 1979 को ईरानी शाह मोहम्मद रजा पहलवी सरकार का तख्तापलट हुआ और उन्हें देश छोड़कर भागना पड़ा. हालांकि, ईरान की इस्लामिक क्रांति के बाद ऐसी घटना घटी, जिसने इस मुल्क पर हमेशा के लिए काला धब्बा लगा दिया.

अमेरिकी दूतावास पर कब्जा

इस्लामिक क्रांति और ईरान में नई सरकार के गठन के बाद भी लोगों का गुस्सा अमेरिका के खिलाफ कम नहीं हुआ. 4 नवंबर, 1979 को ईरानी छात्रों ने अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर लिया और यहां के 66 कर्मचारियों को बंधक बना लिया. दो सप्ताह बाद गैर अमेरिकी नागरिकों को रिहा कर दिया गया, लेकिन 52 लोग ईरानी छात्रों के कब्जे में ही रहे. इन लोगों को 444 दिनों तक बंधक बनाकर रखा गया. 

अमेरिका नहीं करा पाया बंधकों को रिहा

तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने कूटनीतिक तरीके से इस संकट को सुलझाने का खूब प्रयास किया, लेकिन वे अमेरिकी नागरिकों को रिहा कराने में असफल रहे. इसके बाद 24 अप्रैल, 1980 को अमेरिका ने एक सैन्य मिशन का आदेश दिया, लेकिन यह भी नाकामयाब रहा और इसमें आठ अमेरिकी सैनिक मारे गए. इसके बाद 1980 में ही अमेरिका में चुनाव हुए, जिसमें जिमी कार्टर चुनाव हार गए और रोनल्ड रीगन अमेरिका के राष्ट्रपति बने. अमेरिका में सत्ता परिवर्तन के साथ ही ईरान बंधक संकट भी खत्म हुआ और 52 लोगों को मुक्त कर दिया गया. 

यह भी पढ़ें: फोन, एसी या फिर टीवी से भी ईरान में तबाही मचा सकता है इजरायल, ये है तरीका

प्रांजुल श्रीवास्तव एबीपी न्यूज में बतौर सीनियर कॉपी एडिटर अपनी सेवाएं दे रहे हैं. फिलहाल फीचर डेस्क पर काम कर रहे प्रांजुल को पत्रकारिता में 9 साल तजुर्बा है. खबरों के साइड एंगल से लेकर पॉलिटिकल खबरें और एक्सप्लेनर पर उनकी पकड़ बेहतरीन है. लखनऊ के बाबा साहब भीम राव आंबेडकर विश्वविद्यालय से पत्रकारिता का 'क, ख, ग़' सीखने के बाद उन्होंने कई शहरों में रहकर रिपोर्टिंग की बारीकियों को समझा और अब मीडिया के डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़े हुए हैं. प्रांजुल का मानना है कि पाठक को बासी खबरों और बासी न्यूज एंगल से एलर्जी होती है, इसलिए जब तक उसे ताजातरीन खबरें और रोचक एंगल की खुराक न मिले, वह संतुष्ट नहीं होता. इसलिए हर खबर में नवाचार बेहद जरूरी है.

प्रांजुल श्रीवास्तव काम में परफेक्शन पर भरोसा रखते हैं. उनका मानना है कि पत्रकारिता सिर्फ सूचनाओं को पहुंचाने का काम नहीं है, यह भी जरूरी है कि पाठक तक सही और सटीक खबर पहुंचे. इसलिए वह अपने हर टास्क को जिम्मेदारी के साथ शुरू और खत्म करते हैं. 

अलग अलग संस्थानों में काम कर चुके प्रांजुल को खाली समय में किताबें पढ़ने, कविताएं लिखने, घूमने और कुकिंग का भी शौक है. जब वह दफ्तर में नहीं होते तो वह किसी खूबसूरत लोकेशन पर किताबों और चाय के प्याले के साथ आपसे टकरा सकते हैं.

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