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Elephant Census: डीएनए विधि से की गई देश के हाथियों की गणना, संख्या जान कर चौंक जायेंगे आप

Elephant Census: भारत में पहली बार हाथियों की गणना डीएनए विधि से की गई है. आइए जानते हैं क्या है यह नया तरीका और क्या हैं इसके परिणाम.

Elephant Census: भारत में वन्य जीव संरक्षण में एक ऐतिहासिक बदलाव हुआ है. पहली बार देश में पारंपरिक आकलन तकनीक की जगह डीएनए आधारित वैज्ञानिक मेथड का इस्तेमाल करके हाथियों की गणना की गई है. लेकिन इस गणना में आए परिणामों ने संरक्षणवादियों को चौंका दिया है. दरअसल पिछले सालों की तुलना में हाथियों की आबादी में एक बड़ी गिरावट देखने को मिली है. आइए जानते हैं क्या हैं नए आंकड़े.

डीएनए तकनीक ने बदला खेल 

अब तक हाथियों की आबादी का अनुमान प्रत्यक्ष अवलोकन और फैकल डेंसिटी मेथड से लगाया जाता था. इसमें झुंड की आवाजाही की वजह से दोहरी गणना या बाकी गलतियां हो जाती थी. लेकिन इस बार वैज्ञानिकों ने डीएनए मार्क रीकैप्चर तकनीक का इस्तेमाल किया. इसमें हाथियों के गोबर से डीएनए निकाल कर हर हाथी के लिए एक अलग अनुवांशिक पहचान बनाई गई. इस प्रयास का उद्देश्य है कि कोई भी दोहराव ना हो और जनसंख्या स्वास्थ्य के बारे में सटीक जानकारी मिले. 

संख्या में भारी गिरावट 

नई जनगणना के मुताबिक भारत में हाथियों की संख्या 22,446 है. 2017 में यह संख्या 27,312 थी. इससे साफ पता चलता है कि हाथियों की संख्या में कितनी भारी गिरावट आई है. यह कमी आवास के नुकसान, अवैध शिकार और मानव हाथी संघर्षों को लेकर चिंताएं पैदा कर रही है.

सबसे ज्यादा हाथियों वाले राज्य 

कर्नाटक में सबसे ज्यादा हाथी हैं. यहां पर हाथियों की संख्या 6,013 है. इसी के साथ असम में 4,159 हाथी हैं. वहीं अगर बात करें तमिलनाडु की तो यहां 3,136 हाथी हैं. केरल में हाथियों की संख्या 2,785 है. इसी के साथ उत्तराखंड में 1792, उड़ीसा में 912, मेघालय में 677,  उत्तर बंगाल में 676, अरुणाचल प्रदेश में 617, छत्तीसगढ़ में 451, उत्तर प्रदेश में 257, नागालैंड में 252, झारखंड में 217, त्रिपुरा में 153, आंध्र प्रदेश में 120, मध्य प्रदेश में 97, महाराष्ट्र में 63, दक्षिण बंगाल में 31, मिजोरम में 16, बिहार में 13 और मणिपुर में 9 हाथी हैं.

डीएनए जनगणना क्यों जरूरी है 

डीएनए जनगणना सिर्फ संख्या की गणना नहीं है यह वन्य जीव निगरानी में एक वैज्ञानिक विकास भी है. हाथियों की विशिष्ट डीएनए प्रोफाइल के जरिए से उनकी पहचान करके शोधकर्ता अब व्यक्तिगत प्रवास मार्गों पर नजर रख पाएंगे. इसी के साथ उनकी अनुवांशिक विविधता और प्रजनन पैटर्न को भी समझ पाएंगे. इतना ही नहीं बल्कि राज्य और राष्ट्रीय सीमाओं के पास झुंडों के निगरानी भी की जा सकेगी और साथ ही स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के जोखिमों का भी पता लग सकेगा.

ये भी पढ़ें: किसके लिए बनी थी दुनिया की सबसे पहली बुलेट बाइक, उस समय कितनी थी इसकी कीमत?

स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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