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अगर किसी देश में विपक्ष ही न रहे तो क्या होगा, कितना निरंकुश हो जाएगा शासन?

Opposition In Democracy: क्या आपने कभी सोचा है कि अगर किसी देश के लोकतंत्र में विपक्ष ही ना हो तो क्या होगा. आइए जानते हैं क्या है इस सवाल का जवाब.

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  • प्रभावी विपक्ष के अभाव में संसदीय जाँच कमज़ोर होती है।
  • स्वतंत्र संस्थाएँ जवाबदेही खोती हैं, जाँच-संतुलन बिगड़ जाता है।
  • चुनावों से प्रतिस्पर्धा खत्म होती है, अल्पसंख्यक असुरक्षित हो जाते हैं।
  • स्वतंत्र मीडिया व अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक असर पड़ता है।

Opposition In Democracy: भारत आज अपना 80वां स्वतंत्रता दिवस मना रहा है और दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक गणराज्य बना हुआ है. भारत की संसदीय प्रणाली के मूल में एक सरल सिद्धांत है. लोग अपने प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं और सरकार से संसद, अदालत, संस्थान, मीडिया और मतदाताओं के प्रति जवाबदेह रहने की उम्मीद करते हैं. लेकिन तब क्या होता है जब किसी देश में कोई प्रभावी विपक्ष ही नहीं होता? अगर कोई भी सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने के लिए मजबूत नहीं है तो क्या लोकतंत्र जिंदा रह सकता है? आइए जानते हैं इन सवालों के जवाब.

संसद रबर स्टैंप बन सकती है 

एक कामकाजी संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष सरकारी नीतियों की जांच करता है, मंत्रियों से सवाल करता है, ‌ कानून पर बहस करता है और प्रस्तावित कानून के संभावित परिणामों पर भी रोशनी डालता है. अगर सार्थक विरोध ना हो तो यह जांच काफी ज्यादा कमजोर हो सकती है. संसद के एक ऐसी संस्था बनने का जोखिम हो जाता है जो आजाद रूप से जांच करने के बजाय सरकारी फैसलों को सिर्फ मंजूरी देती है. 

भारी और अनियंत्रित राजनीतिक शक्ति वाली सरकार के लिए विवादास्पद कानून पारित करना भी आसान हो सकता है. हालांकि संवैधानिक अदालतें और दूसरी संस्थाएं अभी भी देश की संवैधानिक संरचना के आधार पर सुरक्षा उपाय दे सकती हैं.


अगर किसी देश में विपक्ष ही न रहे तो क्या होगा, कितना निरंकुश हो जाएगा शासन?

जांच और संतुलन कमजोर होने लगते हैं 

लोकतंत्र सिर्फ चुनाव पर निर्भर नहीं है. आजाद संस्थाएं भी उतनी ही जरूरी हैं. अदालत, चुनाव प्राधिकरण, लेखा परीक्षक, सिविल सेवा और जांच एजेंसी जवाबदेही के अलग-अलग रूप देती है. अगर राजनीतिक शक्ति केंद्रित हो जाती है और यह संस्थाएं अपनी आजादी खो देती हैं तो सरकार को कम प्रभावी बाधाओं का सामना करना पड़ सकता है. जांच एजेंसियों को संभावित रूप से राजनीतिक उपकरण के रूप में माना जा सकता है. इसी के साथ नियामक निकाय सत्तारूढ़ प्रतिष्ठान द्वारा तेजी से प्रभावित हो सकते हैं. सबसे गंभीर खतरा तब पैदा होता है जब कार्यकारी शक्ति की जांच करने के लिए बनाई गई संस्थाएं आजाद रूप से काम करने के बजाय सरकार के हितों की पूर्ति करने लगती हैं. 

चुनाव जारी रह सकते हैं लेकिन प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है 

विपक्ष की गैर मौजूदगी का मतलब यह नहीं होता कि चुनाव तुरंत गायब हो जाए. एक सरकार वास्तविक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को और भी ज्यादा मुश्किल बनाते हुए चुनाव करना जारी रख सकती है. विपक्षी दलों पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है, कमजोर किया जा सकता है, आर्थिक रूप से प्रतिबंधित किया जा सकता है या फिर प्रभावी ढंग से विचार करने से रोका जा सकता है. अगर मतदाताओं के पास तकनीकी रूप से मतपत्र है लेकिन कोई यथार्थवादी विकल्प नहीं है तो चुनाव अपना ज्यादातर लोकतांत्रिक महत्व खो देते हैं.

अल्पसंख्यक अधिकार असुरक्षित हो सकते हैं 

एक मजबूत विपक्ष उन लोगों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व देता है जो सरकार का समर्थन नहीं कर सकते. इसके बिना अल्पसंख्यक और हाशिए पर रहने वाले समुदायों को उन्हें प्रभावित करने वाली नीति को चुनौती देने के लिए कम रास्ते मिल सकते हैं.

इस खतरे को कभी-कभी बहुमत के अत्याचार के रूप में भी बताया जाता है. जहां चुनावी बहुमत अल्पसंख्यकों के लिए पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बिना अपनी राजनीतिक शक्ति का इस्तेमाल करता है. आजाद अदालत, संवैधानिक सुरक्षा और नागरिक समाज कुछ सुरक्षा प्रदान कर सकते हैं. लेकिन उनकी प्रभावशीलता काफी हद तक उनकी अपनी आजादी पर निर्भर करती है.

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स्वतंत्र मीडिया भी दबाव में आ सकता है 

लोकतंत्र के लिए संसद के बाहर भी जांच की जरूरत होती है. आजाद पत्रकार, शोधकर्ता और नागरिक समाज संगठन भ्रष्टाचार को उजागर कर सकते हैं, सरकारी फैसलों की जांच भी कर सकते हैं और उन मुद्दों पर जनता का ध्यान खींच सकते हैं जिन्हें राजनीतिक संस्थान नजरअंदाज करते हैं. अगर राजनीतिक विरोध गायब हो जाता है और स्वतंत्र मीडिया एक साथ कमजोर हो जाती है तो नागरिकों को सरकार के प्रदर्शन की एक तरफा तस्वीर मिल सकती है. 


अगर किसी देश में विपक्ष ही न रहे तो क्या होगा, कितना निरंकुश हो जाएगा शासन?

अर्थव्यवस्था को भी नुकसान हो सकता है 

राजनीतिक एकाग्रता के आर्थिक परिणाम हो सकते हैं. प्रभावी निरीक्षण के बिना प्रमुख सरकारी अनुबंधों, संस्थान आवंटन और सार्वजनिक व्यय फैसलों को अपर्याप्त जांच का सामना करना पड़ सकता है. यह साठगांठ वाले पूंजीवाद के लिए स्थितियां पैदा कर सकते हैं. जहां करीबी राजनीतिक संपर्क वाले व्यवसायों को असंगत फायदा मिलता है. 

निवेदक पूर्वानुमेय कानून, स्वतंत्र संस्थान और कानून के शासन को भी महत्व देते हैं. अगर राजनीतिक शक्ति काफी ज्यादा केंद्रित हो जाती है और नीति सार्थक जांच के बिना बदल सकती है तो निवेशकों का विश्वास काफी ज्यादा प्रभावित हो सकता है.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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