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नेहरू से मोदी तक... किस दौर में कैसी विदेश नीति, कौन दोस्त-कौन दुश्मन?

Indian Foreign Policy History: आजादी के बाद की विदेश नीति और आज की विदेश नीति में जमीन आसमान का फर्क आ चुका है. जो कभी दुश्मन थे वे आज दोस्त हैं और वैश्विक परिस्थितियां बदल चुकी हैं.

India's Foreign Policy History: राहुल गांधी द्वारा कांग्रेस के रचनात्मक अधिवेशन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश नीति पर की गई टिप्पणी के बाद बवाल मचा हुआ है. भाजपा और उसके सहयोगी दल राहुल गांधी को घेर रहे हैं तो विदेश मंत्रालय ने भी इस पर अहम टिप्पणी की है. भाजपा के कई नेता जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी की विदेश नीति पर सवाल खड़े कर रहे हैं. ऐसे में अलग-अलग प्रधानमंत्रियों के दौर की विदेश नीति चर्चा में आ गई है.

असल में,भारत की विदेश नीति ने आजादी के बाद से अब तक एक लंबा सफर तय किया है. 1947 में आजादी से लेकर 2026 तक वैश्विक मंच पर भारत की भूमिका पूरी तरह से बदल चुकी है. पंडित नेहरू के शांति और गुट निरपेक्षता दौर से शुरू होकर आज प्रधानमंत्री मोदी के मजबूत और मुखर भारत के दौर तक, हमारी प्राथमिकता, हमारे दोस्त और दुश्मन सब कुछ बदल चुके हैं. इस बदलाव की तुलना विदेशी मामलों के जानकार अक्सर पंडित नेहरू की विदेश नीति से करते हैं जो गुट निरपेक्ष, पंचशील और समाजवादी व्यवस्था से प्रभावित थी. आइए जानते हैं कि किस दौर में भारत की कूटनीति कैसी रही. 

पंडित नेहरू का दौर

आजादी के समय पूरी दुनिया दो गुटों अमेरिका और सोवियत संघ में बंटी हुई थी. ऐसे में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी संप्रभुता को बचाए रखना था. इस समय प्रधानमंत्री नेहरू ने किसी भी गुट में शामिल न होने की नीति चुनी, इसको वैश्विक मंच पर 'गुट निरपेक्ष आंदोलन' का नाम दिया गया. उन्होनें आगे चलकर पंचशील सिद्धांत के जरिए दुनिया को शांति का संदेश दिया.

दोस्त और चुनौतियां- इस दौर में सोवियत संघ के साथ भारत के रिश्ते काफी मजबूत होने लगे थे. इसके अलावा युगोस्लाविया जैसे देश भारत के करीबी साझेदार बने. इस वक्त भारत का चीन पर आंख बंद कर भरोसा करना सबसे बड़ी भूल साबित हुई और हिंदी-चीनी भाई-भाई का नारा फ्लॉप साबित हुआ. 1962 में चीन ने भारत पर हमला कर दिया. 

इंदिरा गांधी का दौर

इंदिरा गांधी ने वैश्विक दबावों को नजरअंदाज करते हुए कड़े फैसले लिए. 1971 में हुई पाकिस्तान के साथ जंग में भारत को एक तरफा जीत मिली. साथ ही इसी दौर में 1974 में भारत ने पहला परमाणु परिक्षण कर दुनिया को चौंका दिया था. इंदिरा गांधी के दौर में राष्ट्रिय सुरक्षा को सबसे ऊपर रखा गया. 

दोस्त और चुनौतियां- 1971 में भारत ने सोवियत संघ के साथ 20 वर्ष की ऐसिहासिक मैत्री संधि साइन की. इसलिए सोवियत संघ इस दौर में भारत का एक महत्वपूर्ण साझेदार और भरोसेमंद मित्र बनकर उभरा. 1971 की जंग में अमेरिका और चीन ने पाकिस्तान को खुलकर समर्थन दिया था. अमेरिकी नौसेना ने भारत को डराने के लिए अपना सातवां बेड़ा तक भेज दिया था, जिससे अमेरिका के साथ रिश्ते बेहद खराब हो गए. 

उदारीकरण से मनमोहन सिंह तक का दौर 

पीवी नरसिम्हाराव ने लुक ईस्ट पॉलिसी यानी पूर्व की ओर देखो नीति को शुरू किया, जिससे दक्षिण पूर्वी देशों के साथ भारत का व्यापार बढ़े. इसके अलावा वाजपेयी सरकार ने 1998 में दूसरा परमाणु परिक्षण कर भारत को परमाणु संपन्न देश बनाया. 2008 में मनमोहन सिंह के दौर अमेरिका के साथ ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौता हुआ. 

दोस्त और चुनौतियां- इस दौर में अमेरिका के साथ संबंध मजबूत हुए और इजरायल के साथ भारत के रिश्ते खुलकर सामने आए. इसके अलावा 1999 में पाकिस्तान ने कारगिल में घुसपैठ की. 2008 के मुंबई हमलों के बाद भारत ने पाकिस्तान को वैश्विक मंच पर अलग-थलग करने की कोशिश तेज कर दी. 

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नरेंद्र मोदी का दौर

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सबसे अलग एक्ट ईस्ट नीति को अपनाया. भारत आज रूस का भी दोस्त है और अमेरिका का भी. आज भारत खुद को ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज के रुप में पेश करता है. 

दोस्त और चुनौतियां- अमेरिका, रुस, खाड़ी देशों, इसरायल, फ्रांस जैसे देशों के साथ भारत के रिश्ते सबसे अच्छे दौर में चल रहे हैं. चीन इस समय राजनीतिक और आर्थिक दोनों रुप में भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है. वहीं आतंकवाद के मुद्दे को लेकर पाकिस्तान के साथ भी रिश्ते खराब चल रहे हैं. 

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दीनदयाल पाटीदार एबीपी लाइव में कार्यरत हैं. एजुकेशन बीट की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं. वह स्कूल और यूनिवर्सिटी एडमिशन, प्रतियोगी परीक्षाओं के नतीजों, सरकारी भर्तियों, स्कॉलरशिप और शिक्षा से जुड़ी नीतियों पर नियमित तौर पर खबरें लिखते हैं, ताकि छात्रों और अभिभावकों तक सही, सटीक और समय पर जानकारी पहुंच सके. उनकी कोशिश रहती है कि जटिल से जटिल सरकारी नियम और शैक्षणिक अपडेट भी पाठकों तक आसान और समझने लायक भाषा में पहुंचे.

एबीपी लाइव में आने से पहले दीनदयाल पाटीदार अपनी यूनिवर्सिटी की मीडिया टीम का हिस्सा रह चुके हैं, जहां उन्होंने कैंपस से जुड़ी खबरों, इवेंट्स और एकेडमिक गतिविधियों की रिपोर्टिंग और कवरेज की जिम्मेदारी निभाई. इसी दौरान उन्होंने रिपोर्टिंग, कंटेंट राइटिंग, न्यूज राइटिंग की बारीकियां और खबरों को सही फॉर्मेट व भाषा में पेश करने का हुनर सीखा, जो आज उनकी पत्रकारिता का अहम हिस्सा हैं.

पढ़ाई-लिखाई की बात करें तो उन्होंने मंदसौर यूनिवर्सिटी, मंदसौर से जर्नलिज्म एंड मास कम्युनिकेशन (बीए-जेएमसी) में स्नातक की पढ़ाई की है. वह मूल रूप से मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले के रहने वाले हैं.

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