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History of Indian Rupee: डॉलर से कितना पुराना है भारत का रुपया, जान लें इसका पूरा इतिहास

भारतीय रुपये का इतिहास अमेरिकी डॉलर से कई साल पुराना है. अंग्रेजों के शासनकाल से लेकर आजादी के बाद तक रुपये ने कई बदलाव देखे हैं, लेकिन इसका मूल आधार आज भी देश की सबसे बड़ी ताकत बना हुआ है.

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  • 1770 में 'बैंक ऑफ हिंदुस्तान' ने पहला कागजी नोट छापा.

भारतीय मुद्रा में अमेरिकी डॉलर के सामने ऐतिहासिक कमजोरी दर्ज की जा रही है, जिसका मुख्य कारण घरेलू शेयर बाजार में मची भारी उथल-पुथल है. वैश्विक निवेशक भारतीय वित्तीय बाजार से तेजी से अपना फंड वापस खींच रहे हैं. लगातार बिकवाली के दबाव में रुपया हाल ही में फिसलकर $95.70$ प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया है, हालांकि आज इसमें मामूली सुधार देखा गया. इस साल की शुरुआत से अब तक करीब 7% से अधिक टूटकर रुपया उभरते हुए एशियाई देशों की मुद्राओं में फिलहाल सबसे निचले पायदान पर बना हुआ है. आइए इसी क्रम में जानते हैं रुपया, डॉलर से कितना पुराना है.

डॉलर के वजूद से कहीं पुराना भारतीय रुपया

वैश्विक बाजार में जब भी मजबूत करेंसी की बात होती है, तो सबसे पहला नाम अमेरिकी डॉलर का आता है. आज दुनिया भर का व्यापार डॉलर के इर्द-गिर्द घूमता है और इसके मुकाबले भारतीय रुपये की कीमत से देश की अर्थव्यवस्था को आंका जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इतिहास के पन्नों में हमारा रुपया अमेरिकी डॉलर से कहीं ज्यादा पुराना और गौरवशाली है? जब डॉलर का दुनिया में कोई वजूद भी नहीं था, तब भारत की यह मुद्रा अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपनी धाक जमा चुकी थी. आइए जानते हैं भारतीय रुपये के जन्म और इसके सदियों पुराने सफर की पूरी कहानी.

शेरशाह सूरी के शासनकाल में हुआ रुपये का जन्म

भारतीय रुपये का इतिहास आधिकारिक तौर पर 16वीं शताब्दी से शुरू होता है. साल 1540 से 1545 के बीच दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले अफगान शासक शेरशाह सूरी ने देश की वित्तीय व्यवस्था को सुधारने के लिए एक नया सिक्का चलाया था. सूरी ने चांदी के इस सिक्के को जारी किया और इसे नाम दिया 'रुपिया'. यह शब्द संस्कृत के 'रुप्यकम्' से लिया गया था, जिसका अर्थ होता है चांदी का सिक्का शेरशाह सूरी द्वारा शुरू की गई यह मुद्रा इतनी व्यावहारिक थी कि उनके बाद आए मुगल शासकों और फिर ब्रिटिश हुकूमत ने भी इसे जारी रखा.

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अमेरिका ने डॉलर को कब अपनाया?

अब अगर अमेरिकी डॉलर के इतिहास पर नजर डालें, तो यह भारतीय रुपये के मुकाबले काफी नया नजर आता है. अमेरिका ने अपनी आधिकारिक मुद्रा के रूप में डॉलर को बहुत बाद में अपनाया था. अमेरिकी कांग्रेस ने 6 जुलाई 1785 को आधिकारिक तौर पर डॉलर को अपने देश की राष्ट्रीय मुद्रा घोषित किया था. इस हिसाब से देखा जाए, तो शेरशाह सूरी का रुपया अमेरिकी डॉलर के वजूद में आने से लगभग 245 साल पहले ही भारत और उसके आसपास के व्यापारिक रूट पर मजबूती से दौड़ रहा था.

चांदी के मानक सिक्के का वजन और शुद्धता

शेरशाह सूरी के शासनकाल में जो चांदी का रुपया जारी किया गया था, उसका वजन और शुद्धता बेहद सटीक हुआ करती थी. इस सिक्के का वजन 178 ग्रेन (लगभग 11.53 ग्राम) तय किया गया था, जिसमें 91.7 फीसदी तक शुद्ध चांदी मौजूद होती थी. इस सिक्के की बनावट और वजन की विश्वसनीयता इतनी ज्यादा थी कि आम जनता से लेकर विदेशी व्यापारियों तक ने इसे बिना किसी हिचकिचाहट के लेनदेन के लिए स्वीकार कर लिया. इसी मजबूती के कारण रुपया सदियों तक भारतीय उपमहाद्वीप की मुख्य पहचान बना रहा.

ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी और रुपये का नया रूप

जब भारत में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का प्रभाव बढ़ा, तो उन्होंने भी रुपये की लोकप्रियता को देखते हुए इसे बंद नहीं किया. साल 1835 में अंग्रेजों ने 'कॉइनेज एक्ट' लागू करके पूरे देश में एक समान रुपये की व्यवस्था शुरू की. इसके बाद सिक्कों पर मुगल बादशाहों की जगह ब्रिटेन के राजा और रानी की तस्वीरें छपने लगीं. साल 1947 में जब भारत को आजादी मिली, तब देश के नए रिपब्लिक स्वरूप में पुराना ब्रिटिश ढांचा हटाकर आधुनिक भारतीय रुपये को देश की एकमात्र संप्रभु मुद्रा घोषित किया गया. 

कागजी नोटों की शुरुआत और बैंक ऑफ हिंदुस्तान

सिक्कों के बाद भारत में कागजी मुद्रा यानी बैंक नोटों का सफर भी काफी दिलचस्प रहा है. देश में पहला कागजी नोट 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में जारी किया गया था. साल 1770 के आसपास 'बैंक ऑफ हिंदुस्तान' ने भारत में पहला कागजी नोट छापा था. इसके बाद 'बैंक ऑफ बंगाल' और 'बैंक ऑफ बॉम्बे' ने भी अपने नोट बाजार में उतारे. साल 1935 में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की स्थापना होने के बाद, नोट छापने और मौद्रिक नीति को संभालने का पूरा अधिकार कानूनी तौर पर सिर्फ आरबीआई के पास आ गया.

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About the author निधि पाल

निधि पाल को पत्रकारिता में छह साल का तजुर्बा है. लखनऊ से जर्नलिज्म की पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने पत्रकारिता की शुरुआत भी नवाबों के शहर से की थी. लखनऊ में करीब एक साल तक लिखने की कला सीखने के बाद ये हैदराबाद के ईटीवी भारत संस्थान में पहुंचीं, जहां पर दो साल से ज्यादा वक्त तक काम करने के बाद नोएडा के अमर उजाला संस्थान में आ गईं. यहां पर मनोरंजन बीट पर खबरों की खिलाड़ी बनीं. खुद भी फिल्मों की शौकीन होने की वजह से ये अपने पाठकों को नई कहानियों से रूबरू कराती थीं.

अमर उजाला के साथ जुड़े होने के दौरान इनको एक्सचेंज फॉर मीडिया द्वारा 40 अंडर 40 अवॉर्ड भी मिल चुका है. अमर उजाला के बाद इन्होंने ज्वाइन किया न्यूज 24. न्यूज 24 में अपना दमखम दिखाने के बाद अब ये एबीपी न्यूज से जुड़ी हुई हैं. यहां पर वे जीके के सेक्शन में नित नई और हैरान करने वाली जानकारी देते हुए खबरें लिखती हैं. इनको न्यूज, मनोरंजन और जीके की खबरें लिखने का अनुभव है. न्यूज में डेली अपडेट रहने की वजह से ये जीके के लिए अगल एंगल्स की खोज करती हैं और अपने पाठकों को उससे रूबरू कराती हैं.

खबरों में रंग भरने के साथ-साथ निधि को किताबें पढ़ना, घूमना, पेंटिंग और अलग-अलग तरह का खाना बनाना बहुत पसंद है. जब ये कीबोर्ड पर उंगलियां नहीं चला रही होती हैं, तब ज्यादातर समय अपने शौक पूरे करने में ही बिताती हैं. निधि सोशल मीडिया पर भी अपडेट रहती हैं और हर दिन कुछ नया सीखने, जानने की कोशिश में लगी रहती हैं.

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