जिहादी तो सुना होगा लेकिन क्या जिहाद का मतलब जानते हैं आप, कुरान में कितनी बार है इसका जिक्र?
आज के दौर में जिहाद शब्द के अर्थ लड़ाई, हथियार चलाने आदि के लिए इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन क्या आपको पता है कि इसका असली अर्थ क्या है और यह कुरान में कितनी बार इस्तेमाल हुआ है?

आज के दौर में जिहादी और जिहाद जैसे शब्दों को अक्सर हिंसा, लड़ाई और हथियारों से जोड़कर देखा जाता है. आम जनमानस में इसे लेकर कई तरह की गलतफहमियां हो चुकी हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस शब्द का वास्तविक अर्थ क्या है और मुस्लिमों के पवित्र ग्रंथ कुरान में इसका जिक्र किस संदर्भ में किया गया है? असल में अरबी भाषा और इस्लामिक मान्यताओं में जिहाद का अर्थ किसी भी तरह की हिंसा से कोसों दूर है. यह शब्द मूल रूप से इंसान के व्यक्तिगत सुधार, समाज सेवा और अपनी ही बुराइयों से लड़ने की एक बेहद खूबसूरत आध्यात्मिक और नैतिक प्रक्रिया का नाम है.
क्या है जिहाद शब्द का असल अर्थ?
अरबी व्याकरण के अनुसार जिहाज शब्द का सीधा और शाब्दिक अर्थ होता है संघर्ष करना, अथक प्रयास करना या फिर कड़ी मेहनत करना. जब कोई व्यक्ति किसी नेक का को पूरा करने या अपने जीवन को सही रास्ते पर लाने के लिए कठिनाइयों का सामना करते हुए कोशिश करता है, तो उसे ही असल जिहाद कहा जाता है. इस्लाम में इसे अल्लाह के बताए रास्ते पर चलते हुए खुद को एर बेहतर इंसान बनाने और समाज में भलाई फैलाने के लिए की जाने वाली निरंतर कोशिश के रूप में पारिभाषित किया गया है. यह इस्लाम धर्म के किसी भी व्यक्ति के जीवन का सकारात्मक पहलू है.
बड़ा जिहाज और छोटा जिहाद क्या है?
इस्लामी दर्शन में जिहाद को मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा गया है. पहला और सबसे महत्वपूर्ण है जिहाद-अल-अकबर जिसे बड़ा जिहाद भी कहते हैं. इसे मनुष्य का अपने स्वयं के मन, क्रोध, लालच, अहंकार और बुरी आदतों के खिलाफ किया जाने वाला आंतरिक संघर्ष माना गया है. खुद हो बुराइयों से बचाना ही सबसे बड़ा जिहाद है. दूसरा है जिहाज-अल-असगर जिसे छोटा जिहाद भी कहते हैं. इसके तहत समाज में जुबान या कलम से सच और न्याय की बात फैलाना, गरीबों की मदद करना, माता-पिता की सेवा करना और विशेष परिस्थितियों में आत्मरक्षा में हथियार उठाना शामिल है.
कुरान में कितनी बार आया जिहाद शब्द?
धार्मिक ग्रंथ की मानें तो पवित्र कुरान में जिहाद शब्द संज्ञा के रूप में सीधे तौर पर सिर्फ चार बार ही आया है. यह मुख्य रूप से सूरह अत-तौबा, अल-हर्ज, अल-फुर्कान और अल-मुम्तहिना जैसी जगहों पर ही वर्णित है. इन सभी चारों मुख्य प्रसंगों में इस शब्द का इस्तेमाल इंसान के धैर्य, आत्म-संयम, धर्मनिष्ठा और नैतिक मूल्यों का पालन करने के संघर्ष के संदर्भ में हुआ है, न कि किसी भी प्रकार की सैन्य लड़ाई या जंग के लिए.
यह भी पढ़ें: क्या है बलूचिस्तान की नई मुद्रा 'बलोची फालूस', वहां कितने हो जाएंगे भारत के एक हजार रुपये?























