मुगलों के जमाने में कई साल तक कैसे खराब नहीं होती थी शराब, बिना केमिकल कैसे रखते थे सुरक्षित?
मुगल काल में बादशाह शराब पीने के शौकीन थे. इसीलिए उनके महलों में विदेशों से शराब मंगाई जाती थी. चलिए जानें कि उस दौर में मदिरा को लंबे वक्त तक खराब होने से बचाने के लिए क्या-क्या उपाय किए जाते थे.

इस्लाम धर्म में शराब को पूरी तरह से हराम माना गया है, लेकिन इसके बाद भी मुगल शासकों और उनके शाही दौर में शराब के प्रति लगाव जग जाहिर था. उस जमाने में भारतके सबसे बेहतरीन और महंगी शराब सीधे ईरान से मंगाई जाती थी, जिसे पानी के जहाजों और ऊंट के जरिए भारत आने में हफ्तों का समय लगता था. उस जमाने में बिना किसी आधुनिक केमिकल, प्रिजर्वेटिव या फिर फ्रिज के उस लंबी यात्रा के दौरान शाही तहखानों में सालों तक इस शराब को खराब होने से बचाने के लिए मुगल बेहद अनूठी तरकीब इस्तेमाल करते थे. चलिए जानें.
शाही सुराहियों और मिट्टी का इस्तेमाल
ईरान से आने वाली कीमती शराब को हफ्तों के सफर के दौरान और महलों में पहुंचने के बाद सबसे पहले खासतौर से तैयार की गई मिट्टी की सुराहीनुमा बर्तनों में पलटा जाता था. मिट्टी से बने इस बर्तन की खास बात होती थी कि ये बाहर की भीषण गर्मी को अंदर तक पहुंचने नहीं देते थे, जिससे शराब का तापमान हमेशा नियंत्रित और ठंडा बना रहता था. तापमान का सही संतुलन ही शराब को लंबे वक्त तक ताजा रखने की पहली और महत्वपूर्ण कूटनीति थी.
अंधेरे तहखानों में रोशनी से बचाव
मुगल काल के वास्तुकला विशेषज्ञों को यह अच्छी तरह से मालूम था कि सीधी धूप और हवा शराब की सबसे बड़ी दुश्मन होती है. इसलिए शराब को शीशे और मिट्टी के मर्तबानों में भरकर शाही महलों के सबसे निचले हिस्सों यानी ठंडे अंधेरे तहखानों में स्टोर किया जाता था. इन तहखानों को इस तरीके से डिजाइन किया जाता था कि वहां सूरज की रोशनी की एक किरण भी न पहुंच सके. साथ ही बर्तनों के मुंह को कपड़े, मोम और विशेष मिट्टी की कई परतों से सील कर दिया जाता था, ताकि हवा अंदर न जाने पाए.
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शराब की उम्र और स्वाद बढ़ाने की तरकीब
शराब लंबे वक्त तक खराब न हो और स्वाद दोगुना करने के लिए मुगल रसोइये और हकीम उसमें कुछ खास प्राकृतिक चीजों का मिश्रण करते थे. शराब के भीतर असली केसर और हरी इलाइची मिलाई जाती थी, जो न सिर्फ उसकी खुशबू और जायके को बेहतर बनाती थी, बल्कि एक बेहतरीन प्राकृतिक प्रिजर्वेटिव का काम भी करती थी. कुछ खास और महंगी शराबों को सालों सुरक्षित रखने के लिए उसमें शुद्ध शहद का भी इस्तेमाल किया जाता था. शहद के एंटी-बैक्टीरियल गुणों की वजह से शराब में किसी भी तरह की खराबी की गुंजाइश खत्म हो जाती थी.
लकड़ी कै बैरल में स्टोरेज
ईरान से आयातित शराब और भारत में तैयार होने वाली स्थानीय मदिरा को लंबो वक्त तक ठीक रखने के लिए लकड़ी के बड़े-बड़े बैरलों का इस्तेमाल किया जाता था. खास किस्म की लकड़ियों से बने इन बैरलों में रखने से शराब न सिर्फ रासायनिक रूप से सुरक्षित रहती थी, बल्कि समय के साथ उसका नशा और स्वाद दोनों बढ़ जाते थे. मुगलों के दौर में वाइन मैनेजमेंट का तरीका इतना गहरा और सटीक था कि बिना किसी आधुनिक साइंस या लैब के भी उनकी शराब दशकों तक अपनी पूरी रंगत और शुद्धता के साथ महफूज रहती थी.
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