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Meteorites: 1 साल में धरती पर कितने उल्कापिंड गिरते हैं, जानें हम उन्हें क्यों नहीं देख पाते?

Meteorites: पृथ्वी पर हर साल हजारों उल्कापिंड गिरते हैं. लेकिन इसके बावजूद भी हम उन्हें देख नहीं पाते. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.

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  • अनुमानित 17000 उल्कापिंड प्रतिवर्ष पृथ्वी पर गिरते हैं, अधिकांश अनदेखे।
  • वायुमंडल में जलकर, छोटे उल्कापिंड सामान्य चट्टानों से मिलते जुलते हैं।
  • अधिकांश समुद्रों, दूरस्थ स्थानों में गिरते हैं, जिससे पहचान मुश्किल।
  • दिन का प्रकाश, खराब मौसम उन्हें देखने से रोकते हैं।

Meteorites: हर साल हजारों उल्कापिंड पृथ्वी से टकराते हैं. लेकिन काफी कम लोग ही उन्हें देख पाते हैं. वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि हर साल लगभग 17000 उल्कापिंड पृथ्वी के वायुमंडल से गुजर कर पृथ्वी की सतह तक पहुंचते हैं. इतनी बड़ी संख्या के बावजूद भी ज्यादातर उल्कापिंडों पर किसी का भी ध्यान नहीं जाता. आइए जानते हैं क्या है इसके पीछे की वजह.

17000 उल्कापिंड पृथ्वी तक पहुंचते हैं 

वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि हर साल लगभग 17000 उल्कापिंड पृथ्वी पर गिरते हैं. ये उल्कापिंड अंतरिक्ष की चट्टानों के टुकड़े होते हैं जो पृथ्वी के वायुमंडल से गुजरते समय पैदा होने वाली तेज गर्मी को झेल कर जमीन से टकराते हैं. हालांकि यह संख्या काफी बड़ी लग सकती है लेकिन इनमें से काफी कम उल्कापिंड ही मिल पाते हैं या फिर उन पर स्टडी हो पाती है. 

ज्यादातर उल्कापिंड काफी छोटे होते हैं 

उल्कापिंडों पर ध्यान न जाने की सबसे बड़ी वजह उनका आकार है. जब वे तेज रफ्तार से पृथ्वी के वायुमंडल में आते हैं तो घर्षण से काफी ज्यादा गर्मी पैदा होती है. इससे उनका 90% से ज्यादा मास जलकर खत्म हो जाता है.

ज्यादातर उल्कापिंड जो जमीन तक पहुंचते हैं उनका वजन कुछ 100 ग्राम से लेकर कुछ किलोग्राम तक ही होता है. इससे उन्हें आम चट्टानों से अलग पहचानना मुश्किल हो जाता है. 

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कहां गिरते हैं ज्यादातर उल्कापिंड?

उल्कापिंडों के कम दिखाई देने में पृथ्वी की भौगोलिक स्थिति भी एक बड़ी भूमिका निभाती है. क्योंकि समुद्र पृथ्वी का लगभग 71% हिस्सा घेरे हुए है इस वजह से हर साल हजारों उल्कापिंड सीधे समुद्र में ही गिरते हैं. वैज्ञानिकों का यह अनुमान है कि हर साल लगभग 6100 उल्कापिंड समुद्रों में गिरते हैं. कई दूसरे उल्कापिंड रेगिस्तान में, जंगल, पर्वत श्रृंखला या फिर ध्रुवीय क्षेत्र में गिरते हैं.

दिन की रोशनी उन्हें छिपा देती है 

उल्कापिंड हमेशा साफ रात के आसमान में ही दिखाई नहीं देते. कई उल्कापिंड दिन के समय वायुमंडल में आते हैं. उस वक्त तेज सूरज की रोशनी की वजह से उनके चमकते हुए निशान को देखना नामुमकिन हो जाता है. यहां तक की रात में भी घने बादल, बारिश या फिर कोहरा आसमान में तेजी से गुजरते उल्कापिंड को देखने में बाधा डाल सकते हैं.

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स्पर्श गोयल को कंटेंट राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग में चार साल का अनुभव है.  इन्होंने अपने करियर की शुरुआत नमस्कार भारत से की थी, जहां पर लिखने की बारीकियां सीखते हुए पत्रकारिता और लेखन की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद ये डीएनपी न्यूज नेटवर्क, गाजियाबाद से जुड़े और यहां करीब दो साल तक काम किया.  इस दौरान इन्होंने न्यूज राइटिंग और स्क्रीनराइटिंग दोनों में अपनी पकड़ मजबूत की.

अब स्पर्श एबीपी के साथ अपनी लेखनी को निखार रहे हैं. इनकी खास रुचि जनरल नॉलेज (GK) बीट में है, जहां ये रोज़ नए विषयों पर रिसर्च करके अपने पाठकों को सरल, रोचक और तथ्यपूर्ण ढंग से जानकारी देते हैं.  

लेखन के अलावा स्पर्श को किताबें पढ़ना और सिनेमा देखना बेहद पसंद है.  स्क्रीनराइटिंग के अनुभव की वजह से ये कहानियों को दिलचस्प अंदाज़ में पेश करने में भी माहिर हैं.  खाली समय में वे नए विषयों पर रिसर्च करना और सोशल मीडिया पर अपडेट रहना पसंद करते हैं.

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